कराबाख़ विवाद में तुर्की क्यों कूदा? आर्मनिया के राष्ट्रपति का विशलेषण
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आर्मीनिया के राष्ट्रपति आरमन सरकीसियान ने मास्को से छपने वाले अख़बार कामरसेंट को दिए गए साक्षात्कार में यह विशलेषण पेश किया है कि तुर्की क्यों कराबाख़ के विवाद में कूद पड़ा।
(last modified 2023-04-09T06:25:50+00:00 )
Oct २०, २०२० ०९:३३ Asia/Kolkata
  • कराबाख़ विवाद में तुर्की क्यों कूदा? आर्मनिया के राष्ट्रपति का विशलेषण

आर्मीनिया के राष्ट्रपति आरमन सरकीसियान ने मास्को से छपने वाले अख़बार कामरसेंट को दिए गए साक्षात्कार में यह विशलेषण पेश किया है कि तुर्की क्यों कराबाख़ के विवाद में कूद पड़ा।

सरकीसियान का कहना है कि कराबाख़ की लड़ाई में तुर्की आज़रबाइजान का केवल समर्थन नहीं कर रहा है बल्कि हम समझते हैं कि वह युद्धरत पक्ष बन गया है क्योंकि अर्दोग़ान सरकार कैस्पियन सागर के ऊर्जा भंडारों से यूरोपीय देशों के ऊर्जा निर्यात को अपने कंट्रोल में लेना चाहती है।

यह केवल कराबाख़ का मामला नहीं है तुर्की की नज़रें तेल और गैस की पाइपलाइनों पर हैं। अगर इस इलाक़े में लड़ाई लंबी खिंचती है तो तुर्की ज़्यादा मज़बूती से पैर जमाने में कामयाब होगा। तुर्की दरअस्ल रूस के पड़ोस में पांव पसार रहा है वह चाहता है कि इस इलाक़े से यूरोप जाने वाली पाइपलाइनों पर उसका नियंत्रण रहे।

इसका नतीजा यह निकलेगा कि यूरोप को ऊर्जा की सप्लाई में तुर्की की भूमिका बहुत निर्णायक हो जाएगी वह इस मार्ग के केन्द्र में होगा और जब चाहेगा तो यूरोप को ऊर्जा मिलेगी और नहीं चाहेगा तो ऊर्जा नहीं मिलेगी। इससे पहले तक तुर्की केवल ऊर्जा का उपभोक्ता देश था और अब वह सप्लाई लाइन का प्रभावी देश बन जाएगा।

कराबाख़ की अगर बात की जाए तो इस इलाक़े के लोग 65 साल से स्वाधीनता के साथ जीवन गुज़ार रहे थे। सोवियत संघ के नियंत्रण के समय भी इस इलाक़े के लोग स्वाधीन रहे और सोवियत संघ ने उनकी स्वाधीनता को सुरक्षित रखा। 1994 में शांति समझौता उसके बाद 26 साल से इस इलाक़े के लोग शांति के साथ जीवन गुज़ार रहे थे। 1990 में युद्ध हुआ था जिसके बाद 1994 में शांति समझौता हो गया अब तुर्की की ललचाई नज़रें ऊर्जा की सप्लाई लाइन पर लग गई हैं तो नतीजे में युद्ध के हालात पैदा हो गए हैं।

तुर्की केवल कराबाख़ नहीं सीरिया में भी विवाद का हिस्सा बना हुआ है और लीबिया में भी ऊर्जा भंडारों को देखते हुए कूद पड़ा है, यूनान से भी ऊर्जा के विषय पर ही विवाद है और यह विवाद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है।

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