महारानी एलिज़ाबेथ के बाद ब्रिटेन के नए किंग के सामने चुनौतियां
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ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ का क़रीब सात दशक लंबे शासन के बाद 96 साल की आयु में निधन हो गया। उनके निधन के तुरंत बाद ब्रिटेन की राजगद्दी उनके उत्तराधिकारी और वेल्स के पूर्व प्रिंस चार्ल्स को मिल गई है। इस प्रकार अब उन्हें किंग चार्ल्स तृतीय के रूप में जाना जाएगा।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Sep ०९, २०२२ १४:३० Asia/Kolkata
  • महारानी एलिज़ाबेथ के बाद ब्रिटेन के नए किंग के सामने चुनौतियां

ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ का क़रीब सात दशक लंबे शासन के बाद 96 साल की आयु में निधन हो गया। उनके निधन के तुरंत बाद ब्रिटेन की राजगद्दी उनके उत्तराधिकारी और वेल्स के पूर्व प्रिंस चार्ल्स को मिल गई है। इस प्रकार अब उन्हें किंग चार्ल्स तृतीय के रूप में जाना जाएगा।

महारानी एलिज़ाबेथ ने कहा था कि वे 95 साल की उम्र में राजकाज शाही परिवार के बीच बांट देंगी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और राजनीति से सन्यास नहीं लिया। उनका जन्म 21 अप्रैल 1926 को बर्कले में हुआ था। एलिज़ाबेथ, उस वक़्त के ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम के दूसरे बेटे ड्यूक ऑफ़ यॉर्क, अल्बर्ट की बड़ी बेटी थीं। अपने पिता के निधन के बाद 6 फ़रवरी 1952 को वे ब्रिटेन की महारानी बनीं। वे सबसे लंबे वक़्त तक ब्रिटेन पर राज करने वाली महारानी बनीं।

उनके बेटे चार्ल्स अब उनकी जगह किंग बन हैं, लेकिन नए सम्राट के रूप में उनके सामने कई चुनौतियां होंगी। हालांकि कहा जाता है कि ब्रिटेन में यह पद सिर्फ़ मानद है, लेकिन इसकी शक्तियों पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि ब्रिटिश सम्राट के पास अभी भी काफ़ी शक्तियां हैं। किंग युद्ध की घोषणा कर सकता है, संसद को भंग कर सकता है, प्रधान मंत्री को बर्ख़ास्त कर सकता है और ख़ुद प्रधान मंत्री पद के लिए किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकता है। उसके पास इतनी शक्तियां हैं कि अगर यही किसी दूसरे देश के राजा के पास होती हैं तो ब्रिटिश मीडिया इसे पक्षपात और उस देश को अलोकतांत्रिक राष्ट्र बताते नहीं थकता है। यहां तक कि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे कॉमन वेल्थ देशों में भी एलिज़ाबेथ को कुछ इसी तरह के अधिकार हासिल थे, हालांकि इन देशों की जनता के व्यापक विरोध के चलते उनमें कुछ कटौती कर दी गई।

महारानी एलिज़ाबेथ के बाद प्रिंस चार्ल्स की ताजपोशी ऐसी स्थिति में हो रही है कि ख़ुद ब्रिटेन में इस सल्तनत को समाप्त करने की मांग बढ़ती जा रही है। लोगों का मानना है कि जब देश में जनता द्वारा चुने गए जनता के प्रतिनिधि मौजूद हैं, तो शाही परिवार के रख रखाव और उनकी देखभाल पर करोड़ों डॉलर क्यों ख़र्च किए जाएं। दूसरे लोगों का यह कहना है कि शाही व्यवस्था का जारी रहना, वास्तव में उन अत्याचारों का समर्थन करना है, जो शाही परिवारों ने विगत में आम लोगों पर किए हैं।

प्रिंस चार्ल्स कि जो अब किंग चार्ल्स बन चुके हैं, ब्रिटेन की परंपरागत नीतियों से कुछ हटकर दृष्टिकोण रखते हैं। 70 वर्षीय चार्ल्स, दृष्टिकोण और सपनो नामक किताब में रॉबर्ट जाबसन लिखते हैः चार्ल्स यूरोपीय देशों की इस्लाम विरोधी नीतियों के विरोधी हैं और उनका मानना है कि इससे मानवाधिकारों का हनन होता है। इस प्रकार, वे ब्रिटेन की लड़ाओ और हथियार बेचों की नीति के समर्थक नहीं हैं। उन्होंने 2003 में इराक़ पर अमरीका और उसके सहयोगी देशों के हमले की भी आलोचना की थी और कहा था कि हमारे प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर को इराक़ में सामूहिक विनाश के हथियारों के दावे के बारे में और इस देश पर हमले से पहले अधिक जांच करनी चाहिए थी।