राष्ट्रसंघ की मानवाधिकार परिषद से अमरीका बाहर
अमरीका एक अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संस्था राष्ट्रसंघ की मानवाधिकार परिषद से बाहर हो गया।
संयुक्त राष्ट्रसंघ में अमरीका की प्रतिनिधि ने वाशिग्टन की ओर से इस अन्तर्राष्ट्रीय परिषद से निकलने का कारण बताते हुए कहा कि जब यह परिषद ईरान और वेनेज़ोएला जैसे देशों में तथाकथित मानवाधिकारों के हनन पर चुप रहेगी तो इसमें बने रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता। उन्होंने फ़िलिस्तीनियों के संदर्भ में भी इस्राईल पर मानवाधिकारों के आरोपो की आलोचना करते हुए कहा कि मानवाधिकार परिषद की ओर से इस्राईल की निंदा भेदभाव से प्रभावित है। उन्होंने कहा कि एेसी संस्था मानवाधिकारों को नुक़सान पहुंचा रही है।
पिछले कुछ वर्षों के दौरान अमरकी सरकार का यह प्रयास रहा है कि वह अन्य वैश्विक संस्थाओं की ही भांति राष्ट्रसंघ की मानवाधिकार परिषद को अपने हितों के लिए प्रयोग करते हुए उन्हें एक राजनैतिक हथकण्डे के रूप में प्रयोग किया जाए। अमरीका की ओर से मानवाधिकार के विषय के दुरूपयोग के कारण बहुत से देश उसका विरोध करने लगे हैं क्योंकि वह फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध इस्राईल के अत्याचारों को छिपाने के प्रयास करता आया है। अमरीका को अपने इसी प्रकार के कार्यों के कारण राष्ट्रसंघ की मानवाधिकार परिषद से निकलना पड़ा है। इससे पहले वह यूनेस्को, पेरिस जलवायु समझौते, ट्रांस ट्रेड समझौते और परमाणु समझौते से निकल चुका है।
राष्ट्रसंघ की मानवाधिकार परिषद के संदर्भ में अमरीका का यह द्वेषपूर्ण व्यवहार एेसी स्थिति में सामने आया है कि जब वाशिंगटन की ओर से दक्षिणी अमरीका में अवैध पलायनकरताओं के मां-बाप से उनके बच्चों को जबरदस्ती छीना जा रहा है। इस विषय की अमरीका के भीतर और बाहर हर ओर कड़ी आलोचना की जा रही है। अमरीका के बहुत से नेताओं ने ट्रम्प प्रशासन के इस निर्णय का विरोध किया है। कुछ लोग तो इसे नाज़ियों के अत्याचारों जैसा बता रहे हैं। राष्ट्रसंघ की मानवाधिकार परिषद के आयुक्त ज़ैद रअद अलहुसैन ने अमरीका से मांग की है कि वह इस प्रकार की अमानवीय कार्यवाही को तत्काल बंद करे।
अमरीका की ओर से मानवाधिकारों का हनन केवल पलायनकर्ताओं के बच्चों को उनके मां-बाप से अलग करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि पिछले दो दशकों से वह इस प्रकार के हनन करता आ रहा है जैसे ग्वांतानामो, बगराम तथा अबूग़ुरैब बंदीगृहों में पूरी क्रूरता के साथ यातनाएं देना। विडंबना यह है कि अमरीका जैसे मानवाधिकारों का हनन करने वाला देश ही मानवाधिकारों के समर्थन का सबसे अधिक ढिंढोरा पीटता रहता है।