काबुल की गलियों से
जब पायलट ने एलान किया कि कुछ ही क्षणों में हम काबुल के अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उतरेंगे तो मेरा उत्साह बहुत बढ़ गया क्योंकि मैं उस देश की धरती पर क़दम रखने जा रही थी जहां के निवासियों को मैं एक ज़माने से ईरान में देखती आई थी। हम पहाड़ों के ऊपर से गुज़रते हुए उस मैदानी इलाक़े में पहुंचे जिसमें काबुल बसा हुआ हैं। यह शहर पहाड़ों से घिरा हुआ ठंडा और शुष्क शहर है।
हम पत्रकारों की एक टीम के रूप में काबुल पहुंचे थे। अचानक बिजली चली गई और कुछ ही मिनटों में दोबारा आ गई तो पास खड़े एक अफ़ग़ान यात्री ने बताया कि बिजली की कमी है अतः इसका आना जाना लगा रहता है। इसी बात से यह भी पता चल गया कि काबुल एयरपोर्ट के हाल, होटल और शापिंग सेंटर की मद्धिम रोशनी की क्या वजह थी? बड़ा अच्छा लगा कि यह लोग कितनी किफ़ायत से और संभल का बिजली का इस्तेमाल करते हैं। हर जगह ग्रीन टी हमें पेश की गई जो बड़ी स्वादिष्ट थी।
हम एयरपोर्ट से निकले और शहर की सड़कों से हमारी गाड़ी गुज़रने लगी तो हमें जगह-जगह अहमद शाह मसऊद की बड़ी बड़ी तसवीरें नज़र आईं। अहमद शाह मसऊद तालेबान के ख़िलाफ़ अपनी साहसिक लड़ाई के लिए देश की जनता के दिल में विशेष स्थान रखते हैं। शहर में हर जगह सैनिक गाड़ियां खड़ी दिखाई दीं। अफ़ग़ानिस्तान की नेशनल सेक्युरिफ़ी फ़ोर्स की गाड़ियां हरे रंग की, स्पेशल फ़ोर्स की गाड़ियां काले रंग की और संयुक्त राष्ट्र से संबंधित गाड़ियां सफ़ेद रंग की थीं।
काबुल हमें भीड़-भाड़ वाला शहर नज़र आया। अलबत्ता यह फ़र्क़ साफ़ दिखाई दिया कि कम ही चौराहों पर सिग्नल लाइटें थी अधिकतर चौराहों पर ट्रैफ़िक पुलिसकर्मी गाड़ियों के दिशानिर्देशन की ज़िम्मेदारी पूरी कर रहे थे। हमारी गाड़ी के पास से कई सैनिक गाड़ियां गुज़रीं। एक गाड़ी में कई सुरक्षाकर्मी बैठे दिखाई दिए जिन्होंने एक व्यक्ति को हथकड़ी लगा कर बिठा रखा था। ड्राइवर ने कहा कि यह निश्चित रूप से तालेबान लड़ाका है जो पकड़ा गया है।
हम होटल पहुंचे तो सुरक्षाकर्मी हर जगह दिखाई दिए लेकिन हमें किसी डर का एहसास नहीं था। शायद इसकी वजय यह थी कि हमें यह मालूम था कि हम जिस होटल में ठहरे हैं वह राष्ट्रपति भवन के क़रीब स्थित है अतः यहां सुरक्षा का पूरा इंतेज़ाम है। लेकिन कुछ ही दिन बाद अफ़ग़ानिस्तान की संसद के क़रीब आत्मघाती हमला हुआ जिसमें 30 लोगों की जानें चली गईं। चारों ओर घंटों एंबूलेन्स और सैनिक गाड़ियों के सायरन का शोर छाया रहा। यह सब कुछ होने के बावजूद हमें वहां के लोगों के चेहरे पर भय के लक्षण नहीं दिखाई दिए। शायद इन्हीं हालात में कई साल से जीवन व्यतीत करने के नाते उनकी आदत पड़ गई थी। इसी लिए तो हमें कुछ ही घंटों के बाद सब कुछ सामान्य दिखाई देने लगा। हमें दो बच्चियां नज़र आईं जो अपनी बर्थडे पार्टी के लिए केक उठाए सड़क पार कर रही थीं।
दीवारों पर बहुत से नारे और सुझाव लिखे दिखाई दिए। किसी में सफ़ाई सुथराई पर ज़ोर दिया गया था, किसी में पोलियो ड्राप्स बच्चों को पिलाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, किसी में मां बाप से यह कहा गया था कि दो बच्चों के बीच 3 साल का अंतर ज़रूर रखें। कुछ दीवारों पर आर्थिक भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ नारे लिखे हुए थे। एक जगह लिखा थाः रिश्वत खोर अल्लाह और लोगों की नज़रों से छिपा नहीं है, मैं तुझे देख रहा हूं
अफ़ग़ानिस्तान में एक समस्या कम उम्र की लड़कियों का बड़ी उम्र के मर्दों से विवाह है। हमें कुछ दीवारों पर इस प्रथा के विरोध में कुछ वाक्य लिखे दिखाई दिए और छोटी बच्ची की तसवीर बनी थी जिसके हाथों में किताब थी। इस तरह यह संदेश देने का प्रयास किया गया था कि यह बच्ची की पढ़ने लिखने की उम्र है शादी की नहीं।
काबुल एक अजीब शहर है। यहां हमें बड़ी संख्या में रशियन गाड़ियाई दिखाई दीं जिनकी स्टेयरिंग दाहिनी ओर है जबकि इनके साथ ही दूसरी गाड़ियां फ़र्राटे भरती दिखाई देती हैं जिनकी स्टेयरिंग बायीं ओर है। काबुल में ज़्यादातर एसयूवी जापानी गाड़ियां हैं और उन्हें काबुल की सड़कों के गड्ढों से निपटना होता है।
वैसे तो अफ़ग़ानिस्तान में अधिकतर लोग पाकिस्तान को पसंद नहीं करते क्योंकि वह समझते हैं कि पाकिस्तान तालेबान की मदद करता है लेकिन दौलतमंद वर्ग के लोगों के घर पाकिस्तान के घरों जैसे हैं। अगर लोगों से इसकी वजह पूछिए तो जवाब देते हैं कि यह पाकिस्तानी नहीं हिंदुस्तानी स्टाइल है। अफ़ग़ानिस्तान के लोगों भारतीयों से बहुत क़रीब दिखाई पड़ते हैं। उनके खाने भी भारतीय व्यंजनों के जैसे दिखाई देते हैं और सालन तेज़ होता है।
काबुल में महिलाएं हिजाब में ही दिखाई पड़ती हैं। कुछ महिलाएं जो ग़रीब वर्ग की हैं उनके चेहरे भी ढंके होते हैं जबकि शहर के केन्द्रीय भाग में महिलां स्कार्फ में दिखाई देती हैं। जगह जगह बोर्ड लगे हुए हैं जिन पर हिजाब के और पवित्रता के बारे में वाक्य लिखे हुए हैं।
काबुल में ठेले भी ख़ूब नज़र आते हैं और उनसे पारंपरिक बाज़ार बन जाते हैं। लेकिन शाम के पांच छह बजे तक कारोबार बंद हो जाता है लेकिन आवाजाही रात दस बजे तक जारी रहती है।
काबुल के लोग दरी और फ़ारसी दो भाषाओं में बातचीत करते हैं। इस देश पर रूस का क़ब्ज़ा रहा लेकिन रूसी भाषा के शब्दों को यहां स्थान नहीं मिल सका अलबत्ता अंग्रेज़ी भाषा के शब्द ख़ूब दिखाई और सुनाई पड़ते हैं।
ऊपर लिखी गई बातें ईरानी पत्रकार मरियम जमशीदी के सफ़रनामे से ली गई हैं जिन्होंने गत दिसम्बर महीने में 6 दिन का काबुल दौरा किया।