सऊदी अरब में ताजिक ‘दासों’ की आपबीती
अरब देशों और ख़ास तौर पर सऊदी अरब में ताजिकिस्तान के मज़दूरों की दयनीय स्थिति की रिपोर्ट सामने आयी है।
ताजिकिस्तान की राजधानी दोशंबे से समाचार एजेंसी फ़ार्स न्यूज़ के अनुसार, ताजिकिस्तान में बढ़ती बेरोज़गारी के मद्देनज़र इस देश के संबंधित अधिकारी इस बात की समीक्षा कर रहे हैं कि अरब देशों सहित दूसरे देशों में रोज़गार के लिए ताजिक श्रमबल को किन शर्तों के साथ भेजें।
ताजिक सरकार चाहती है कि कुवैत, क़तर और संयुक्त अरब इमारात सहित अरब देशों में मज़दूर सहित प्रोफ़ेशनल श्रम बल भेजने से संबंधित अपनी नीति में बदलाव लाकर रूस पर अपनी निर्भरता कम करे।
अरब देशों के प्रतिनिधियों ने भी दावा किया कि उन्हें ताजिकिस्तान से डॉक्टरों, इंजीनियरों, आर्किटेक्ट और माहिर ड्राइवरों की ज़रूरत है इसलिए वह ताजिकिस्तान के प्रोफ़ेशनल श्रमबल के साथ क़रार करने और उन्हें स्वास्थ्य सेवा, घर, रोज़गार और पर्याप्त सैलरी देने के लिए तय्यार हैं।
ताजिकिस्तान में सरकारी संस्थाओं में रोज़गार मौजूद है लेकिन सरकारी कर्मचारियों को आम तौर पर इतनी सैलरी मिलती है जिससे वे अपने दैनिक ख़र्चों को पूरा कर सकें।
इसके अलावा ताजिक सरकार अपनी सामाजिक मुश्किल को भी हल नहीं कर सकी जिसके कारण इस देश का श्रमबल विदेशों और ख़ास तौर पर रूस पलायन करता है।
सुरक्षा का दावा सिर्फ़ काग़ज़ पर
सऊदी अरब सहित अरब देशों में सैकड़ों की संख्या में ताजिक नागरिक काम करते हैं। ये लोग रोज़गार दिलाने वाली कंपनियों के ज़रिए सऊदी अरब गए हैं। ये कंपनियां रोज़गार के लिए पलायन करने वाले श्रमबल को इस बात का इतमेनान दिलाती हैं कि क़रार के सभी बिन्दुओं का पालन होगा लेकिन ज़्यादातर मौक़ों पर ताजिक श्रमबल को बहुत ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इनमें से ज़्यादा तर मज़दूर यातना के डर से सऊदी अरब में ताजिक श्रमबल के सामने मौजूद मुश्किलों का खुल कर ज़िक्र नहीं करते।
ताजिकिस्तान का विदेश मंत्रालय पिछले 2 साल में दसियों ताजिक नागरिकों को जिन्हें सऊदी अरब में ग़ुलाम बनाकर रखा गया था, स्वदेश भेजने में सफल रहा। इनमें से ज़्यादातर लोग ताजिकिस्तान में रोज़गार दिलाने के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों के ज़रिए सऊदी अरब पहुंचे और विदेश में ताजिकिस्तान के दूतावास से उन्होंने कोई संपर्क नहीं किया।
सऊदी अरब में ग़ुलामों की तरह जीवन बिताने वालों में ताजिकिस्तान की 46 साल की एक औरत हैं जिनका नाम ‘शमसिया हसन अली शाह आवा’ है। वह जारी महीने जुलाई में रियाज़ में ताजिक दूतावास की मदद से इस ग़ुलामी से रिहा होकर स्वदेश पहुंचीं। वह सऊदी अरब जाने से पहले पत्रकार थीं। ताजिकिस्तान की इस पूर्व पत्रकार का इस बारे में कहना है, “सऊदी अरब जाने से पहले मैंने सोचा भी नहीं था कि अपमान, डर, यातना और ग़ुलामी का सामना करना पड़ेगा।”
उन्होंने ताजिक औरतों को अरब देशों में रोज़गार के लिए पलायन करने के अंजाम की ओर से सूचित करने के लिए अपनी घटना को मीडिया को बताया।
शमसिया वर्षों तक ताजिकिस्तान के एक टीवी चैनल में पत्रकार के रूप में काम करती थीं लेकिन वित्तीय कारणों से अपना रोज़गार छोड़ने पर मजबूर हुयीं। उसके बाद उन्होंने व्यापार किया और फिर व्यापार में दिवालिया होने के बाद उन्होंने रोज़गार के लिए रूस का रुख़ किया। रूस में भी वित्तीय मुश्किलों के कारण वे ताजिकिस्तान लौट आयीं और फिर रोज़गार दिलाने वाली कंपनी के ज़रिए सऊदी अरब पहुंचीं। सऊदी अरब में उनका पहला कार्यकाल अच्छा गुज़रा लेकिन दूसरे सफ़र के बाद उन्हें बहुत ज़्यादा मुश्किलों व अपमान का सामना करना पड़ा यहां तक कि उनके मालिक ने उन्हें इलेक्ट्रिक शॉकर से मारा।
वह कहती हैं कि जिस कंपनी ने हमें रोज़गार दिलाने का वादा किया था उसके कार्यालय के एक कमरे में फिलिपीन, बंग्लादेश, श्रीलंका, घाना, सूडान वग़ैरह की 18 से 45 साल की बड़ी संख्या में औरतों को बहुत ही दयनीय स्थिति में महीनों बंद दरवाज़ों के पीछे रोज़गार का इंतेज़ार करना पड़ता था। उन्हें बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी यहां तक कि जब कोई व्यक्ति मालिक के पास आता तो उन्हें कमरे से निकाल कर उसे दिखाया जाता और फिर दुबारा कमरे में भेज कर उसमें ताला लगा दिया जाता।
ताजिकिस्तान की शमसिया कहती हैं, इस समय सऊदी अरब में ताजिकिस्तान के दसियों नागरिक बहुत ही ख़राब हालात में हैं जिनमें ज़्यादातर ऐसे हैं जो अपने वतन लौटने के बाद भी अपनी ऊपर बीतने वाली मुश्किलों से मीडिया को नहीं बताना चाहते।
शमसिया हसन शाह आवा रियाज़ में ताजिकिस्तान के दूतावास के ज़रिए फिर से अपने वतन लौटने में सफल हुयीं। (MAQ/N)