तालिबान ने लोया जिरगा से भी महिलाओं को दूर रखा
गुरुवार को काबुल में तालिबान की मेज़बानी में शुरू हुए तीन दिवसीय लोया जिरगा में 3000 से ज़्यादा क़बायली नेताओं और धर्मगुरुओं ने भाग लिया, जिसमें महिलाओं की शिक्षा समेत विभिन्न मुद्दों पर विचार विमर्श किया गया, लेकिन इसमें अफ़ग़ान महिलाओं की भागीदारी बिल्कुल नहीं थी।
तालिबान द्वारा महिलाओं को पूरी तरह से नज़ंर अंदाज़ किए जाने का देश की महिलाओं ने विरोध किया है और संयुक्त राष्ट्र संघ से अनुरोध किया है कि वह तालिबान सरकार को औपचारिकता प्रदान न करे।
दर असल, यह पहली बार है कि तालिबान ने इस तरह का कोई सम्मेलन आयोजित किया है, वरना उनकी विचारधारा में ग़ैर-तालिबान के साथ शासन के मामलों में सलाह और विचार विमर्श के लिए कोई जगह नहीं है।
कहा जा रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने तालिबान नेताओं को यह सलाह दी थी कि देश में लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए वह इस तरह के सम्मेलन का आयोजन करें, ताकि तालिबान आम लोगों से जुड़ सकें और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके बहिष्कार में कुछ नर्मी आ सके।
इसके बावजूद, लोया जिरगा को संबोधित करते हुए तालिबान के सुप्रीम लीडर मुल्लाह आख़ूंदज़ादा ने कहाः दुनिया हमारे आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे और हमें यह सिखाने का प्रयास नहीं करे कि शासन कैसे किया जाता है।
तालिबान के लोया जिरगा के बारे में अफ़ग़ान विश्लेषक फ़रहाद अबरार का कहना है कि यह सम्मेलन या लोया जिरगा अधूरा है, क्योंकि इसमें देश की आधी आबादी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
पिछले साल अफ़ग़ानिस्तान से अमरीका के बाहर निकलने और काबुल पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से तालिबान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को लेकर दुविधा का शिकार हैं। इसे लेकर ख़ुद तालिबान के बीच मतभेद हैं। एक धड़ा शासन के मामले में एक उदार छवि पेश करना चाहता है तो दूसरा अपने कट्टरवादी सिद्धांतों में किसी तरह की ढील देने और महिलाओं के अधिकारों पर बात करने का कट्टर विरोधी है।
बहरहाल देर या सवेर तालिबान को यह समझना ही होगा कि वह देश को दुनिया से काटकर और देश की आधी आबादी को पूरी तरह से हाशिए पर डालकर शासन नहीं कर सकते हैं। आख़िरकार तालिबान को महिलाओं के साथ ही अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करना ही होगा और अपनी कट्टरपंथी सोच में कुछ नर्मी दिखानी ही होगी। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो बाहर से ही नहीं बल्कि देश के भीतर से ही उनकी नई और कमज़ोर सरकार को असली ख़तरे का सामने करना पड़ेगा और एक बार फिर देश टकराव के रास्ते पर चल पड़ेगा।