धार्मिक मतभेद फैलाना, नेतनयाहू की सऊदी अरब यात्रा का बुनियादी लक्ष्य
इस्राईली प्रधानमंत्री बेनयामिन नेतनयाहू की सऊदी अरब की यात्रा के बारे में ख़बरें सामने आने के बाद, सऊदी मीडिया ने, इस्राईली मीडिया के विपरीत इस संबंध में पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है।
इन दिनों ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री की सऊदी अरब की यात्रा और इस देश के युवराज मुहम्मद बिन सलमान से उनकी मुलाक़ात की ख़बरें, ज़ायोनियों से जुड़े हुए संचार माध्यमों में सुर्ख़ियों में हैं। कहा जा रहा है कि यह मुलाक़ात लाल सागर के तट पर स्थित नियोम शहर में अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की मौजूदगी में हुई। इस यात्रा और इस मुलाक़ात की ख़बर सामने आने के बाद सऊदी अरब के मीडिया ने ज़ायोनी संचार माध्यमों के बिलकुल विपरीत इस ख़बर पर पूरी तरह से मौन धारण किया, यहां तक कि उन्होंने इस संबंध में सऊदी विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान की अस्पष्ट व अत्यंत कमज़ोर प्रतिक्रिया को भी कवरेज नहीं दी जिन्होंने इस मुलाक़ात का खंडन किया था।
ज़ायोनी प्रधानमंत्री और सऊदी युवराज की मुलाक़ात के बारे में मीडिया व राजनैतिक टीकाकार जो आरंभिक समीक्षाएं पेश कर रहे हैं, उनमें से एक, अमरीका के हारे हुए राष्ट्रपति के शासनकाल के अंतिम दिनों में ज़ायोनी शासन से संबंध स्थापित करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का विषय है। सऊदी अरब जेकपाॅट के रूप में इस प्रक्रिया से जुड़ने की कगार पर पहुंच चुका है। इस यात्रा के बारे में एक दूसरी समीक्षा जो पेश की जा रही है और जिसे पेश करने वालों में मुजतहिद के नाम से ट्वीटर अकाउंट चलाने वाला सऊदी अरब के राजपरिवार का एक अज्ञात व्यक्ति भी शामिल है, यह है कि इस मुलाक़ात में अमरीकी राष्ट्रपति के शासन के अंतिम दिनों में ईरान पर सैन्य हमले की संभावना का जायज़ा लेना है।
एक और संभावना, जो इन दिनों सऊदी अरब और ज़ायोनी शासन की हड़बड़ाहट का मुख्य कारण दिखाई पड़ती है, यह है कि अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम उनकी अपेक्षा के विपरीत रहे हैं। इस अर्थ में कि ट्रम्प और उनके अधिक काम करने वाली संस्थाएं व लोग, चुनाव से पहले ही इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि जीत ट्रम्प की ही होगी। इसी के चलते उन्होंने अपने क्षेत्रीय पिछलग्गुओं को भी यह विश्वास दिला रखा था कि चुनाव में ट्रम्प ही जीतेंगे लेकिन उनकी सोच ग़लत साबित हुई जिसके परिणाम स्वरूप ट्रम्प के क्षेत्रीय पिछलग्गू हड़बड़ाए हुए हैं। उनके लिए ट्रम्प की हार पर विश्वास कर पाना बहुत मुश्किल हो गया है और शायद चुनाव में धांधली के ट्रम्प के आरोप की एक वजह भी यही है। इस समीक्षा के आधार पर ज़ायोनी शासन व सऊदी अरब, ट्रम्प की मदद से अमरीका की नई सरकार के लिए कुछ पटकथाएं तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं जिनमें से एक ईरान के संबंध में काम करने के लिए जो बाइडन के सामने कठिनाइयां पैदा करना है।
एक अन्य संभावना, जिसे वर्तमान हालात में ज़ायोनी व्यवहारिक बनाना चाहते हैं और जिसके बारे में संचार माध्यमों विशेष कर ज़ायोनी व सऊदी मीडिया में कुछ नहीं कहा जा रहा है, अमरीका की अगली सरकार के शासनकाल में सऊदी अरब व इस्राईल की ओर से ईरान को ख़तरा बना कर पेश करना है। ऐसा प्रतीत होता है कि ज़ायोनी, वर्तमान समय को कुछ अरब देशों विशेष कर सऊदी अरब को जाल में फंसाने के लिए सुनहरा मौक़ा समझ रहे हैं ताकि इस्राईल के पहले प्रधानमंत्री और ज़ायोनी शासन के मुख्य संस्थापक बिन गोरियन की इस बात को व्यवहारिक बना सकें कि यहूदियों व अरबों के बीच ऐतिहासिक संबंध स्थापना, सिर्फ़ आले सऊद के हाथों ही संभव है, क्योंकि ज़ायोनी इस वास्तविकता से अच्छी तरह अवगत हैं कि आले सऊद भी अपने शासन की रक्षा को जनता से विश्वास हासिल करने पर नहीं बल्कि ज़ायोनी शासन से एकता व गठजोड़ पर निर्भर समझते हैं।
एक अहम बिंदु यह भी है कि सऊदी अरब व अन्य अरब सरकारों से संबंध स्थापित करने में ज़ायोनी शासन का बुनियादी उद्देश्य शिया व सुन्नी के बीच धार्मिक मतभेद भड़काना है ताकि इस साज़िश के माध्यम से क्षेत्रीय देशों का बंटवारा किया जा सके और इस तरह इस्राईल पूरे क्षेत्र पर अपना वर्चस्व जमा सके। यह वह लक्ष्य है जिसका इस्राईल के अनेक नेताओं ने अपने बयानों में खुल कर उल्लेख किया है। ज़ायोनी शिक्षामंत्री युवाफ़ गालांत ने नेतनयाहू की सऊदी अरब की यात्रा पर प्रतिक्रिया जताते हुए सोमवार को ज़ायोनी सेना के रेडियो से इंटरव्यू में कहाः "यह वह सफलता है जिसका सपना हमारे पूर्वज देखा करते थे। अस्ली सफलता सुन्नी जगत की ओर से इस्राईल को स्वीकार करना और उससे दुश्मनी ख़त्म करना है। अमरीका, इस्राईल और अन्य सहभागियों की सम्मलिति से ईरानी शियत के ख़िलाफ़ एक मोर्चा तैयार हो रहा है।" (HN)
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