अमरीका व यूरोप और वही पुरानी ग़लतियां
कहा जा रहा है कि फ़्रान्स, ब्रिटेन और जर्मनी, मंगलवार को अमरीका के आदेश पर ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते के मतभेदों के समाधान के तंत्र को सक्रिय करना चाहते हैं।
रोएटर्ज़ ने कुछ कूटनयिकों के हवाले से बताया है कि ये तीनों देश मंगलवार को यह तंत्र (डीआरएम) सक्रिय करने वाले हैं। परमाणु समझौते के अनुच्छेद 36 के अनुसार इस समझौते का कोई भी सदस्य यह दावा कर सकता है कि उसे विश्वास है कि कोई दूसरा सदस्य परमाणु समझौते का उल्लंघन कर रहा है। यह दावा संयुक्त आयोग में पेश किया जाएगा, फिर मंत्रियों के स्तर पर परमार्श समिति में भेजा जाएगा और अगर फिर भी इसका समाधान न हुआ तो इसे संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के हवाले किया जाएगा। कहा जा रहा है कि परमाणु समझौते का यह अनुच्छेद, इस समझौते से अमरीका के निकलने से पैदा होने वाले राजनैतिक संकट के लिए नहीं बल्कि तकनीकी उल्लंघनों से निपटने के लिए है और अनुच्छेद 37 एक ज़हरीली गोली है।
हर चरण में इस प्रक्रिया का समय दोनों पक्षों की मर्ज़ी से बढ़ाया जा सकता है लेकिन कुछ टीकाकारों का कहना है कि ब्रिटेन, फ़्रान्स और जर्मनी की ओर से डीआरएम को सक्रिय बनाना, एक ख़तरनाक जुआ होगा। अमरीका व संयुक्त राष्ट्र संघ में फ़्रान्स के पूर्व राजदूत जेरर एरो का कहना है कि यूरोपीय सरकारों के लिए अपने जनमत के सामने ईरान के प्रतिबंध के बारे में बात करना बहुत कठिन होगा क्योंकि सभी यह जानते हैं कि वर्तमान संकट के लिए अमरीका ज़िम्मेदार है। रूस के विदेश मंत्री सेरगेई लावरोफ़ ने भी जनरल क़ासिम सुलैमानी की हत्या के अमरीका के अपराध की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि मध्यपूर्व के क्षेत्र में पाए जाने वाले तनाव का एकमात्र कारण, ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका की कार्यवाहियां हैं। उन्होंने कहा कि अमरीका परमाणु समझौते से निकल गया और उसने ईरान से व्यापार करने वाले सभी पक्षों पर प्रतिबंध लगा दिए और यही बात क्षेत्र में तनाव बढ़ने का कारण बन गई। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण ईरानी सरकार के औपचारिक प्रतिनिधि क़ासिम सुलैमानी की हत्या है जो एक सरकारी यात्रा पर इराक़ में थे। यह कार्यवाही पूरी तरह से अवैध थी। उन्होंने कहा कि अमरीका, ईरान को वार्ता का प्रस्ताव भी देता है और साथ ही उस पर कड़े प्रतिबंध लगाने की भी बात करता है। वह वार्ता का प्रस्ताव भी देता है और पहले ही ईरान के ख़िलाफ़ आदेश भी जारी करता है।
डोनल्ड ट्रम्प ने लगभग चार साल पहले मध्यपूर्व में जारी युद्धों की आलोचना की थी जिनके कारण बहुत से परिवारों को अपने बच्चों से हाथ धोना पड़ा है। उन्होंने कहा कि था कि हम जंग नहीं चाहते। मिनीसोटे विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर फ़्रान्सिस शेन ने न्यूयार्क टाइम्स से बात करते हुए कहा कि राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प को अधिक वोट मिलने की वजह यह थी कि लोगों को कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो इस युद्ध को समाप्त करे और उन्हें ट्रम्प के अलावा ऐसा कोई नहीं मिला जिसने कम से कम उनसे इतना ही कहा हो कि वह यह काम करेगा। लेकिन अब वाइट हाउस पर ज़ायोनी लाॅबी के प्रभाव के चलते अमरीका का यह राष्ट्रपति भी अपने देश को एक कभी न ख़त्म होने वाले युद्ध की ओर धकेल चुका है। (HN)