अमेरिका यूरोप को चार गुना महंगी गैस बेच रहा हैः फ्रांस
फ्रांस के राष्ट्रपति एमेनुएल मैक्रां ने कहा है कि अमेरिका दोहरा मापदंड अपनाते हुए यूरोप को चार गुना महंगी गैस बेच रहा है।
समाचार एजेन्सी फार्स की रिपोर्ट के अनुसार एमेनुएल मैक्रां ने ब्रसल्ज में यूरोपीय नेताओं के साथ बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेन्स में कहा कि अमेरिका ने गैस बेचने के बारे में दोहरा मापदंड अपना रखा है और इस कारण उन्होंने अमेरिका की आलोचना की।
उन्होंने कहा कि अमेरिका जिस कीमत पर यूरोप को गैस बेच रहा है खुद अमेरिका के अंदर उससे तीन से चार गुना गैस की कीमत कम है और यह दोहरा मापदंड है।
मैक्रां ने कहा कि इस विषय पर चर्चा की जानी चाहिये और दिसंबर महीने में अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान मैं इस विषय पर बात करना चाहता हूं। फ्रांस के राष्ट्रपति ऐसी स्थिति में यह बात कह रहे हैं जब यूरोप में ऊर्जा संकट दिन- प्रतिदिन गहरा होता जा रहा है और लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। फ्रांसीसी समाचार पत्र लोमोन्ड ने इस संबंध में लिखा है कि फ्रांस सरकार को उम्मीद है कि प्रदर्शन और हड़ताल से पैदा होने वाले हालात बेहतर हो जायेंगे।
तेल की रिफाइनरी में पहली हड़ताल आरंभ हुए दो सप्ताह से अधिक का समय गुज़र रहा है और फ्रांस की सरकार को अधिक खतरे का सामना है और इस हड़ताल के व्यापक रूप धारण करने का खतरा मौजूद है। समाचार लोमोन्ड ने लिखा है कि अभी हालात के बेहतर होने के कोई संकेत नहीं हैं और तेल रिफाइनरियो में होने वाला हड़ताल व्यापक रूप धारण कर गया है।
जानकार हल्कों का मानना है कि अमेरिका फार्स की खाड़ी, सऊदी अरब और अब यूक्रेन को दुधारू गाय और अपने हितों की मंडी बना चुका है और वह यूक्रेन को मदद के बहाने अपने हथियारों को खूब बेच रहा है और यूरोपीय देशों को गैस चार गुना कीमत पर बेच रहा है जो उसके असली चेहरे की एक विशेषता है।
इसी प्रकार जानकार हल्कों का मानना है कि कोई भी अमेरिका का सगा नहीं है और उसे न तो मानवाधिकार की चिंता है और न आतंकवाद की। अगर उसे मानवाधिकार की चिंता होती तो कभी भी न तो जापान पर परमाणु बम मारता और न ही मौके का फायदा उठाकर यूरोप को महंगी कीमत पर गैस बेचता। इसी प्रकार इन हल्कों का कहना व मानना है कि उसे डेमोक्रेसी व लोकतंत्र भी कोई चिंता नहीं है।
अगर वास्तव में उसे डेमोक्रेसी की चिंता होती तो जिन देशों में तानाशाही सरकारें हैं उनसे अमेरिका के संबंधों को अच्छा नहीं होना चाहिये था। यही नहीं अमेरिका इन देशों में कभी भी डेमोक्रेसी या लोकतांत्रिक चुनाव की बात तक नहीं करता। क्या उसका यह बर्ताव इस बात का सूचक नहीं है कि उसे डेमोक्रेसी की कोई परवाह नहीं है। यही नहीं जिन अरब देशों में प्रजातंत्र नाम की कोई चीज़ नहीं है उनका वह व्यापक समर्थन भी करता है और उन्हें हथियार बेचता है। सऊदी अरब और अरब इमारात की मिसाल सामने है।
रोचक बात यह है कि हम देख रहे हैं कि जिन देशों में डेमोक्रेसी है और वहां की सरकारें लोकतांत्रिक हैं उनमें से कुछ के साथ अमेरिका के संबंध अच्छे नहीं हैं तो इसकी वजह क्या है? इसकी वजह यह है कि जो भी देश अमेरिका की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करेगा उसे अमेरिका की शत्रुतापूर्ण नीतियों का सामना करना होगा चाहे उसके यहां डेमोक्रेसी हो या न हो।
बहरहाल इससे साफ ज़ाहिर है कि उसे डेमोक्रेसी या मानवाधिकार से कुछ लेना - देना नहीं है उसे केवल अपने हित प्यारे हैं। अमेरिका यूक्रेन को जो हथियार दे रहा है और कई गुना महंगी कीमत पर जो यूरोप को गैस दे रहा है उसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। MM
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