नया शीत युद्ध ज़्यादा ख़तरनाक,
https://parstoday.ir/hi/news/world-i46936-नया_शीत_युद्ध_ज़्यादा_ख़तरनाक
जब सोवियत संघ वर्ष 1991 में ध्वस्त हो गया तो अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज एच डब्ल्यू बुश और विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने मास्को से वादा किया था कि नैटो रूस की नई सीमाओं के क़रीब नहीं जाएगा।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Aug ०७, २०१७ ११:११ Asia/Kolkata
  • नया शीत युद्ध ज़्यादा ख़तरनाक,

जब सोवियत संघ वर्ष 1991 में ध्वस्त हो गया तो अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज एच डब्ल्यू बुश और विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने मास्को से वादा किया था कि नैटो रूस की नई सीमाओं के क़रीब नहीं जाएगा।

यह वादा कुछ ही साल बाद बिल क्लिंटन ने तोड़ दिया और चेक, हंग्री तथा पोलैंड को नैटो में शामिल कर लिया। इसके बाद स्टोनिया, लिथवानिया और लैटविया भी इसी राह पर चल पड़े।

आज रूस एक बार फिर पहली पंक्ति की सैनिक शक्ति बन गया है। जार्जिया में रूस ने जो किया और यूक्रेन के संबंध में क़दम उठाया उसे अब पलटा नहीं जा सकता। रूस ने दुनिया के संवेदनशील क्षेत्रों में अपनी राजनैतिक, सामरिक और कूटनैतिक दावेदारी भी बढ़ाई है।

हांलाकि प्रशांत महासागर में अमरीका की नौसैनिक शक्ति है और जापान, भारत और आस्ट्रेलिया उसके अच्छे घटक हैं लेकिन फिर भी वह इस क्षेत्र में चीन को पीछे हटने पर मजबूर नहीं कर पाएगा। चीन की बढ़ती शक्ति की वजह से भी अब अमरीका के पास इस बात की संभावना नहीं है कि वह चीन को घेरने के लिए कोई घेराबंदी खड़ी कर पाए। इस तरह इस समय अमरीका की स्थिति यह है कि वह रूस और चीन जैसी दो बड़ी शक्तियों के बीच में उलझा हुआ है। ट्रम्प प्रशासन की कोशिश यह थी कि रूस से संबंध सुधर जाएं तो अमरीका को दो के बजाए एक बड़े प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ेगा। मगर अमरीकी कांग्रेस ने रूस पर नए प्रतिबंध लगाकर यह रास्ता भी बंद कर दिया है।

इस समय जो दूसरा शीत युद्ध चल रहा है उसका यह ख़तरनाक चरण है और इसे नियंत्रित कर पाना बहुत कठिन लगता है।

इस लिए कि पहले शीत युद्ध के विपरीत वर्तमान शीत युद्ध द्विपक्षीय के बजाए तीन पक्षीय है। जब इन तीनों शक्तियों के साथ कुछ अन्य देश भी लामबंद होने लगेंगे तो फिर आपदा प्रबंधन बहुत जटिल हो जाएगा। इस स्थिति में किसी भी स्टेट और नान स्टेट एक्टर की किसी भी ग़लत हरकत का असर सारी दुनिया की शांति व सुरक्षा पर पड़ेगा।

दूसरी बात यह है कि एसा लगता है कि अमरीका बहुत गंभीर रूप से अपनी शक्ति को बहुत बढ़ा चढ़ा का आंक रहा है। अमरीका अब अंतर्राष्ट्रीय वर्चस्व का स्वामी देश नहीं रह गया है कि लेकिन उसका बर्ताव एसी ही शक्ति के समान है। हर चुनौती को अमरीकी सरकार दबाव डालकर सामने से हटाने का विकल्प ही बेहतर समझती है। यदि यह रवैया न बदला तो पूर्वी यूरोप औज्ञ दक्षिणी चीन सागर में कोई बड़ा टकराव शुरू हो सकता है। कुछ लोग यहां तक कह रहे हैं कि अमरीका नतीजों का सही मूल्यांकन किए बिना ही आतंकवाद निरोधक अभियान के तहत पाकिस्तान में भी हस्तक्षेप कर सकता है।

तीसरी बात यह है कि 1950 के दशक के विपरीत इस समय दो नहीं 9 परमाणु शक्तियां हैं। कोरिया या दक्षिणी एशिया के क्षेत्र में कोई भी झड़प तत्काल परमाणु युद्ध के स्तर तक पहुंच सकती है।

चौथी बात यह है कि अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, युक्रेन, सीरिया, लीबिया और यमन की लड़ाइयों से यह बात साबित हो गई है कि वर्तमान समय में कोई भी युद्ध शुरू करना तो आसान है लेकिन उसे ख़त्म करना बहुत मुश्किल होता है।

नए शीत युद्ध का सबसे नकारात्मक परिणाम उन सामूहिक प्रयासों का निष्फल हो जाना है जो ग़रीबी, भुखमरी, जलवायु परिवर्तन, परमाणु युद्ध, सामूहिक पलायन और संक्रामक बीमारियों जैसी समस्याओं से निपटने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। इसी तरह विकास के लिए अवसरों व साधनों को सामूहिक रूप से प्रयोग करने का अवसर भी ख़त्म हो जाएगा।

 

मुनीर अकरम

संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत