ग़ज़्ज़ा वासियों के गहरे ज़ख्म कौन लगाएगा मरहम?
लगभग दस साल होने को आए हैं और गज़्ज़ा पट्टी का इलाक़ा ज़ायोनी शासन के क्रूर परिवेष्टन में है। इस अमानवीय परिवेष्टन का सबसे विनाशकारी असर चिकित्सा के क्षेत्र पर पड़ा है। दवाओं का अभाव गज़्ज़ा की एक आम मुशकिल बन गई है।
तसनीम न्यूज़ एजेंसी की पत्रकार दुआ उनएम ने गज़्ज़ा के हालात का जायज़ा लिया। उन्होंने बताया कि दवाएं नहीं मिल पर रही हैं कुछ प्राइवेट दवाख़ानों से कभी ज़रूरत की कुछ दवाएं मिल जाती हैं लेकिन सरकारी चिकित्सा संस्थानों की बहुत बुरी हालत है वहां दवाएं नहीं मिल पा रही हैं।
आठ साल से अधिक समय बीत चुका है और गज़्ज़ा को आवश्यकता की दवाएं नहीं पहुंच पा रही हैं।
गज़्ज़ा में फ़िलिस्तीन के स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता अशरफ़ अलक़ुदरह ने बताया कि ग़ैर क़ानूनी अमानवीय घेराबंदी की वजह से इस समय दवाओं की आपूर्ति बहुत बड़े संकट में पड़ गई है चिकित्सा उपकरणों का भी भारी अभाव है।
ज़ायोनी सैनिक दवाओं की खेप भी ग़ज़्ज़ा नहीं जाने देते और मानवता प्रेमी सहायता का भी रास्ता बंद है इसके चलते गज़्ज़ा की स्थिति त्रासदी का रूप धारण कर चुकी है।
गज़्ज़ा पट्टी पर ज़ायोनी शासन आए दिन हमले करता रहा है जिसमें लोग शहीद और घायल होते हैं, घायलों के उपचार के लिए न तो दवाएं हैं और न ज़रूरी उपकरण। गज़्ज़ा के इलाक़े पर इस्राईल ने लगातार तीन युद्ध थोपे जिसमें बड़ी संख्या में फ़िलिस्तीनी शहीद और घायल हुए।
ग़ज़्ज़ा के एक निवासी ने तसनीम न्यूज़ को बताया कि यदि जल जाने या कट जाने जैसे मामले में कोई असपताल ले जाया जाता है तो उसे मरहम तक बाहर से ख़रीदना पड़ता है असपतालों में नहीं मिल पाता। बीमार को असपताल में भर्ती किया जाता है और मरहम बाहर से ख़रीदना पड़ता है। बाहर निजी दवाख़ानों में यह दवाएं बहुत महंगी मिलती हैं। दवा नहीं मिल पाती।
एक अन्य ग़ज़्ज़ा वासी ने बताया कि ज़रूरत का अधिकतर दवाएं तो मिलती ही नहीं। दवाख़ानों में बस नींद की गोलियां मिल जाती हैं या बुख़ार के इंजेक्शन। हालात बहुत ख़राब हैं।