वीटो या दादागीरी की लाठी
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दोस्तो राष्ट्रसंघ के महासचिव एन्टोनियो गुटेरस ने जापान के हीरोशीमा नगर में कहा है कि सुरक्षा परिषद में सुधार का समय आ गया है।
(last modified 2023-05-22T04:58:57+00:00 )
May २२, २०२३ ०४:५१ Asia/Kolkata

दोस्तो राष्ट्रसंघ के महासचिव एन्टोनियो गुटेरस ने जापान के हीरोशीमा नगर में कहा है कि सुरक्षा परिषद में सुधार का समय आ गया है।

इसी प्रकार उन्होंने कहा है कि दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाया जा सकता है। राष्ट्रसंघ के महासचिव की बात वास्तव में दुनिया में पता नहीं कितने लाख बल्कि करोड़ों लोगों के दिल की आवाज़ है। अगर आज दुनिया से परमाणु हथियार खत्म हो जायें तो बहुत से लोगों में जो असुरक्षा की भावना व्याप्त है वह खत्म हो जायेगी और परमाणु हथियारों के संबंध में जो होड़ जारी है वह भी खत्म हो जायेगी।

बहुत से जानकार हल्कों का कहना है कि आज दुनिया में बहुत से संकटों पर जो नियंत्रण नहीं किया जा रहा है उसकी एक बहुत बड़ी वजह खुद सुरक्षा परिषद और राष्ट्रसंघ के ढांचे में मौजूद कमियां हैं। मिसाल के तौर पर वीटो का अधिकार है।

यहां हम बहुत ही संक्षेप में बता रहे कि वीटो या वीटो का अधिकार क्या है? वीटो यह है कि अगर सुरक्षा परिषद के स्थाई और अस्थाई समस्त सदस्य देशों ने किसी प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया किन्तु अगर सुरक्षा परिषद के 5 स्थाई सदस्य देशों में से किसी ने भी उस प्रस्ताव का विरोध कर दिया तो वह प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता।

ध्यान से सोचें कि यह वीटो का अधिकार किसने और किन लक्ष्यों के तहत बनाया है? इसका जवाब बहुत ही स्पष्ट है इस अधिकार को अमेरिका और कुछ दूसरी बड़ी शक्तियों ने बनाया है ताकि आवश्यकता पड़ने पर इस अधिकार से लाभ उठा सकें। अगर वीटो के प्रयोग के इतिहास का अध्ययन किया जाये और यह देखा जाये कि किस देश ने सबसे अधिक वीटो के अधिकार से लाभ उठया है तो यह समझने में तनिक भी देर नहीं लगेगी कि इसे किसने और क्यों बनाया है?

अगर कानून सबके लिए बराबर है तो वीटो का अधिकार क्यों? वह भी केवल पांच देशों को? सब बराबर हैं तो सबको वीटो का अधिकार मिलना चाहिये वरना किसी को नहीं। अगर वीटो का अधिकार सभी देशों को मिल जायेगा तो अमेरिका और उसकी हां में हां मिलाने की दादागीरी खत्म हो जायेगी। इसी दादागीरी के लिए तो वीटो बनाया गया है।

ध्यान देने की दूसरी बात यह है कि अमेरिका और दूसरे पश्चिमी व यूरोपीय देश डेमोक्रेसी और लोकतंत्र की बात करते हैं। सवाल यह उठता है कि अगर वास्तव में ये देश लोकतंत्र और डेमोक्रेसी के दावे में सच्चे हैं तो वीटो के अधिकार के खिलाफ क्यों बात नहीं करते हैं जबकि वीटो का अधिकार डेमोक्रेसी और लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है और कोई भी पश्चिमी व यूरोपीय देश कभी भी वीटो के अधिकार के खिलाफ कोई बात नहीं करता है।

अगर अमेरिका और पश्चिमी व यूरोपीय देश वास्तव में डमोक्रेसी व लोकतंत्र के समर्थक हैं तो जहां पर या जिन देशों में डेमोक्रेसी नहीं है वहां डेमोक्रेसी की बात करना चाहिये मगर हम देखते हैं कि ये देश उन देशों में कभी डेमोक्रेसी और लोकतंत्र की बात भी नहीं करते हैं जहां लोकतंत्र नाम की चीज़ है, यहीं नहीं वहां तानाशाही सरकारों के साथ अमेरिका और यूरोपीय व देशों के संबंध बहुत अच्छे हैं और अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश तानाशाही सरकारों को खूब हथियार भी बेचते हैं। फार्स की खाड़ी के अरब देशों के साथ अमेरिका और पश्चिमी देशों के संबंधों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।

अमेरिका और पश्चिमी देशों ने फार्स की खाड़ी के देशों को डेरीफार्म बना रखा है। इन देशों की तानाशाही सरकारों को खूब हथियार बेचते हैं और इन देशों को यह समझाते हैं कि इस्लामी गणतंत्र ईरान तुम्हारा दुश्मन है और उसके मुकाबले के लिए हथियारों की खरीदारी ज़रूरी है जबकि ईरान का मानना है कि विदेशियों के हस्तक्षेप के बिना क्षेत्र की शांति व सुरक्षा क्षेत्रीय देशों के सहयोग से होनी चाहिये।

बहरहाल इस समय दुनिया में जो संकट व्याप्त हैं और जो लड़ाइयां व युद्ध हो रहे हैं उन सबके जारी रहने की एक मुख्य वजह सुरक्षा परिषद और राष्ट्रसंघ के ढांचे में मौजूद कमी है और अगर आज सुरक्षा परिषद और राष्ट्रसंघ के ढांचे में सुधार हो जाये तो दुनिया के बहुत से देशों व क्षेत्रों में जारी संकटों का समाधान किया जा सकता है परंतु खेद के साथ कहना पड़ता है कि मानवाधिकार की रक्षा का राग अलापने वाले ही मानवाधिकार के सबसे बड़े हननकर्ता हैं।

वर्ष 1945 में अमेरिका ने जापान के दो नगरों हीरोशीमा और नागासाकी पर जो परमाणु बमबारी की थी उसे इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।

नोटः ये व्यक्तिगत विचार हैं। पार्सटूडे का इनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं है। MM

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