आज़रबाइजान और अर्मेनिया फिर टकरा गए
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आज़रबाइजान और अर्मेनिया ने मंगलवार को तड़के एक दूसरे पर युद्ध विराम का उल्लंघन करने और सीमा पर गोलाबारी का आरोप लगाया है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Sep १३, २०२२ १०:०७ Asia/Kolkata
  • आज़रबाइजान और अर्मेनिया फिर टकरा गए

आज़रबाइजान और अर्मेनिया ने मंगलवार को तड़के एक दूसरे पर युद्ध विराम का उल्लंघन करने और सीमा पर गोलाबारी का आरोप लगाया है।

सीमा पर हुई झड़पों में आज़रबाइजान को जानी नुक़सान पहुंचने की ख़बरे हैं। हालांकि आज़रबाइजान ने गोलाबारी में मरने वाले अपने सैनिकों की संख्या के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है।

ग़ौरतलब है कि दोनों ही पड़ोसी देश 2020 में विवादित क्षेत्र नागोरो-कराबाख़ को लेकर युद्ध लड़ चुके हैं, जिस पर अर्मेनिया का कंट्रोल था, लेकिन आज़रबाइजान इस युद्ध में काफ़ी बड़े भाग को उससे आज़ाद कराने में सफल रहा।

दोनों देशों के बीच युद्ध विराम के बाद सीमा पर होने वाली झड़पों के लिए दोनों ही एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। अर्मेनियाई रक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा है कि गोरिस, सोक और जेरमुक शहरों पर आज़रबाइजान की ओर से हवाई हमले और गोलाबारी की गई, जिसमें आज़री सेना के ड्रोन विमानों ने भी भाग लिया। जिसका अर्मेनियाई सेना ने उचित जवाब दिया।

लेकिन दूसरी ओर, आज़रबाइजान के रक्षा मंत्रालय ने अर्मेनियाई सेना पर बड़े पैमाने पर विध्वंसक कार्यवाहियों का आरोप लगाते हुए कहा कि उसके सैन्य ठिकाने दुश्मन सेना की गोलाबारी की चपेट में आ गए। जिसमें सैनिकों को कुछ नुक़सान हुआ है।

रूस इस क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति के रूप में दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करता है, लेकिन वह सामूहिक सुरक्षा संधि के ज़रिए अर्मेनिया का सहयोगी भी माना जाता है।

दोनों पड़ोसी देशों के बीच 1980 के दशक के अंत में पहली बार लड़ाई भड़की थी, जब दोनों ही सोवियत संघ के निंयत्रण में थे। इस लड़ाई में अर्मेनिया ने नागोरनो कराबाख़ पर क़ब्ज़ा कर लिया था। हालांकि विश्व समुदाय ने इस क्षेत्र पर कभी भी अर्मेनिया की संप्रभुता को मान्यता नहीं दी। इस लड़ाई में क़रीब 30,000 लोगों की मौत हुई थी।

आज़रबाइजान ने इस क्षेत्र को 2020 की लड़ाई में आज़ाद करा लिया। 6 हफ़्तों तक चलने वाली इस लड़ाई में क़रीब 6500 लोग मारे गए थे। युद्ध विराम के लिए रूस ने मध्यस्थता की थी।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इस तरह की घटनाओं से जहां दोनों के बीच अविश्वास बढ़ेगा, वहीं बाहरी शक्तियों को क्षेत्र में हस्तक्षेप का मौक़ा भी मिलेगा।