मध्यपूर्व में क्रानिक बीमारी का फैलता जाल
इंटरनैश्नल जर्नल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ या अंतर्राष्ट्रीय लोक स्वास्थ्य पत्रिका ने 3 अगस्त की रिपोर्ट में बताया कि पश्चिम एशिया में 1990 से 2015 के बीच हिंसा और झड़प के कारण मौत की दर 850 फ़ीसद बढ़ी है।
इस रिपोर्ट में इसी तरह यह भी उल्लेख है कि 1990 से 2015 के बीच पश्चिम एशिया में क्रानिक बीमारी भी बहुत ज़्यादा बढ़ी है। क्रानिक बीमारी उस बीमारी को कहते हैं जो लंबे समय तक बाक़ी रहती है। जैसे मधुमेह या दमा वग़ैरह।
सवाल यह उठता है कि पिछले 25 साल पश्चिम एशिया में ही क्यों क्रानिक बीमारी का दायरा फैला और क्यों इस क्षेत्र में मानव सुरक्षा की स्थिति बद से बदतर होती गयी।
इस सवाल का जवाब पश्चिम एशिया में अभूतपूर्व स्तर पर जंग और अशांति है।
इस समय पश्चिम एशिया के सामने 4 तरह की जंग है। एक विदेशी, दूसरे क्षेत्रीय, तीसरे गृह युद्ध और चौथे आतंकवादी।
विदेशी जंग की मिसाल 2003 में अमरीका की ओर से इराक़ पर और 2011 में लीबिया के ख़िलाफ़ थोपी गयी जंग है। क्षेत्र के भीतर जंग में वह जंग है जिसमें एक क्षेत्रीय देश दूसरे देश पर जंग थोपता है जिसकी मिसाल सऊदी अरब की ओर से यमन पर थोपी गयी जंग है। गृह युद्ध में एक देश के भीतर ही अनेक गुट एक दूसरे से लड़ते हैं जिसकी मिसाल यमन और लीबिया है। आतंकवादी जंग की मिसाल सीरिया और इराक़ हैं जहां आतंकवादी गुट एक देश की व्यवस्था के ख़िलाफ़ जंग कर रहे हैं।
इन जंगों के नतीजे में देशों के भीतर और पश्चिम एशिया के स्तर पर अशांति में अभूतपूर्व वृद्धि हुयी है।
इन हालात के मद्देनज़र यह कहना ग़लत न होगा कि पश्चिम एशिया न सिर्फ़ सैन्य सुरक्षा बल्कि मानव सुरक्षा की दृष्टि से भी दुनिया के सबसे अशांत क्षेत्रों में से एक बन गया है। (MAQ/T)