परमाणु समझौता हमारी कार्यसूची में नहीं हैः अमेरिका
अमेरिकी विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा है कि इस समय परमाणु समझौते को जीवित करना हमारी कार्यसूची में नहीं है। उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेन्स में एक बार फिर बल देकर कहा कि परमाणु समझौता वाशिंग्टन की कार्यसूची में नहीं है।
इसी प्रकार उन्होंने दावा किया कि ईरान की रूचि का न होना परमाणु वार्ता के बंद होने का कारण बना है। अमेरिका का राष्ट्रपति बनने से पहले जो बाइडेन ने कई बार कहा था कि अगर वह अमेरिका का राष्ट्रपति बन गये तो परमाणु समझौते में वापस आ जायेंगे परंतु राष्ट्रपति बन जाने के बाद उन्होंने भी ईरान के खिलाफ अधिकतम दबाव की नीति अपनाई परंतु ईरान अब तक अपनी वैध व कानूनी मांगों से पीछे नहीं हटा जबकि अमेरिका अपनी अवैध मांगों को ईरान से मंगवाना चाहता है जिसे ईरान ने अस्वीकार कर दिया है।
वास्तव में जो बाइडेन जब से अमेरिका का राष्ट्रपति बने हैं तब से उन्होंने कोई एसा काम नहीं किया जिससे यह पता चले कि वह परमाणु समझौते में वापस आना चाहते हैं। अमेरिका ने आज तक परमाणु समझौते पर अमल नहीं किया और रोचक बात यह है कि अमेरिकी अधिकारी यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि परमाणु वार्ता के बंद होने का कारण ईरान है जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। अमेरिका ईरान से अतार्किक मांगे करता है और ईरान कभी भी उसकी अर्ताकिक मांगों स्वीकार नहीं करता। दूसरे शब्दों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर दबाव डालने और अपनी अतार्किक मांगों के सामने तेहरान को झुकाने के लक्ष्य से एक तरफा तौर पर परमाणु समझौते से निकल गये और इस बात की प्रतीक्षा ही करते रह गये कि ईरानी अधिकारी बात करने के लिए उनसे संपर्क करेंगे परंतु ईरान, ट्रंप की अतार्किक मांगों के सामने नहीं झुका और ईरान और ईरानी राष्ट्र ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया परंतु अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इतिहास से सबक नहीं लिया और उन्होंने ने भी ट्रंप की गलत व विफल नीतियों को जारी रखा।
जानकार हल्कों का कहना है कि अगर बाइडेन ने इतिहास से दर्स लिया होता तो कभी भी वह ट्रंप की विफल नीतियों का अनुसरण न करते। ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अधिकतम दबाव की जो नीति अपना रखी थी आज उसकी विफलता स्वंय अमेरिकी अधिकारी आधिकारिक रूप से स्वीकार कर रहे हैं कि ईरान के खिलाफ अधिकतम दबाव की नीति विफल रही है। वास्तविकता यह है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के क्रियाकलापों के कारण परमाणु समझौता प्रभावहीन हो गया क्योंकि अगर इन देशों ने परमाणु समझौते में अपने वचनों पर अमल किया होता तो दोबारा परमाणु समझौते के संबंध में वार्ता करने की ज़रूरत ही न पड़ती। अमेरिकी विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने यह भी कहा कि कई महीने से परमाणु समझौता वाशिंग्टन की कार्यसूची से निकल चुका है और अब अमेरिका का ध्यान ईरान और रूस के मध्य होने वाली निकटता व सहकारिता पर केन्द्रित है।
सवाल यह पैदा होता है कि अगर ईरान और रूस एक दूसरे से निकट हो रहे हैं तो अमेरिका को क्यों तकलीफ हो रही है? क्या अमेरिका के जिन जिन देशों व सरकारों से निकट संबंध स्थापित कर रखा है ईरान और रूस ने उस पर ध्यान केन्द्रित कर रखा है? रोचक बात यह है कि नेड प्राइस के दावे एसी स्थिति में सामने आ रहे हैं जब विभिन्न साक्ष्य इस बात सूचक हैं कि जो बाइडेन ने जब से वाइट हाउस में राष्ट्रपति के रूप प्रवेश किया है तब से ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते में वापस आने का कोई कार्यक्रम ही नहीं था।
बहरहाल अमेरिका के विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने जो यह कहा है कि परमाणु समझौता कई महीनों से वाशिंग्टन की कार्यसूची में नहीं है तो उनके बयान का एक लक्ष्य ईरान पर दबाव में वृद्धि करना है और ईरानी अधिकारियों के लिए इस प्रकार का राजनीतिक खेल जाना पहचाना है और ईरानी अधिकारी इससे बहुत अधिक होशियार हैं। MM
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