शरणार्थियों के साथ यूरोप का रवैया, संयुक्त राष्ट्र की गहरी चिंता
संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी मामलों की उच्चायुक्त मारियाना मीलोनोकोवुस्का ने गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि बल्कान का रास्ते पश्चिमी यूरोप पहुंचने की कोशिश करने वाले शरणार्थियों के साथ बुरा बर्ताव किया जा रहा है और उन्हें बाहर निकालने की प्रक्रिया चिंताजनक रूप से बढ़ गई है।
मार्च 2016 में बल्कान का रास्ता बंद होने से पहले लाखों की संख्या में शरणार्थी यूनान से बल्कान पहुंच गए थे और वहीं पर फंस गए। साक्ष्यों से पता चलता है कि यूरोपीय देशों में शरणार्थियों के विरुद्ध कठोर बर्ताव बढ़ता जा रहा है।
इस समय यूरोपीय संघ के देशों के बीच इस बारे में मतभेद है कि शरणार्थियों के साथ किस प्रकार का रवैया अपनाया जाए लेकिन यह बात साफ़ नज़र आ रही है कि यूरोपीय देश शरणार्थियों के विरुद्ध एकजुट होते जा रहे हैं। जर्मनी, फ़्रांस, इटली, यूनान, स्पेन और कुछ अन्य यूरोपीय देश चाहते हैं कि शरणार्थियों को यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच बांट दिया जाए। लेकिन वहीं ब्रिटेन हंग्री, चेक, स्लोवाकिया और पोलैंड जैसे देश हैं जो इस योजना को सहमत नहीं है। दूसरी ओर यूरोपीय देशों में हालिया आतंकी घटनाओं से भी इन देशों को बहाना मिल गया है और वह शरणार्थियों को और भी कड़ाई से विरोध करने लगे हैं। चेक गणराज्य के राष्ट्रपति ने तो स्पष्ट रूप से कहा कि शरणार्थियों की लहर और आतंकी हमलों में संबंध होने में कोई संदेह नहीं है। उन्होंने कहा कि मुसलमान शरणार्थियों को शरण देना वास्तव में संभावित आतंकी हमलों के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना है।
पश्चिमी देशों में इस्लामोफ़ोबिया फैलाए जाने का बहुत बुरा असर शरणार्थियों पर पड़ा है और उन्हें इसका ख़मियाज़ा भुगतना पड़ रहा है। जबकि सीरिया और इराक़ जैसे इस्लामी देशों में अशांति और हिंसा की बुनियादी वजह पश्चिमी देशों का हस्तक्षेप और उनकी ओर से आतंकी संगठनों की मदद है। इन नीतियों के कारण बड़ संख्या में लोग अपना घरबार छोड़कर और जान ख़तरे में डालकर यूरोप की ओर पलायन करने पर विवश हुए।