ओटोमन साम्राज्य का सपना, अर्दोगान का प्लान क्या है? जाने सच्चाई
तुर्की के राष्ट्रपति अपनी विदेशी सैन्य कार्यवाहियों के नशे में चूर, अन्य देशों के मामलों में टांग फंसाने में व्यस्त हैं।
तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब आर्मीनिया के खिलाफ युद्ध में आज़रबाइजान गणराज्य की जीत के उत्सव में 44 दिवसीय इस युद्ध के नशे में इतना चूर हुए कि उनके बयानों से कई विवादों ने जनम ले लिया।
अर्दोगान ने इस अवसर पर अपने बयान में कहा कि मेरी इच्छा है कि आर्मीनिया की जनता अपने नेताओं के बोझ से जो हमेशा की तरह झूठ में फंसे हैं और अपने राष्ट्र को निर्धनता के भंवर में फंसाए हैं, छुटकारा पाएगी।
अर्दोगान ने अपने बयान में एक पुरानी आज़री कविता पढ़ी जो वास्तव में अलगाववाद को बढ़ावा देती है। ईरान के आज़रबाइजान प्रान्त में आज़री जाति के लोग रहते हैं।
अर्दागान द्वारा इस कविता पढ़े जाने के बाद इस्लामी गणतंत्र ईरान ने बेहद कड़ा रुख अपनाया हालांकि बाद में तुर्की के विदेशमंत्री ने कहा कि अर्दोगान को कविता के इतिहास और संवेदनशीलता के बारे में कुछ पता नहीं था।
विशेषज्ञों का कहना है कि अर्दोगान ने यह बयान उस समय दिया है जब ईरान व तुर्की के बीच किसी भी मुद्दे पर कोई तनाव नहीं है जिसका साफ मतलब यह है कि वह किसी वजह से ईरान के साथ तनाव चाहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान में अलगाववाद को बढ़ावा देने वाली यह कविता, यूंही नहीं अर्दोगान की ज़बान पर आयी है बल्कि यह वास्तव में क़राबाग युद्ध के दूसरे चरण का हिस्सा है। पहले चरण में आज़रबाइजान गणराज्य की अवैध अधिकृत भूमियों की आज़ादी के बहाने तुर्की ने, इस्राईल और ब्रिटेन की मदद से, तुर्कवादी शक्तियों को एक दूसरे से जोड़ने और नया कारीडोर बनाने की कोशिश की ताकि विशेषकर ऊर्जा के क्षेत्र में ईरान की क्षमताओं को कम किया जा सके। अब दूसरे चरण में ईरान के पश्चिमोत्तरी सीमा पर अलगाववाद को बढ़ावा देना है।
मध्यएशियाई मामलों के विशेषज्ञ, बहराम अमीर अहमदियान का कहना है कि अर्दोगान ने ईरानी जनता और सरकार के लिए आपत्तिजनक कविता पढ़ कर तुर्की और आज़रबाइजान गणराज्य को ए दूसरे से निकट दर्शाने की कोशिश की है। उन्होंने इस संदर्भ में एक देश के राष्ट्रपति नहीं बल्कि एक बड़ी कंपनी के प्रमुख की भूमिका निभाई है क्योंकि राजनेता को पता होता है कि किसी भी देश के लिए उसकी अखंडता सब से अधिक महत्वपूर्ण होती है।
बाकू में अर्दोगान की कविता पढ़ने से यह साबित होता है कि अरस नदी का दक्षिणी भाग उसके उत्तरी भाग से संबंध रखता है जबकि इतिहासिक तथ्यों से यह पता चलता है कि अरस नदी का उत्तरी भाग, उसके दक्षिणी भाग से संबंध रखता है। अब अगर भुगोल में कोई सुधार होगा तो वह यह होना चाहिए कि अरस नदी का उत्तरी भाग ईरान के से जुड़ जाए न कि उसका उल्टा।
अर्दोगान का नशा!
तुर्की में जब से जस्टिस एंड डेवलेपमेंट पार्टी की सत्ता आयी है इस देश की विदेश नीतियों में बहुत कुछ बदल गया है।
दो दशक पहले जब इस पार्टी ने तुर्की में सत्ता संभाली तो पड़ोसियों के साथ तनाव को शून्य करने की इस देश के विदेशमंत्री दाऊद ओगलू की नीति पर काम किया गया और धीरे धीरे तुर्की और सीरिया के संबंध इतने अच्छे हो गये कि अर्दोगान, बश्शार असद को अपना भाई कहने लगे।
मगर यह भाईचारा अधिक दिनों तक नहीं रहा और जैसे ही इस्लामी देशों में क्रांतियां आने लगीं और ट्यूनेशिया, मिस्र और लीबिया में मुस्लिम ब्रदरहुड को सफलताएं मिलने लगीं तो अचानक ही अर्दोगान ने सब कुछ छोड़ दिया और सीरिया की कानूनी सरकार के खत्म करने की मांग करने लगे।
सीरिया की सरकार गिराने के लिए अमरीका व सऊदी अरब तथा इस्राईल सहित कई सरकारों का साथ पाकर अर्दोगान को इतना नशा चढ़ गया था कि एक बार उन्होंने यहां तक कह दिया कि बहुत जल्दी वह दमिश्क की उमवी मस्जिद में जीत की नमाज़ पढ़ेंगे लेकिन हालात वैसे नहीं हुए जैसा अर्दोगान चाहते थे और ईरान व इस्लामी प्रतिरोध को मोर्चे ने सीरिया के रणक्षेत्र में क़दम रखा तो बाज़ी पलट गयी और आज सीरिया की सरकार न केवल यह कि गिरी नहीं बल्कि पहले से अधिक मज़बूत हो गयी है। अर्दोगान को गुस्सा आना ही था क्योंकि सीरिया की सरकार गिराने की कोशिश करने वाले दाइश और अन्य आंतकवादी संगठनों पर उन्होंने काफी मेहनत की थी। अर्दोगान का गुस्सा उनके बयान में नज़र आता था क्योंकि लगभग हर भाषण में वह सीरिया के राष्ट्रपति बश्शार असद को खुल कर और ईरान को ढंके छुपे रूप में निशाना बनाने लगे, मगर उस समय भी ईरान ने संयम व धैर्य का प्रदर्शन किया।
सीरिया के हालात से निराश अर्दोगान ने नीति बदलने में भलाई जानी और ईरान व रूस की ओर बढ़ने लगे और इस तरह से आस्ताना शांति प्रक्रिया आरंभ हुई। अर्दोगान ने सीरिया की सरकार गिराने के लिए अरबों डालर खर्च किये थे लेकिन उसके बदले में उन्हें नाकामी और चालीस लाख सीरियाई शरणार्थियों का बोझ ढोना पड़ रहा है।
अर्दोगान ने अपने दूसरे पड़ोसी इराक़ को भी नहीं बख्शा और सन 2015 में आतंकवादी संगठन दाइश के खिलाफ संघर्ष के बहाने उत्तरी इराक़ में अपने सैनिक भेज दिये और जब बगदाद ने इस पर आपत्ति की तो तुर्की ने बेहद तीखी प्रतिक्रिया प्रकट की।
इराक़ के प्रधानमंत्री हैदर अलएबादी ने इराक़ में तुर्की सैनिक की तैनाती पर विरोध करते हुए जब उनसे अपने देश से निकलने की मांग की तो तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगान ने कहा कि तुम कौन हो जो मेरी सेना से कह रहे हो कि इराक़ से निकल जाए?
इसी तरह, तुर्की के तत्कालीन प्रधानमंत्री अर्दोगान द्वारा हरी झंडी दिखाए जाने के बाद बयान दिया कि बगदाद का जो दिल चाहे वह कहे लेकिन तुर्की के सैनिक दाइश से लड़ने और वहां जातीय ढांचे की सुरक्षा के लिए तैनात रहेंगे।
दाइश के अंत के बाद तुर्की का यह सैन्य हस्तक्षेप, पीकेके से मुकाबले के बहाने जारीह और आए दिन वह इराक़ के भीतर सैन्य अभियान चलाता है और तुर्की के युद्धक विमान, हर हफ्ते उत्तरी इराक़ पर बमबारी करते हैं।
इस समय तुर्की के सैनिक, एशिया, युरोप और अफ्रीका जैसे तीन महाद्वीपों और दुनिया के 13 देशों में मौजूद हैं जिसकी वजह से अमरीका के बाद तुर्की वह दूसरा देश है जिसके सैनिक इस प्रकार के विदेशों में तैनात हैं। तुर्की के सैनिक, साइप्रस के तुर्क क्षेत्रों में, अफगानिस्तान, लेबनान, कोसोवो, बोस्निया, अलबानिया, सीरिया, इराक, लीबिया, सोमालिया, क़तर, पाकिस्तान और आज़रबाइजान गणराज्य में तैनात हैं। इनमें से अधिकांश को अर्दोगान के सत्ताकाल में तैनात किया गया है।
सवाल यह है कि तुर्की ने दो दशकों से इस प्रकार की आक्रामण नीतियां क्यों अपना ली हैं?
इसका पहला जवाब तो यह है कि तुर्की, अपना स्वर्णिम दौर वापस लाने की कोशिश कर रहा है। तुर्की में प्रजातंत्र से पहले ओटोमन साम्राज्य था 6 सदी पहले की दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों पर राज करता था लेकिन अन्य सभी सामाज्यों की तरह ओटोमन साम्राज्य का सूरज भी डूब गया और अब कहा जा रहा है कि तुर्की की जस्टिस एंड डेवलेपमेंट पार्टी और विशेषकर अर्दोगान तुर्की के शानदार अतीत को फिर से वापस लाना चाहते हैं और विभिन्न देशों में सैनिक भेजना इसी का चिन्ह है।
इस प्रकार की नीतियों की दूसरी वजह, तुर्की की आंतरिक समस्याओं पर पर्दा डालने की कोशिश भी हो सकती है। तुर्की को गत कुछ बरसों के दौरान, बड़ी बड़ी आर्थिक समस्याओं का सामना रहा है और सन 2018 से अब तक उसकी करेन्सी 50 प्रतिशत से अधिक गिर गयी है। बेरोज़गारी भी बढ़ रही है इन सब की वजह से अर्दोगान अपने देश के जनमत का ध्यान दूसरी ओर हटाना चाहते हैं।
पश्चिमी एशिया वह क्षेत्र है जहां अर्दोगान की तरह से बहुत से तानाशाह आए जो शक्ति के नशे में चूर थे और अपने पड़ोसियों पर क़ब्ज़ा जमाने की कोशिश में थे।
इराक़ में सद्दाम, लीबिया में गद्दाफी, ट्यूनेशिया में ज़ैनुलआबेदीन और मिस्र में हुस्नी मुबारक उन लोगों में शामिल हैं जो अन्य देशों के मामलों में हस्तक्षेप मे तिनक भी संकोच नहीं करते थे लेकिन सब के सब को राज सिंहासन से उतार दिया गया।
हमें लगता है कि इतिहास में अर्दोगान के लिए भी बहुत से पाठ हैं। इतिहास हमें बताता है कि विस्तारवादी तानाशाहों के लिए उसके आंचल में नाकामी और अपमान के अलावा कुछ नहीं है।Q.A.
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