क्या सऊदी अरब को दीवालिया कर देना चाहता है अमरीका,
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एसा लगता है कि आने वाले दिन सऊदी अरब के लिए वित्तीय, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बड़े कठिन होंगे। इस लिए कि अमरीकी कांग्रेस में पास होने वाले क़ानून के आधार पर अन्य देशों के विरुद्ध अमरीकी अदालतों में मुक़द्दमा दायर करने का रास्ता पहले ही खुल चुका है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Apr १५, २०१७ १०:५३ Asia/Kolkata
  • क्या सऊदी अरब को दीवालिया कर देना चाहता है अमरीका,

एसा लगता है कि आने वाले दिन सऊदी अरब के लिए वित्तीय, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बड़े कठिन होंगे। इस लिए कि अमरीकी कांग्रेस में पास होने वाले क़ानून के आधार पर अन्य देशों के विरुद्ध अमरीकी अदालतों में मुक़द्दमा दायर करने का रास्ता पहले ही खुल चुका है।

रोयटर्ज़ के हवाले से रिपोर्ट आई है कि ट्रैफ़लर्ज़ काज़ नामक विख्यात कंपनी से जुड़ी 12 बीमा कंपनियों ने मुक़द्दमा दायर करके सऊदी अरब की कंपनियों से 4 अरब 20 करोड़ डालर का हर्जाना मांगा है क्योंकि इन कंपनियों पर 11 सितम्बर के आतंकी हमलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लिप्त होने का आरोप है। सऊदी अरब की जिन संस्थाओं के ख़िलाफ़ मुक़द्दमा दायर किया गया है उनमें अर्राजेही कंपनी, अलअहली बैंक, मोहम्मद बिन लादेन कंपनी भी शामिल हैं।

इस चार्जशीट में सबसे ख़तरनाक बात यह है कि इन संस्थाओं पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने 11 सितम्बर की घटना से पहले अलाक़ायदा की मदद करके उसे 11 सितम्बर की घटना अंजाम देने के लिए उकसाया।

न्यूयार्क राज्य में ही सऊदी अरब के ख़िलाफ़ यह दूसरा मुक़द्दमा दायर हुआ है। इससे पहले अमरीकी वकीलों की संस्था ने 11 सितम्बर की घटना के 700 पीड़ितों की ओर से मैनहट्टन की अदालत में सऊदी सरकार के विरुद्ध मुक़द्दमा दायर किया था और सऊदी राजकुमारों और अधिकारियों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने 11 सितम्बर के हमलावरों की आर्थिक और लाजिस्टिक मदद की थी।

हक़ीक़त तो यह है कि यह सऊदी अरब के विरुद्ध अमरीका की ओर से परेशान करने वाली साज़िश है और इसका उद्देश्य सऊदी अरब के लगभग चार खरब डालर की रक़म हर्जाने के रूप में वसूल करना है। सऊदी अरब को यह हर्जाना अदा करना पड़ा तो उसे अरामको और साबक जैसी कंपनियां बेचने के बाद दूसरे देशों से क़र्ज़ा भी लेना पड़ेगा।

अमरीका ने फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों और विशेष रूप से सऊदी अरब के समर्थन से लीबिया, इराक़ और शायद सीरिया में सैनिक कार्यवाही की और आज यही अमरीका अपने घटक देशों को दीवालिया कर देने पर तुला हुआ है और आख़िरकार इन देशों की सरकारों का अंत कर देने की योजना रखता है।

जो भी यह समझता है कि अमरीका दोस्ती का ख़याल रखता है और अपने घटकों की रक्षा करता है वह बहुत बड़ी भूल कर रहा है। अमरीका में चाहे रिपब्लिकन पार्टी की सरकार हो या डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार हो अमरीका के हितों और स्वार्थों के अनुसार ही रणनीति बनाती है और वह केवल शक्तिशाली देशों से समझती है। खेद की बात यह है कि सऊदी अरब सहित अनेक अरब देशों ने अरबों डालर बर्बाद कर दिए और एक भी अच्छी सैनिक छावनी नहीं बना पाए और न ही मज़बूत रणनीति तय कर पाए। इन देशों ने अरब और इस्लामी देशों को एकजुट करने की कभी कोशिश नहीं की बल्कि अरब सरकारों का तख़्ता पलटने में अमरीका का बढ़ चढ़ कर साथ दिया, क्षेत्र में रक्तरंजित झड़पें शुरू करवाने की अमरीकी योजनाओं पर अमल किया और यह सब कुछ कभी मानवाधिकार के नाम पर और कभी लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर किया गया जो ख़ुद इन अरब देशों के पास भी नहीं है।

उत्तरी कोरिया एक छोटा सा देश है, उसके पास न तो तेल है और न सोना है और न ही मज़बूत धार्मिक जज़्बा है लेकिन वह अमरीका को रोके हुए है और उसकी चिंता बढ़ाता रहता है। कोरिया को सामने रखकर सोचिए कि अरब देशों की आज क्या हालत हो गई है।

साभार रायुलयौम