पुर्तगाल में “फ़ात्मा नगर” की अद्भुत कहानी ... (दूसरा भाग)
नौ से ग्यारह साल के तीन बच्चों (लूसिया सांतोस, जे सनितामारा नो और फ़्रांसिसको मारनो) ने इसी स्थान पर एक चमत्कारी महिला को देखा, वह उनके सामने प्रकट हुईं और बाद में इन बच्चों के साथ उक्त महिला ने कई बार मुलाक़ात की।
यह घटना कुछ अधिक पुरानी नहीं है बल्कि 1917 की बात है अर्थात लगभग एक शताब्दी पहले, इस रिवायत के अनुसार उस चमत्कारी महिला ने इसी स्थान पर अपने नाम से एक पवित्र स्थल बनाने का भी आदेश दिया, इस चमत्कारी महिला ने अपना नाम “फ़ात्मा” बताया, इस प्रकार से इस स्थान पर एक विस्तृत इमारत और स्थान फ़ातेमा के नाम से निर्मित हो गयी।
यहां मिलने वाले ब्रोशर में कहा गया था कि उस महिला ने एक Chepel अर्थात ईसाई उपासना स्थल बनाने का आदेश दिया। कुछ समय बाद ईसाई धर्म गुरुओं के मार्गदर्शन में तीनों बच्चों में से एक बच्ची लूसिया नन बन गयीं, यहां तक कि उस चमत्कारी महिला ने लूसिया से विभिन्न बार मुलाक़ात की जिनमें से एक बार यह मुलाक़ात स्पेन में हुई।
उस चमत्कारी महिला और लूसिया के मध्य होने वाली मुलाक़ात को रहस्य रखा गया जो अब तक राज़ ही है, यहां तक कि इस राज़ को सिक्रेट आफ़ फ़ात्मा (Secret of fatima ) अर्थात फ़ात्मा के राज़ से संज्ञा दी जाने लगी, समान्य रूप से समस्त मुलाक़ातें महीने की 13 तारीख़ को बताई जाती हैं, यहां तक कि महीने की 13 तारीख़ और विशेषकर मई की 13 तारीख़ एक विशेष महत्व रखती है कि इस तारीख़ को दुनिया भर से श्रद्धालु लाखों की संख्या में इस स्थान पर एकत्रित होते हैं।
1919 में इस स्थान पर एक भव्य उपासना स्थल बनाने का फ़ैसला किया गया जिसको पूरा होने में तीन वर्ष का समय लगा और इस इमारत के पूरे होने के बाद अर्थात 1921 में यहां एक भव्य समारोह आयोजित किया गया।
यह भी पढ़ें: पुर्तगाल में “फ़ात्मा नगर” की अद्भुत कहानी (पहला भाग)
1927 में स्थानीय बिशप ने समारोह में भाग लिया और इस स्थान को (Lady Fatima) का नाम दिया और यूं पूरे शहर का नाम “फ़ात्मा” हो गया। पुर्तगाल में रहने वाले स्थानीय लोगों के अनुसार पुर्तगाली नागरिक अपनी बच्चियों का नाम “फ़ात्मा” रखने में पवित्रता का आभास करते हैं। लेखक ने स्वयं यह देखा कि यहां पर दुकानों और विभिन्न इमारतों के नाम फ़ात्मा के नाम पर रखे गये हैं।
यह सब दृश्य देखकर मुझे जहां एक ओर आत्मिक सुख मिलता,, विशेषकर यह कि जैसे जैसे हम शहर के निकट होते जाते थे, “फ़ात्मा नाम” के बोर्ड नज़र आते या कहीं पर लिखा होता “ फ़ात्मा सिटी”, मैं अपनी कल्पना और ख़्यालों की दुनिया में कहीं और पहुंच जाता, एक एहसास मुझे ख़ूंन के आंसू रुलाता और आखें नम हो जातीं।
यात्रा वृतांत ( ग़ुलाम हुर शब्बीरी)
अख़्तर रिज़वी