क़तर नरेश ने सऊदी अरब के शासक को पटख़नी दी
सऊदी अरब के शासक रियाज़ सम्मेलन में भाग लेने के लिए क़तर नरेश को आमंत्रित करके दोहा को सऊदी गठबंधन की नीतियों से समन्वित करने की कोशिश में थे लेकिन शैख़ हमद बिन ख़लीफ़ा ने उनकी चाल को विफल बना दिया।
सऊदी अरब के शासक सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ ने क़तर नरेश शैख़ हमद बिन ख़लीफ़ा को फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद के शिखर सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण दिया था जिसके बाद यह सोचा जा रहा था कि दोनों पक्ष अपने शत्रुतापूर्ण संबंधों को अलग रख कर सुलह की ओर बढ़ेंगे। अलबत्ता यह माहौल बनाने में सऊदी अरब व संयुक्त अरब इमारात के मीडिया व इन देशों के समीक्षकों की भूमिका थी और कुछ समीक्षकों ने तो यहां तक कह दिया था कि क़तर अपने पिछले रवैये से पीछे हट जाएगा और संभावित रूप से अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करेगा। लेकिन व्यवहारिक रूप से क़तर नरेश ने रुवांडा में भ्रष्टाचार से संघर्ष के अंतर्राष्ट्रीय इनाम के समारोह में भाग लेने को रियाज़ सम्मेलन पर प्राथमिकता दी और इस सम्मेलन में अपनी भागीदारी के स्तर को कम करके प्रधानमंत्री को रियाज़ भेज दिया।
क़तर नरेश इसी तरह क्वालालम्पुर में इस्लामोफ़ोबिया से संघर्ष की राहों की समीक्षा के शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे जिसमें मलेशिया, इंडोनेशिया व पाकिस्तान भी शामिल होंगे। इस सम्मेलन में सऊदी अरब शामिल नहीं है जिससे पता चलता है कि कुछ अफ़वाहों के विपरीत क़तर, तुर्की और मुस्लिम ब्रदरहुड से दूरी का इरादा नहीं रखता। हालांकि अमरीका व सऊदी अरब की ओर से पड़ने वाले दबाव के कारण क़तर, फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद के ओमान व कुवैत जैसे कुछ मध्यमार्गी देशों की ओर से किए जा रहे मध्यस्थता के प्रयासों का विरोध नहीं कर रहा है लेकिन प्रमाणों से यही पता चलता है कि वह इन प्रयासों की ओर से कुछ अधिक आशावान नहीं है।
पहली बात तो यह है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात ने क़तर के लिए लगाई गई 13 शर्तों को वापस नहीं लिया है जिन्हें क़तर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप समझा जाता है और इसी लिए अगर क़तर नरेश, रियाज़ सम्मेलन में भाग लेते तो इसका अर्थ यह होता कि वे इन शर्तों को मान रहे हैं। दूसरी बात यह है कि क़तर इस बात से अच्छी तरह अवगत है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात उससे सुलह में जो विदित रुचि दिखा रहे हैं वह क़तर की भलाई या अपने पिछले क्रियाकलाप पर पुनर्विचार के लिए नहीं है बल्कि इसके विपरीत वे क़तर को अपनी उन विध्वंसक नीतियों में शामिल करना चाहते हैं जो यमन की तबाह और क्षेत्र में अशांति का कारण बनी हैं और जिनका कोई अंत नहीं है। तबाही फैलाने वाले ये दोनों देश वास्तव में अमरीका व इस्राईल के पिट्ठू बने हुए हैं और सीरिया व यमन में तबाही फैलाने के बाद अब लेबनान व इराक़ को तबाह करना चाहते हैं। इसी लिए वे चाहते हैं कि क़तर भी उनके साथ हो जाए लेकिन ऐसा नहीं लगता कि क़तर अपनी सैद्धांतिक नीतियों से पीछे हट जाएगा। (HN)