ग़ज़्ज़ा के मीज़ाइल, डील आफ़ दि सेंचुरी का जवाब
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मशहूर अरबी अख़बार रायुल यौम का कहना है कि फ़िलिस्तीनियों की ओर से इस्राईल पर फ़ायर किए जाने वाले मीज़ाइल दो अहम बातों का जवाब हैं।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
May ०७, २०१९ ११:४० Asia/Kolkata
  • ग़ज़्ज़ा के मीज़ाइल, डील आफ़ दि सेंचुरी का जवाब

मशहूर अरबी अख़बार रायुल यौम का कहना है कि फ़िलिस्तीनियों की ओर से इस्राईल पर फ़ायर किए जाने वाले मीज़ाइल दो अहम बातों का जवाब हैं।

मशहूर अरबी समाचारपत्र रायुल यौम के प्रधान संपादक अब्दुल बारी अतवान ने ग़ज़्ज़ा पर ज़ायोनी शासन के हालिया हमलों के बारे में अपनी समीक्षा में लिखा है कि ग़ज़्ज़ा पट्टी, फ़िलिस्तीन के एेतिहासिक क्षेत्र का दो प्रतिशत से भी कम है लेकिन इसके बावजूद इस क्षेत्र के लोग बड़े साहस के साथ अकेले ही चालीस करोड़ अरबों, डेढ़ अरब मुसलमानों और उनके पवित्र स्थलों की रक्षा कर रहे हैं और अमरीका व इस्राईल की विध्वंसक कार्यवाहियों का जवाब दे रहे हैं, उन्हें पराजित कर रहे हैं और उन्हें किसी से भी प्रशंसा व सराहना की अपेक्षा नहीं है। परिवेष्टित ग़ज़्ज़ा पट्टी की ओर से फ़ायर किए जाने वाले ये मीज़ाइल जो इस्राईल के सैन्य वाहनों और उनमें बैठे हुए सैनिकों को निशाना बना रहे हैं, दो बातों का जवाब हैं, एक डील आफ़ दि सेंचुरी नामक साज़िश का, जिसके माध्यम से नील से फ़ुरात तक ग्रेटर इस्राईल बनाए जाने की कोशिश की जा रही है। दूसरे ये उन अरब शासकों के लिए भी जवाब हैं जो ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री नेतनयाहू से सांठ-गांठ कर रहे हैं और उन्हें अपना नेता व समर्थक मानते हैं। यह बात अहम नहीं है कि किसने इस युद्ध की आग को भड़काया है बल्कि अहम और नया विषय यह है कि फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधकर्ता गुट इस पर गर्व कर रहे हैं और उन्होंने इस्राईल की भड़काऊ कार्यवाहियों और ग़ज़्ज़ा पट्टी में प्रदर्शन करने वालों की शहादत पर मज़बूत प्रतिक्रिया दिखाई है। उन्होंने इस्राईल की सीमा पर सैनिकों पर फायरिंग की है और इस क्षेत्र में रहने वाले लगभग सभी फ़िलिस्तीनी इस बात को समझ चुके हैं कि इस्राईल, ताक़त के अलावा और कोई भाषा नहीं समझता।

 

हालिया ग़ज़्ज़ा युद्ध में फ़िलिस्तीनियों को बड़ी अहम उपलब्धियां हासिल हुई हैं और अगर इस्राईल ने फिर हमला करने की कोशिश की तो इन उपलब्धियों की संख्या बढ़ती चली जाएगी। आरंभिक रूप से हासिल होने वाली उपलब्धियों को संक्षेप में इस प्रकार बयान किया जा सकता है।

  • इस युद्ध का परिणाम यह है कि इस्राईल की प्रतिरोधक शक्ति क्षीण पड़ती जा रही है। फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध एक एेसे पक्ष मं बदल चुका है जो अपने कार्यक्रमों व शर्तों को मनवाता है और टकराव के नियमों को निर्धारित करता है।
  • दूसरी उपलब्धि यह है कि लाखों इस्राईली अपनी जान बचाने के लिए दक्षिण से उत्तर की ओर भाग गए हैं और वे पूरी तरह से भयभीत व आतंकित हैं। अगर फ़िलिस्तीनियों के मीज़ाइल तेल अवीव तक पहुंचने लगें तो ये संख्य बढ़ती जाएगी।
  • तीसरी बात यह है कि इस्राईल में दो जश्न मनाए जाने वाले हैं, एक तेल अवीव में आयोजित होने वाले यूरो विजन के मुक़ाबले जिसके अरबों दर्शक हैं और दूसरे ज़ायोनी शासन के गठन की वर्षगांठ। इसका मतलब यह है कि अगर युद्ध दो सप्ताह तक जारी रहता तो यह दोनों जश्न रद्द कर दिए जाते और दुनिया में इस्राईल का अतिग्रहणकारी, फ़ासीवादी और अशांति फ़ैलाने वाला चेहरा अधिक खुल कर सामने आ जाता।
  • इस युद्ध की चौथी उपलब्धि यह रही कि फ़ार्स की खाड़ी के तटवर्ती अरब देशों के समक्ष, जो ज़ायोनी शासन के साथ अपने संबंध सामान्य बना चुके हैं या बनाने की कोशिश कर रहे हैं, अपने नागरिकों की ओर से कठिनाइयां पैदा हो गई हैं। फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध के मुक़ाबले में ज़ायोनी शासन की कमज़ोरी जगज़ाहिर होने के बाद इन कठिनाइयों में वृद्धि होती जाएगी।

हम ईश्वर का आभार प्रकट करते हैं कि नेतनयाहू पर मोहित और उनके पिट्ठू अरब नेताओं ने इस्राईली सैनिकों के मारे जाने पर उन्हें शोक संदेश नहीं भेजा। बहरहाल ग़ज़्ज़ा पट्टी के लोगों और प्रतिरोधकर्ताओं को धन्यवाद देना चाहिए कि वे मुसलमानों के दिल में आशा की किरण जलाए हुए हैं और हर कुछ समय बाद प्रतिरोध के चमत्कारों से हमें हतप्रभ कर देते हैं। (HN)

साभारः रायुल यौम