यूरोपीय परिषद ने किस बात को लेकर फ्रांस की भर्त्सना की?
यूरोपीय परिषद ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ फ्रांस की पुलिस द्वारा सीमा से अधिक बल प्रयोग की भर्त्सना की है और फ्रांसीसी अधिकारियों का आह्वान किया है कि वे इस देश के लोगों की मांगों का सम्मान करें।
यूरोपीय परिषद के मानवाधिकार आयुक्त ने कहा कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इस देश की पुलिस ने जो सीमा से अधिक बल प्रयोग किया है किसी तरह उसका औचित्य नहीं दर्शाया जा सकता।
इसी प्रकार यूरोपीय परिषद के मानवाधिकार आयुक्त ने कहा है कि पुलिस ने जिस प्रकार की कार्यवाही की है वह शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित होने के अधिकार से मेल नहीं खाती है। उन्होंने फ्रांसीसी अधिकारियों का आह्वान किया है कि वे प्रदर्शन करने और आपत्ति जताने वालों और इसी प्रकार उन पत्रकारों के अधिकारों का सम्मान करें जो इन घटनाओं को कवरेज देने का प्रयास कर रहे हैं।
इसी प्रकार यूरोपीय परिषद के मानवाधिकार आयुक्त ने मैक्रां सरकार से सिफारिश की है कि वर्ष 2019 में यलो जैकेट से संबंधित प्रदर्शनों के संबंध में यूरोपीय परिषद ने जो सिफारिशें की थीं उस पर फ्रांस सरकार अमल करे। इसी बीच फ्रांस के मानवाधिकार आयोग ने भी घोषणा की है कि इस देश की पुलिस ने शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे लोगों के खिलाफ बल प्रयोग किया और अकारण उन्हें गिरफ्तार किया।
रोचक बात यह है कि फ्रांस उन पश्चिमी देशों में से एक है जो दूसरों को डेमोक्रेसी और नैतिकता का पाठ पढ़ाते फिरते हैं। फ्रांस में जब पैग़म्बरे इस्लाम का अपमान जनक कार्टून छापा जाता है जिससे लगभग दो अरब मुसलमानों की भावनायें आहत होती हैं तो इस कृत्य के औचित्य में कहा जाता है कि हर इंसान को अपनी बात कहने का अधिकार है।
सवाल यह पैदा होता है कि हर इंसान को किसी प्रकार की शर्त के बिना अपनी बात कहने का अधिकार है या उसके लिए कुछ शर्ते हैं? इसका जवाब बहुत स्पष्ट है दुनिया में किसी भी देश में किसी भी इंसान को सीमा रहित आज़ादी नहीं है। यानी दुनिया में किसी भी देश में किसी इंसान को मनमानी वाहन चलाने की अनुमति नहीं है बल्कि उसके लिए कुछ कानून हैं जिन्हें वाहन चलाते समय ध्यान में रखना पड़ता है।
उसी तरह हर इंसान को अपनी बात कहने की पूरी आज़ादी है परंतु एक सीमा के अंदर न कि सीमा से बाहर और जो कुछ मुंह में आ जाये उसे ज़बान से कह दिया जाये। पश्चिम और यूरोपीय देश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में हमेशा दोहरे मापदंड से काम लेते हैं। मिसाल के तौर पर जब होलोकास्ट की बात आती है तो यही पश्चिमी व यूरोपीय देश कहते हैं कि होलोकास्ट के बारे में सवाल करना मना है और जो भी इसकी अनुदेखी करेगा उसे जेल और जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
यहां पश्चिमी देशों से पूछा जाना चाहिये कि हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार क्यों नहीं है? होलोकास्ट के बारे में सवाल करना क्यों मना है? क्या कहीं कोई राज़ खुलने का भय तो नहीं सता रहा है? क्या कहीं दाल में कोई काला तो नहीं है? बहुत से जानकार हल्कों का कहना है कि न केवल दाला में कोई काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है और जायोनियों ने जो झूठा प्रचार कर रखा है कि हिटलर ने 60 लाख यहूदियों को ज़िन्दा गैस की भट्टियों में जलाकर मार डाला है तो इसके खुलने का भय बना हुआ है इसी भय से जायोनी और उनके प्रभाव में काम करने वाले देश और सरकारें होलोकास्ट के बारे में सवाल पूछने पर भी प्रतिबंध लगाये हुए हैं।
बहरहाल पश्चिमी व यूरोपीय सरकारें व देश बहुत से विषयों के बारे में दोहरा मापदंड अपनायें हुए हैं और उनका यही दोहरा मापदंड बहुत से विषयों व मामलों के अस्तित्व में आने और उनके बाकी रहने का मूल कारण है। आतंकवाद से मुकाबले और मानवाधिकार की रक्षा के बारे में पश्चिम की कथनी और करनी को इसी दिशा में देखा जा सकता है। MM
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