सीरिया के शहर “रक़्क़ा” का दुखड़ा कौन सुनेगा?
https://parstoday.ir/hi/news/west_asia-i45330-सीरिया_के_शहर_रक़्क़ा_का_दुखड़ा_कौन_सुनेगा
फ़ुरात नदी के किनारे सीरिया का ऐतिहासिक शहर रक़्क़ा स्थित है जहां त्याग और बलिदान, प्रेम और परिज्ञान की चरम अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम (स) के साथी हज़रत ओवैस क़रनी और हज़रत अम्मारे यासिर के मज़ार थे, जो अमरीकी और सऊदी पिट्ठु आतंकवादियों ने ध्वस्त कर दिए।
(last modified 2023-11-29T09:15:15+00:00 )
Jul १२, २०१७ ०१:१० Asia/Kolkata
  • सीरिया के शहर “रक़्क़ा” का दुखड़ा कौन सुनेगा?

फ़ुरात नदी के किनारे सीरिया का ऐतिहासिक शहर रक़्क़ा स्थित है जहां त्याग और बलिदान, प्रेम और परिज्ञान की चरम अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम (स) के साथी हज़रत ओवैस क़रनी और हज़रत अम्मारे यासिर के मज़ार थे, जो अमरीकी और सऊदी पिट्ठु आतंकवादियों ने ध्वस्त कर दिए।

यह शहर सीरिया के रक़्क़ा प्रांत की प्रांतीय राजधानी है। रक़्क़ा प्रांत, हसका और हलब प्रांत के बीच तुर्की की सीमा पर स्थित है। इस शहर से उत्तर की ओर 15 मील की दूरी पर अमरीकी सैन्य अड्डा है जहां 400 अमरीकी सैनिक तैनात हैं। रक़्क़ा प्रांत में अमरीकी स्पेशल फ़ोर्स भी कई महीने से कार्यवाही कर रही है और अमरीकी नेतृत्व में तथाकथित दाइश विरोधी गठबंधन यहां बमबारी भी करता रहता है। यहां सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ नामक गठबंधन के सशस्त्र लड़ाके भी हैं जिन्हें अमरीका और उसके घटक देशों की खुली मदद और सहायता प्राप्त है और यहां दाइश नामक तकफ़ीरी आतंकवादी गुट भी है जिसके विरुद्ध अमरीका और उसके गठबंधन तथा प्रशिक्षित यह सशस्त्र गुट कार्यवाहियों का दावा भी करते हैं। रक़्क़ा के पूर्वी क्षेत्र में सीरिया की सेना भी कार्यवाही कर ही है और उसने अब तक कई क्षेत्रों को स्वतंत्र करा लिया।

2013 से यही स्थिति है जबकि मार्च 2013 में रक़्क़ा शहर का नियंत्रण सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ के पास था फिर दाइश आया और 2014 से रक़्क़ा को दाइश ने अपनी राजधानी घोषित कर रखा है। नवंबर 2016 से आप्रेशन फ़ुरात जारी है किन्तु न दाइश समाप्त हुआ और न ही अमरीकी, सऊदी अरब और दूसरे घटक देशों की सेनाएं। अब 6 जून 2017 से रक़्क़ा की स्वतंत्रता के लिए सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ ने जिसमें कुर्द पुरुषों और महिलाओं की संख्या अधिक है और उनके साथ अरब और इसाई भी हैं, ज़मीनी हमले आरंभ किए हैं। 17 जून को सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ ने दस दिवसीय कार्यवाही की रिपोर्ट जारी की कि दाइश के 312 आतंकवादियों को मारा गया और 7 को ज़िंदा पकड़ लिया जबकि रक़्क़ा के चार ज़िलों को स्वतंत्र भी करा लिया, इस कार्यवाही में उनके 15 लोग भी मारे गये, दाइश के मारे गये आतंकियों के केवल 39 शव उनके क़ब्ज़े में हैं।

उनका दावा है कि दाइश के चार ड्रोन भी उन्होंने मार गिराए किन्तु एक दृष्टिकोण संयुक्त राष्ट्र संघ का भी है जिसके युद्ध अपराध की जांच करने वाले विभाग के निरिक्षकों पर आधारित स्वतंत्र जांच आयोग ने अमरीकी गठबंधन के हवाई हमलों में आम नागरिकों के मारे जाने की निंदा की है और इसे चिंताजनक बताया है। आयोग का कहना है कि रक़्क़ा शहर में अमरीकी गठबंधन के हवाई हमलों में अब तक 300 से अधिक आम नागरिक मारे जा चुके हैं। यह बात 14 जून को ब्रिटिश समाचार पत्र दा गार्डियन में प्रकाशित हो चुकी है।

एक और दृष्टिकोण सीरिया में तैनात रूसी सेना के कमान्डर करनल सर्गेई सोरीवीकीन का है कि अमरीका और उसके घटक, दाइश के आतंकियों को मार नहीं रहे हैं बल्कि उन्हें फ़रार करा रहे हैं ताकि वह उन क्षेत्रों का रुख़ करें जहां सीरियाई सेना या उसके घटक आतंकवादियों के विरुद्ध युद्ध में व्यस्त हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के स्वतंत्र जांच आयोग के प्रमुख पाउलो पेन्हीरो ने जेनेवा में मानवाधिकार परिषद को बताया कि खेदजनक स्थिति के कारण एक लाख साठ हज़ार नागरिक अपने घरों से फ़रार और क्षेत्र से पलायन पर विवश हैं।

इस स्वतंत्र जांच पैनल में अमरीकी सदस्य कैरन अबू ज़ैद ने कहा कि उन्होंने केवल अमरीकी गठबंधन की कार्यवाही में मारे गये नागरिकों का आंकड़ा पेश किया है, अर्थात इसका प्रमाण मौजूद है कि 300 लोग मारे गये और इनमें से 200 लोग केवल अलमंसूरा गांव में मारे गये। रक़्क़ा में युद्ध क़ैदी और दासी बनाई गयीं ईज़दी महिलाएं भी हैं जबकि अमरीका वहां हवाई हमलों में सफ़ेद फ़ासफ़ोरस प्रयोग कर रहा है जो बहुत ही घातक है।

अब स्थिति यह है कि रक़्क़ा से फ़रार होने वाले उत्तरी हलब के उपनगरीय क्षेत्रों में एकत्रित हो रहे हैं। उन्हें जराब्लस या तुर्की व सीरिया के सीमावर्ती क्षेत्र अज़ाज़ के शरणार्थी कैंपों में ले जाया जाता है जहां पहले से ही शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या आबाद है। रक़्क़ा में भी सीरिया के विभिन्न शहरों से लोग पलायन करके आबाद हुए थे। रक़्क़ा से उत्तरी हलब की यात्रा ख़तरों से भरी है। कम से कम 15 किलोमीटर पैदल यात्रा करनी पड़ती है और जगह जगह दाइश या सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्स की चेकपोस्टें हैं। दाइश उन्हें क्षेत्र छोड़ने नहीं देता। अलबत्ता दाइश या एसडीएफ़ दोनों ही 500 डॉलर देने पर रक़्क़ा से जाने से नहीं रोकते।

सीरिया के यह नागरिक पैसों की ओर से बहुत परेशान हैं, किराए पर घर नहीं ले सकते, शरणार्थियों के लिए अब कैंप भी नहीं बचे, इसलिए बहुत अधिक समस्याओं का सामना है। इसका एक कारण अमरीका और उसके घटक हैं जिन्होंने सीरिया में आतंकवादियों द्वारा एक प्रॉक्सी वॉर की आग भड़का रखी है। सीरिया की सरकार और उसकी सेना को मातृभूमि की रक्षा करने की सज़ा, अमरीकी गठबंधन इस प्रकार दे रहा है कि सीरिया के विमान को मार गिराया गया और कई बार सीरियाई सैनिकों पर जानबूझकर हमले किए गये किन्तु यह सीरिया की सेना और उसके घटक हैं जिन्होंने भारी बलिदान देकर हलब को आतंकवादियों से स्वतंत्र कराया।

इराक़ी सेना और स्वयं सेवी बल ने मूसिल सिटी को आतंकियों के नियंत्रण से स्वतंत्र करा लिया है और दूसरी ओर सीरिया की सेना भी अब सीमावर्ती क्षेत्रों को आतंकियों से स्वतंत्र करा रही है। यरमूक कैंप से भी आतंकी फ़रार पर विवश हुए हैं और बहुत से क्षेत्रों में आतंकवादी आपस में ही भिड़े हुए हैं। दूसरी ओर आईआरजीसी ने ईरान से मीज़ाइल फ़ायर करके सीरिया के दैरिज़्ज़ूर में दाइश के कमान्ड सेन्टर को तबाह कर दिया। प्रतिरोध का केन्द्र, इस क्षेत्र में अवैध ज़ायोनी शासन और उसके स्वामियों और घटकों के मानवता, फ़िलिस्तीनियों, अरबों और इस्लाम के विरुद्ध षड्यंत्रों को विफल बना रहा है।

मेरा सवाल केवल इतना है कि रक़्क़ा लुट गया, उजड़ गया, हज़रत ओवैस क़रनी और हज़रत अम्मार यासिर जैसे पैग़म्बरे इस्लाम के महान साथियों के मज़ार और प्रसिद्ध मस्जिद को तबाहकर दिया गया किन्तु वह लोग जो हलब में आतंकियों के मारे जाने पर आंसू बहा रहे थे, रैलियां और जूलूस निकाल रहे थे, सोशल मीडिया सहित समस्त मीडिया पर हलब का ग़ुस्सा बश्शार असद की निर्वाचित सरकार पर उतार रहे थे? कोई एक रैली, जूलूस, प्रेस कांफ़्रेंस क्यों नहीं करते और कोई एक बयान क्यों नहीं देते?

अख़्तर रिज़वी।

“लेखक के विचारों से पार्स टूडे का सहमत होना आवश्यक नहीं है”