ग़द्दारी का समझौता और सुरक्षा के क्षेत्र में उसके परिणाम
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संयुक्त अरब इमारात ने ज़ायोनी शासन के साथ कूटनैतिक संबंध स्थापित करने का जो ग़द्दारी वाला समझौता किया है, सुरक्षा के क्षेत्र में उसके अनेक परिणाम सामने आएंगे।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Aug १६, २०२० १३:२२ Asia/Kolkata
  • ग़द्दारी का समझौता और सुरक्षा के क्षेत्र में उसके परिणाम

संयुक्त अरब इमारात ने ज़ायोनी शासन के साथ कूटनैतिक संबंध स्थापित करने का जो ग़द्दारी वाला समझौता किया है, सुरक्षा के क्षेत्र में उसके अनेक परिणाम सामने आएंगे।

संयुक्त अरब इमारात और इस्राईल में इससे पहले भी विभिन्न क्षेत्रों में संबंध रहे हैं और इस्राईली मीडिया का कहना है कि ज़ायोनी प्राधानमंत्री नेतनयाहू पिछले दो साल में दो बार अबू धाबी की गुप्त यात्रा कर चुके हैं लेकिन इन संबंधों का पश्चिमी एशिया में दोनों पक्षों के लिए सुरक्षा के क्षेत्र में कोई परिणाम सामने नहीं आया था जबकि अब इन संबंधों की खुल कर की गई घोषणा के सुरक्षा के क्षेत्र में अवश्य कुछ परिणाम सामने आएंगे। ग़द्दारी के इस समझौते का एक परिणाम तो यही है कि संयुक्त अरब इमारात, जो क्षेत्र में आर्थिक विकास का एक माॅडल बनने के चक्कर में है, अशांति का सामना करेगा जबकि आर्थिक विकास की मूल शर्त मज़बूत सुरक्षा है।

 

इस्राईल व इमारात के बीच संबंध स्थापना की घोषणा के 72 घंटे के अंदर लीबिया में इमारात के दूतावास को आग लगा दी गई। इस समझौते के विरोध में त्रिपोली में लोगों ने इमारात के दूतावास पर हमला कर दिया और उसकी इमारत के एक भाग को आग लगा दी। अन्य देशों में भी इस तरह की घटनाओं की संभावना पाई जाती है। इमारात, यमन के ख़िलाफ़ सऊदी गठजोड़ का एक अहम सदस्य है। यमन के ख़िलाफ़ अबू धाबी की कार्यवाहियों में वृद्धि के बाद पिछले साल अलफ़ुजैरा बंदरगाह में धमाका हुआ था और इसी तरह यमनी बलों ने इमारात के ख़िलाफ़ कड़े हमले किए थे जिससे इस देश की सुरक्षा ख़तरे में पड़ गई थी, इमारात के अधिकारी बहुत अधिक चिंतित हो गए थे और आंतरिक स्तर पर इस देश में बड़े गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए थे। इसी वजह से इमारात ने यमन से अपने सैनिकों को वापस बुलाने और युद्ध में अपनी भागीदारी कम करने का फ़ैसला किया था।

 

ज़ायोनी शासन इस्लामी जगत के जनमत में इतना घृणित है कि उसके साथ औपचारिक रूप से संबंधों की स्थापना, इमारात में आंतरिक स्तर पर भी सुरक्षा के लिए चुनौतियां पैदा कर सकती है बल्कि सत्ता के गलियारों में भी मतभेद उत्पन्न कर सकती है। इसकी एक वजह यह है कि ज़ायोनी शासन के साथ इमारात का समझौता उस समय हुआ है जब इस्राईल ने अमरीका के समर्थन से फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ हिंसा को बहुत अधिक बढ़ा दिया है और यह समझौता ज़ायोनी शासन का समर्थन और फ़िलिस्तीनियों से ग़द्दारी समझा जा रहा है।

 

इमारात और इस्राईल के बीच कथित शांति समझौते का एक और परिणाम फ़िलिस्तीनी गुटों की ओर से सामने आने वाली संभावित प्रतिक्रियाएं हैं। ग़द्दारी के इस समझौते में फ़िलिस्तीनियों के पक्ष में कछ भी नहीं है और सन 1978 के कैम्प डेविड समझौते और 1974 के अरबा वैली समझौते के विपरीत, ज़मीन के मुक़ाबले में शांति नहीं है बल्कि शांति के मुक़ाबले में शांति है। बिना परिणाम वाले इस समझौते ने फ़िलिस्तीनियों को एक अहम संदेश दिया है कि पश्चिमी एशिया का क्षेत्र अब "अपनी मदद आप" के सिद्धांत के ज़्यादा क़रीब हो गया है। मतलब यह है कि इस समझौते के बाद फ़िलिस्तीनी इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि वे अपनी रक्षा के लिए अबर देशों पर भरोसा नहीं कर सकते क्योंकि अब इस बात की संभावना बहुत बढ़ गई है कि अन्य अरब देश भी इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने लगें।

 

हमास के पोलित ब्योरो के सदस्य ख़लील अलहय्या ने बल देकर कहा है कि संयुक्त अरब इमारात के शासकों की ओर से इस्राईल के साथ संबंधों की स्थापना का समझौता, अरब एकता को नुक़सान पहुंचाएगा। उन्होंने कहा कि इस संबंध में देश-विदेश में फ़िलिस्तीनी गुटों के बीच परामर्श जारी है कि किस तरह इस समझौते का मुक़ाबला किया जाए। इमारात के ख़िलाफ़ अशांति में वृद्धि, इमाराती शासकों के बीच मतभेद और इसी तरह फ़िलिस्तीनियों व इस्राईल के बीच तनाव में बढ़ोतरी, पश्चिमी एशिया के क्षेत्र में ख़तरों व असुरक्षा को बढ़ा देगी। अलहय्या ने चेतावनी दी है कि क्षेत्र में किसी भी समय इस्राईल के साथ टकराव शुरू हो सकता है। (HN)