ग़ज़ा में नस्ली सफ़ाए के साथ शांति का समारोह
31 दिसम्बर को विश्व शांति का लम्हा मनाया जाता है हर साल 31 दिसम्बर को रात साढ़े ग्यारह बजे से पहली जनवरी की की तारीख़ शुरू होने के आधे घंटे बाद या रात 12 बजकर 30 मिनट तक विश्व शांति का के रूप में मनाया जाता है इस आशा के साथ कि दुनिया में शांति स्थापित हो जाए।
शांति का बड़ा सम्मान है और इसे संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र में कहा गया है कि आइंदों नस्लों को जंग से बचाना और एक दूसरे के साथ शांतिपूर्ण जीवन गुज़ारना शांति के बुनियादी मक़सद हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र के पहले आर्टिकल में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का एक मूल उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा की हिफ़ाज़त है। इसलिए यह कहना ग़लत नहीं है कि शांति का माहौल बनाना मानव समाज और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की मूल ज़िम्मेदारी है। यही वजह है कि 21 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस के रूप में मनाया जाता है। जबकि हर साल 31 दसिम्बर की रात को साढ़े गयारह बजे से पहली जनवरी की तारीख़ शुरू होने के आधे घंटे बाद याद रात साढ़े बारह बजे तक अंतर्राष्ट्रपति शांति का लम्हा बनाया जाता है।
अब सवाल यह है कि क्या आज दुनिया में शांति है? जवाब यही है कि शांति तो हरगिज़ नहीं है। इसके साक्ष्य खोजने के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव के बयान पर एक नज़र डाल लेना काफ़ी है। एंटोनियो गुटेरस ने गुरुवार को एक वीडियो संदेश में कहा कि 2023 बड़ी पीड़ाओं और दुखों का साल था। पूरी मानवता पीड़ा झेल रही है। उन्होंने कहा कि लोग भुखमरी, ग़रीबी और बड़े कठिन हालात में जी रहे हैं। जंगों की संख्या और क्रूरता बढ़ रही है और आपसी विश्वास में कमी आई है।
अब सवाल यह है कि शांति आख़िर मानवता की पहुंच से दूर क्यों है और जंगों क्यों बढ़ती जा रही हैं? जो चीज़ इस सवाल के जवाब के रूप में मन में आती है वो पश्चिमी ताक़तों के क्रियाकलाप हैं। यूक्रेन और ग़ज़ा पश्चिमी ताक़तों के रवैए के दो स्पष्ट नमूने हैं जहां शांति को अपने स्वार्थों और ज़ायोनियों के हितों की भेंट चढ़ा दिया गया। ग़ज़ा में जो कुछ हो रहा है उससे तो सारी दुनिया में खुलकर एलान हो रहा है कि शांति पश्चिमी देशों की प्राथमिकता नहीं है और केवल इतना ही नहीं वे शांति की स्थापना में रुकावट भी डालती हैं।
लगभग तीन महीने से ग़ज़ा पर ज़ायोनी शासन चौतरफ़ा हमले कर रहा है। वहां नस्लीय सफ़ाए के हालात हैं। 21 हज़ार 600 से अधिक लोग शहीद हो चुके हैं और 56 हज़ार से ज़्यादा घायल हैं। शहीदों में 70 प्रतिशत बच्चे और महिलाएं है। जबकि यह दोनों समूह एसे हैं जिन्हें जंगों में सबसे ज़्यादा सुरक्षित रखने की ज़रूरत होती है। मगर ज़ायोनी शासन जान बूझ कर और योजना के साथ बच्चों और महिलाओं पर हमले कर रहा है।
इसके बावजूद सुरक्षा परिषद अब तक ग़ज़ा पट्टी पर ज़ायोनी शासन के हमले रुकवान में सफल नहीं हुई है क्योंकि अमरीका वहां संघर्ष विराम से संबंधित प्रस्तावों को वीटो करके व्यवहारिक रूप से ज़ायोनी शासन के अपराधों का समर्थन कर रहा है और बड़ी बेशर्मी से ग़ज़ा में आम नागरिकों के क़त्ले आम को इस्राईल की सेल्फ़ डिफ़ेंस की कार्यवाही कह रहा है। इस साल शांति का लम्हा इन हालात में मनाया जा रहा है कि ग़ज़ा पर ज़ायोनी शासन की बमबारी जारी है।
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