क्या अमरीका तीसरी दुनिया का देश बनता जा रहा है?
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Is America Becoming a Third World Country? अमरीका के दि नेशनल इंटरेस्ट मैगज़ीन ने एनाटोल लिवेन का एक लेख प्रकाशित किया है जो क़तर स्थित जार्ज टाउन युनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jan २१, २०१७ १७:०९ Asia/Kolkata
  • क्या अमरीका तीसरी दुनिया का देश बनता जा रहा है?

Is America Becoming a Third World Country? अमरीका के दि नेशनल इंटरेस्ट मैगज़ीन ने एनाटोल लिवेन का एक लेख प्रकाशित किया है जो क़तर स्थित जार्ज टाउन युनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर है।

लेखक ने इस लेख में अमरीका की इंटेलीजेन्स एजेंसियों के उन विचारों की ओर इशारा किया है जिसके अनुसार रूस के पास अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से संबंधित अशलील सामग्री है। यदि यह विचार सही है कि रूस के पास डोनल्ड ट्रंप की अशलील वीडियो मौजूद है तो यह संभव है कि वीडियो सामने आ जाने के बाद ट्रंप को अपना पद छोड़ना पड़ जाए। क्योंकि इतने बड़े अपराधी और लापरवाह व्यक्ति को तो गेट कीपर और सफ़ाई कर्मी भी नहीं बनाया जाना चाहिए।

वैसे यह भी एक बात है कि जब से ट्रंप हिलैरी क्लिंटन के सामने मज़बूत उम्मीदवार के तौर पर उभरे तभी से इस प्रकार की ख़बरें लीक होने लगी थीं लेकिन अब तक इनकी पुष्टि नहीं हो सकी है। सारी रिपोर्टें एक ब्रिटिश इंटेलीजेन्स अधिकारी के हवाले से आई हैं जिन्होंने रूसी इंटेलीजेन्स सूत्रों के हवाले से यह रिपोर्ट दी है। तो अगर कुछ है तो वह रूसी इंटेलीजेन्स अधिकारियों के ही पास हैं और यह राज़ कई वर्षों तक पर्दे में ही रहेगा। लेकिन इस पूरे मामले से अमरीकी लोकतंत्र को नुक़सान पहुंच गया है और अमरीकी डेमोक्रेसी में ज़हर घुल चुका है।

इसी के साथ यह भी संभावना है कि रूस ने ट्रंप के चुनावी अभियान की आर्थिक मदद की हो और साथ ही डेमोक्रेटिक पार्टी के ईमेल अकाउंट हैक किए हों। एसा लगता है कि इस बारे में ठोस प्रमाण मौजूद हैं।

यहां यह बात याद रखनी ज़रूरी है कि यदि रूस ने यह सब कुछ किया है तो उसने वास्तव में अमरीका की उन्हीं गतिविधियों की नक़ल की है जो अमरीका दूसरे देशों में करता रहा है। अमरीका ने इस प्रकार की गतिविधियां पूर्व सोवियत युनियन के भीतर ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य भागों में भी की हैं।

सोवियत युनियन ने पश्चिमी देशों में कम्युनिस्ट दलों की भरपूर मदद की और उन्हें अपने देशों की राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्था को गिराने के लिए उकसाया जबकि कम्युनिस्ट देशों में अमरीका तथा अन्य पश्चिमी देशों ने उन लोगों और संगठनों की मदद की जो कम्युनिस्ट शासन के विरुद्ध लड़ रहे थे। इसके लिए इंटेलीजेन्स एजेंसियों का भरपूर प्रयोग किया गया।

जब चियावपिंग चीन की सत्ता में पहुंचे और मिख़ाइल गोर्बाचोफ़ ने रूस की बागडोर संभाली तो देशों की भीतरी नीतियों को प्रभावित करने के प्रयास रूक गए अलबत्ता अमरीका और पश्चिम की अंतर्राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करने के प्रयास होते रहे, विशेषकर उन नीतियों को जिनका संबंध रूस और चीन से था। मगर यह सब कुछ मान्य और औपचारिक माध्यमों से होता था।

इसी बीच अमरीका की अंतर्राष्ट्रीय नीति का अटूट पहलू यह बन गया कि वह दूसरे देशों में लोकतंत्र के प्रचार करे और इसका विरोध करने वाले को कुचल दे। इसकी मिसालें आज भी पूर्वी यूरोप में लोकतंत्र की स्थापना के प्रयासों के रूप में देखी जा सकती हैं।

रूस की आंतरिक राजनीति के मामले में पश्चिमी और अमरीकी नेताओं ने खुलकर सरकार विरधी पक्षों का समर्थन किया और वह प्रदर्शन के लिए सड़कों पर निकले। विरोधियों को पश्चिमी देशों में शरण और प्लेटफ़ार्म भी दिया गया। यहां तक कि चेचनिया के बंदूक़धारी पृथकतावादियों का भी पश्चिम ने साथ दिया। सीआईए ने व्लादमीर पुतीन की अपार संपत्ति की अफ़वाहें भी फैलाईं जिनका लक्ष्य पुतीन की छवि को ख़राब करना था।

मगर इस मामले में अमरीका और यूरोप के नेता कुछ बातें भूल गए या उन्होंने जान बूझकर उनकी अनदेखी की।

एक तो यह कि दूसरी सरकारों के बारे में हमेशा विरोध की नीति अपना समझदारी नहीं है। जब तक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से यह ज़रूरी न जो जाए उस समय तक इससे बचना चाहिए। साथ ही यह भी यक़ीन होना चाहिए कि दूसरे पक्ष की ओर से जवाबी कार्यवाही नहीं होगी। दूसरी बात यह है कि ज़रूरी नहीं है कि अमरीका के इस प्रकार के प्रयासों को अच्छी नज़र से देखा जाए। अमरीका ने दूसरे देशों की आतंरिक राजनीति को प्रभावित करने के जो प्रयास किए उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा गया। क्योंकि इससे अमरीका के तो हित पूरे हो रहे थे लेकिन लोकतंत्र की मदद नहीं हो रही थी। यही कारण है कि निशाना बनाए गए देश की सरकार के विरोधियों को अमरीका का एजेंट समझा जाने लगा। इस तरह देखा जाए तो अमरीका ने रूस, चीन और ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया तो इसका नतीजे में वहां के सरकार विरोधियों को नहीं बल्कि सरकारों को मज़बूती मिल गई।

लीबिया और इराक़ की विडंबनाओं के बाद तो यह तह है कि अमरीका के नीतिकारों को यह एहसास नहीं है कि किसी भी देश में यदि अमरीका कोई गतिविधि करता है तो उसे वहां के नेताओं और बुद्धिजीवियों के साथ ही आम जनता की दृष्टि से भी परखने की पहले ही कोशिश होनी चाहिए।

जब सोवियत युनियन टूटा और वह व्यवस्था ढह गई तो रूस के लोगों को भारी आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना हुआ। यह देखकर चीन के लोग इस प्रकार की विडंबना से बचने के लिए अपनी सरकार के समर्थन में एकजुट हो गए। क्योंकि उन्हें अपनी सरकार पर अमरीका से अधिक भरोसा था। विशेषकर इस लिए भी कि पश्चिम के सभी क्षेत्रों में लोकतंत्र कमज़ोर पड़ने लगा।

दूसरे देशों के आंतरिक मामले में अमरीका के हस्तक्षेप और विध्वंसक कार्यवाहियों को वहां के बुद्धिजीवियों और आम जनता के स्तर पर अस्तित्व के ख़तरे के रूप में देखा जाने लगा है और इस प्रकार की आशंकाएं पारस्परिक संबंध और सहयोग को लगभग असंभव बना देती हैं।

पिछले वर्ष के अमरीकी चुनाव में रूस के व्यापक पैमाने पर हस्तक्षेप के बारे में कहा जा सकता है कि हन्स बोल पड़ा है।