इराक़ में हिंसा और हंगामे की असली वजह क्या है?
इराक़ी राजधानी बग़दाद समेत कई अन्य शहरों में अचानक हिंसक प्रदर्शनों के फूट पड़ने और अब तक 73 लोगों की जान चली जाने से हर कोई हैरान है और भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर शुरू हुए इस विद्रोह की असली वजह जानना चाहता है।
बग़दाद में हमारे सूत्रों का कहना है कि इराक़ी प्रधान मंत्री आदिल अब्दुल मेहदी ने अमरीका की कुछ मांगों को मानने से इनकार कर दिया, जिसके बाद यह हिंसक प्रदर्शन फूट पड़े।
अमरीका की वह मांगें क्या हैं, जिन्हें अस्वीकार करने के लिए बग़दाद सरकार और इराक़ी जनता को इतनी मंहगी क़ीमत चुकानी पड़ी?
अमरीका ने 2003 में इराक़ पर हमला किया था, जिसके बाद इराक़ियों के कड़े प्रतिरोध ने 2011 में अमरीका को पूर्ण रूप से इराक़ से निकलने के लिए मजबूर कर दिया।
लेकिन इराक़ के भू-राजनीतिक महत्व के कारण अमरीका इस देश में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है, यही वजह है 2013-14 में दाइश से लड़ने के बहाने अमरीका ने फिर से अपने 6,000 सैनिक इराक़ में तैनात कर दिए, जो बग़दाद स्थित अमरीकी दूतावास समेत पांच सैन्य अड्डों में मौजूद हैं।
2017 में इराक़ में दाइश की पराजय के साथ ही इस देश अमरीकी सैनिकों को निकाले जाने की मांग ज़ोर पकड़ने लगी, लेकिन इसी के साथ ही वाशिंगटन, बग़दाद पर अपने सैनिकों के इराक़ में बने रहने के लिए दबाव बनाने लगा।
अमरीकी दबाव को नकारते हुए इराक़ी संसद और सरकार दोनों ने अमरीका से दो टूक कह दिया कि वह अपने सैनिकों को देश से निकाल ले।
अमरीका की दूसरी सबसे बड़ी मांग यह है कि इराक़ी सरकार देश में ईरान के प्रभाव को ख़त्म करे और तेहरान-बग़दाद के बीच बढ़ते सहयोग को सीमित करे। लेकिन यहां भी अमरीका को मुंह की खानी पड़ी और बग़दाद सरकार ने स्पष्ट शब्दों में वाशिंगटन की यह मांग ठुकरा दी।
ग़ौरतलब है कि ईरान और इराक़ दो शिया मुस्लिम बहुल पड़ोसी देश हैं, जो 1980 से 1988 तक एक लम्बी लड़ाई लड़ चुके हैं, लेकिन सद्दाम के पतन के बाद दोनों देशों के राजनीतिक एवं धार्मिक नेतृत्व की सूझबूझ ने लड़ाओ और राज करो की साम्राज्य की घिसीपिटी चाल पर पानी फेर दिया।
इराक़ में दाइश के उभरने के बाद ईरान पहला ऐसा था, जिसने हर स्तर पर इराक़ सरकार और जनता की मदद की। दाइश के ख़िलाफ़ स्वयं सेवी बल हश्दुश्शाबी के गठन में ईरान ने अहम भूमिका निभाई, जिसने दाइश को हराने में मुख्य भूमिका अदा की।
ईरान की इस्लामी क्रांति फ़ोर्स (आईआरजीसी) के पैटर्न पर बनने वाली इराक़ की यह फ़ोर्स अमरीका, इस्राईल और सऊदी अरब की आंखों में सबसे अधिक खटक रही है, जिसे वे हर क़ीमत पर ख़त्म या कम से कम कमज़ोर करने का प्रयास कर रहे हैं, इसलिए कि इस फ़ोर्स के रहते हुए बग़दाद में एक कठपुतली सरकार को सत्ता में लाना संभव नहीं है।
हालिया दिनों में हश्दुश्शाबी के ठिकानों पर इस्राईल ने कई हवाई हमले किए और अमरीका ने बग़दाद सरकार से इन हमलों पर चुप्पी बनाए रखने की मांग की। लेकिन अब्दुल मेहदी की सरकार ने इन हमलों के पीछे इस्राईल का हाथ होने का एलान करते हुए अमरीका के सहयोग से किए गए इन हमलों पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई और इसे देश की संप्रभुता का उल्लंघन बताया।
अरब विश्लेषक अमीन हतीत का कहना है कि इस तरह की घटनाओं के बारे में इराक़ के कड़े रूख़ को देखते हुए अमरीका ने इराक़ी प्रधान मंत्री अब्दुल मेहदी की सरकार को उखाड़ फेंकने की धमकी दी, जिसके बाद भ्रष्टाचार और रोज़गार जैसे मुद्दों के नाम पर इराक़ में हिंसक विद्रोह करवाया गया।
इस विद्रोह की टाइमिंग को देखते हुए भी आसानी से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अमरीका और उसके सहयोगी अपनी इस एक चाल से कई लक्ष्यों को निशाना बनाना चाहते थे। बग़दाद सरकार को गिराने के साथ ही देश में अराजकता फैलाने की योजना बनाई गई, ताकि इमाम हुसैन के चेहलुम पर इराक़ और पूरी दुनिया से नजफ़ और कर्बला पहुंचने वाले करोड़ों ज़ायरीन को वहां जाने से रोका जा सके और हमेशा के लिए इस विशाल विलिन मार्च को प्रभावित किया जा सके, जिसका भव्य आयोजन साम्राज्यवादी शक्तियों की बुनियादें हिलाकर रख देता है और इस्लाम दुश्मन ताक़तें थरथर कांपने लगती हैं। msm