क्या डूबती नांव में सवार हो गए हैं इमारात और बहरैन
पिछले कुछ हफ़्ते से इस्राईल-फ़िलिस्तीन विवाद गहरा गया और इस्राईली सेना ने ग़ज़्ज़ा के ख़िलाफ़ एक और घातक जंग छेड़ दी। यह हमला और अवैध अधिकृत पूर्वी अल-क़ुद्स के शैख़ जर्राह इलाक़े से फ़िलिस्तीनियों को निकालने के ख़तरे तथा रमज़ान के दौरान मस्जिदुल अक़सा पर इस्राईली फ़ोर्स के हमले, जिसके नतीजे में फ़िलिस्तीनियों का प्रदर्शन फूट पड़ा, ये सब 73 साल से फ़िलिस्तीनी दुर्भाग्य का एक और अध्याय है।
लेकिन ये घटनाएं, चार अरब देशों और इस्राईल के बीच संबंध सामान्य करने वाले समझौतों की नाकामी को दर्शाती हैं, जिसमें 2020 में हुए कथित अब्राहम समझौते की नाकामी भी शामिल है। इन समझौतों का पश्चिम एशिया में शांति को बढ़ावा देने और इस्राईल की फ़िलिस्तीन में विस्तारवादी नीतियों को लगाम लगाने वाले समझौते के तौर पर प्रचार हुआ, लेकिन दोनों ही मोर्चे पर ये समझौते नाकाम साबित हुए।
संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया किस चीज़ में ढली हैॽ
इस्राईल के साथ संबंध सामान्य करने का एलान, वादों से भरा हुआ था जिसमें पश्चिम एशिया में शांति क़ायम होने, अतिग्रहित वेस्ट बैंक के इलाक़ों को शामिल करने की इस्राईली योजना पर रोक लगने और पूरे क्षेत्र के लिए आर्थिक विकास का दरवाज़ा खुलने जैसे वादे शामिल थे।
संबंध सामान्य करने के समझौते का मुख्य नतीजा, यूएई के इस्राईल के बड़े व्यापारिक साझेदार के तौर पर सामने आ रहा है। उसने ज़ायोनी शासन का दशकों तक बायकॉट कर रखा था, जिससे अब वह पीछे हट गया।
इस्राईल फ़िलिस्तीनियों का सिस्टमैटिक रूप से जातीय सफ़ाए में लगा हुआ है। पुलिस और ग़ैर यहूदियों के साथ अंतर करने वाले क़ानून की मदद से इस्राईली अधिकारी, फ़िलिस्तीनियों को अतिग्रहित पूर्वी अल-क़ुद्स से निकालने पर अड़े हुए हैं। शैख़ जर्राह में कई परिवारों पर ताक़त के बल पर निकलने का ख़तरा मंडरा रहा है।
इस्राईली फ़ोर्सेज़ ने फ़िलिस्तीनियों इसाईयों को भी धमकी दी और उन्हें ईस्टर सर्विस के मौक़े पर होली सेपल्कर चर्च में जाने से रोक दिया।
ग़ज़्ज़ा पर इस्राईली हमले भी रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।
संबंध सामान्य करने की क़ीमत
अरब देशों की जनता बारंबार फ़िलिस्तीनी कॉज़ के प्रति अपनी प्रतिज्ञा दिखा चुकी है। 2019-2020 में 13 अरब देशों में अरब अपिनियन इंडेक्स के सर्वे के मुताबिक, जो 30 करोड़ की आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, 88 फ़ीसद भाग लेने वालों ने इस्राईल के साथ संबंध सामान्य करने के विचार को ख़ारिज किया था। 79 फ़ीसद लोगों का कहना था कि फ़िलिस्तीन, सभी अरबों के लिए बड़ी चिंता का विषय है। सूडान में 79 फ़ीसद लोगों ने कहा कि वे फ़िलिस्तीनियों के अधिकार सुनिश्चित होने से पहले इस्राईल के साथ संबंध के ख़िलाफ़ हैं।
अब यह भी साफ़ होता जा रहा है कि सऊदी अरब, यूएई के नक़्शे क़दम पर नहीं चलेगा, हालांकि ट्रम्प और नेतनयाहू का मुख्य लक्ष्य सऊदी अरब को संबंध सामान्य करने के लिए तय्यार करना था। फ़िलिस्तीनियों पर ज़ायोनी शासन के हमले और क़ुद्स में मुसलमानों के पवित्र स्थलों के अनादर के मद्देनज़र सऊदी अरब की ओर से किसी भी तरह का क़दम बहुत बड़ी मूर्खता होगी। ख़ास तौर पर तब जब सऊदी युवराज बिन सलमान घरेलू, क्षेत्रीय और अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी इमेज सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, संबंध सामान्य करने की ओर किसी भी क़दम से वे अपने शासन को वैधता देने के ज़रूरी तत्व से वंचित हो जाएंगे। (साभारः अल-जज़ीरा)