इस्राईल को मान्यता देने वाले देशों की क़िस्मत फूट क्यों गई?
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अरब दुनिया के साथ इस्राईल के रिश्ते तो कोई नई बात नहीं लेकिन अब यह संबंध औपचारिक रूप से और खुले आम सामने आ रहे हैं यह नई बात है और इसके कुछ मूल कारण हैं।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Aug २०, २०२० १६:२५ Asia/Kolkata
  • इस्राईल को मान्यता देने वाले देशों की क़िस्मत फूट क्यों गई?

अरब दुनिया के साथ इस्राईल के रिश्ते तो कोई नई बात नहीं लेकिन अब यह संबंध औपचारिक रूप से और खुले आम सामने आ रहे हैं यह नई बात है और इसके कुछ मूल कारण हैं।

सबसे पहला कारण तो अरब नरेशों का भय है जो विरोध प्रदर्शनों की लहर के दौरान पैदा हुआ। अरब देशों में फूट पड़ने वाले प्रदर्शनों के दौरान अरब नरेशों को यह एहसास हुआ कि पोलिटिकल इस्लाम उनके लिए बड़ा ख़तरा है और करप्शन के ख़िलाफ़ कोई भी आंदोलन उनकी शाही व्यवस्था के लिए ख़तरा बन सकता है। यहां तक कि अमरीका भी अपने कट्टर घटक हुस्नी मुबारक की सरकार को नहीं बचा सकी।

प्रदर्शनों की लहर के बाद इलाक़े में सुरक्षा की स्थिति में भी बदलाव आने लगा। अमरीका ने हर प्रयत्न कर लिया मगर सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद को नहीं हटा पाया। सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर बहुत बड़े हमले हो गए और अमरीका सिर्फ़ तमाशा देखता रहा। अरब शाही सरकारें जो अमरीका और यूरोपीय देशों को अपने वजूद की गैरेंटी समझती थीं अब यह महसूस करने लगी हैं कि अमरीका और यूरोप उनके काम नहीं आएंगे। मरीका ने हर प्रयत्न कर लिया मगर सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद को नहीं हटा पाया। सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठान

इस्राईल ने अरब सरकारों को यह यक़ीन दिलाया कि वह ईरान के मुक़ाबले में उनकी मदद के लिए तैयार है। इस्राईल से इन अरब सरकारों के संबंध चल पड़े और दशकों तक ख़ामोशी से चलते रहे। 2009 में जब नेतनयाहू इस्राईल की सत्ता में लौटे तो उन्होंने अरब सरकारों से ख़ुफ़िया संबंधों का एलान करने की नीति अपना ली। इसके बाद सहयोग के छोटे छोटे कूटनैतिक क़दम उठाए जाने लगे। इस्राईल ने बड़ा क़दम उस समय उठाया जब इंटरनैशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी के हेड क्वार्टर्ज़ इमारात में बनाने में कूटनैतिक मदद की लेकिन इसके बदले एक शर्त यह रखी कि इस्राईली कूटनयिकों को हेड क्वार्टर्ज़ में स्वीकार करना पड़ेगा। 2015 में इस्राईल ने हेड क्वार्टर्ज़ में डिप्लोमेटिक मिशन खोल लिया तो इस तरह इमारात में इस्राईल का पहला कूटनैतिक मिशन खुल गया।

अब अरब इमारात और इस्राईल के संबंधों का औपचारिक एलान हुआ है लेकिन इस पर काम डेढ़ साल से जारी था और दो महीना पहला यह समझौता हो चुका था। इमारात ने अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव से 82 दिन पहले इस समझौते का एलान करके ट्रम्प को बड़ा चुनावी तोहफ़ा दिया है।

इस बीच वेस्ट बैंक को इस्राईल में मिलाने का मुद्दा उठाया गया और अमरीकियों ने यह पत्ता सफ़ाई से खेला। इस योजना को रोकने की बात की और दूसरी ओर इस्राईल इमारात समझौते का एलान करवा दिया।

इतिहास से पाठ तो यह मिला है कि इस्राईल का साथ देने और उसे मान्यता देने वालों को बाद में पछताना पड़ा। इस्राईल को सबसे पहले मान्यता देने वाले मिस्र और जार्डन का हाल सारी दुनिया के सामने है।

यह दोनों ही देश आज पहले की तुलना में कमज़ोर और बटे हुए हैं। यह दोनों देश कभी ख़ुद को क्षेत्र में शांति व सुरक्षा का ठेकेदार कहते थे लेकिन आज पछताते हैं कि उन्हें शांति के नाम पर क्या मिला। इन दोनों देशों को जो आर्थिक वादे दिए गए थे आज तक पूरे नहीं हुए। इस्राईल को मान्यता देने वाला फ़िलिस्तीन का फ़त्ह आंदोलन भी आज ख़ुद से सवाल पूछने पर मजबूर है कि ओस्लो समझौता करके उसे क्या मिला? और इसी विचार के तहत अलफ़त्ह अब हमास के क़रीब जा रहा है।

आसिफ़ शाहद

पाकिस्तान के वरिष्ठ टीकाकार

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