आतंकवाद का समर्थन, अमरीका व सऊदी अरब की मूल नीति
अमरीका की केंद्रीय गुप्तचर सेवा सीआईए के प्रमुख जाॅन ब्रेनन ने अमरीका व सऊदी अरब के संबंधों को सर्वोत्तम स्तर पर हैं विशेष कर आतंकवाद से संघर्ष के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध बहुत अच्छे हैं।
उन्होंने आतंकवाद के फैलाव व समर्थन में सऊदी अरब व अमरीका की संयुक्त भूमिका के बारे में मौजूद ठोस प्रमाणों के बावजूद दावा किया कि नाइन इलेवन की घटना सहित आतंकवाद से सऊदी अरब का कोई लेना-देना नहीं है। ब्रेनन ने वाॅशिंग्टन में अलअरबिया टीवी से बात करते हुए कहा कि सऊदी अरब से हमारा बड़ा अच्छा सहयोग है जो वर्षों से जारी है। सीआईए के चीफ़ ने एेसी स्थिति में सऊदी अरब को अमरीका का रणनैतिक साझेदार बताया है कि जब दोनों ही देश आतंकवाद के मुख्य समर्थक हैं। अमरीका ने अलक़ाएदा को अस्तित्व प्रदान किया जबकि सऊदी अरब ने वहाबियत का प्रचार करके दाइश को अपने समर्थन में ले रखा है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि वाॅशिंग्टन और रियाज़ एक दूसरे के रणनैतिक साझेदार हैं लेकिन आतंकवाद से संघर्ष में नहीं बल्कि आतंकवाद के प्रसार और उससे राजनैतिक फ़ायदा उठाने में।
यह दोहरा रवैया संयुक्त राष्ट्र संघ के भीतर भी पैठ बना चुका है। राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने पिछले सप्ताह यह बात स्वीकार की थी कि अमरीका और सऊदी अरब के दबाव के चलते उन्होंने बाल अधिकारों का हनन करने वालों की ब्लैक लिस्ट से सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठजोड़ का नाम हटा दिया है। उधर अमरीकी विदेश मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट में ईरान नाम आतंकवाद के समर्थक देशों के साथ रखा गया है। स्पष्ट सी बात है कि अमरीका, जो आतंकी गुटों से हथकंडे के रूप में फ़ायदा उठाता है और ज़ायोनी शासन की आतंकी कार्यवाहियों का औचित्य दर्शाता है, स्वाभाविक रूप से सऊदी अरब को अपना स्ट्रेटेजिक घटक बताएगा और ईरान का नाम आतंकवाद के समर्थकों की सूचि में रखेगा। यह दोहरा व्यवहार, तथ्यों को बदलने की कोशिश है और इससे पता चलता है कि अमरीका, आतंकवाद से संघर्ष के संबंध में दोहरे मापदंड अपनाए हुए है। (HN)