अमरीका में फ़िलिस्तीन की ओर खिसकता जनमत...
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नस्लभेद के इल्ज़ाम का सामना कर रहे अमरीकी समाज का फ़िलिस्तीन के संबंध में नज़रिया तेज़ी से बदलता हुआ।
(last modified 2023-04-09T06:25:50+00:00 )
May २२, २०२१ २०:४५ Asia/Kolkata
  • फ़िलिस्तीनियों पर इस्राईल के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ 15 मई 2021 को वॉशिंगटन में प्रदर्शन करते लोग
    फ़िलिस्तीनियों पर इस्राईल के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ 15 मई 2021 को वॉशिंगटन में प्रदर्शन करते लोग

नस्लभेद के इल्ज़ाम का सामना कर रहे अमरीकी समाज का फ़िलिस्तीन के संबंध में नज़रिया तेज़ी से बदलता हुआ।

अमरीका पर 1960 से नस्लभेद का इल्ज़ाम इतना नहीं लगा जितना आज के दिन में लग रहा है। ब्लैक लाइव्ज़ मैटर (बीएलएम) आंदोलन का तेज़ होना, अमरीकियों को, अफ़्रीकी-अमरीकियों के साथ राज्य की ओर से सदियों से चले आ रहे सिस्टमैटिक दुर्व्यवहार से निपटने के लिए मजबूर कर रहा है। नतीजे में युवा अमरीकी अब इस बात पर यक़ीन नहीं करते कि उनके समाज में रंगभेद नहीं है।

पांच दशक पहले सिविल राइट्स मूवमेंट की तरह, बीएलएम आंदोलन से  अश्वेतों, लैटिन अमरीकियों, स्थानीय अमरीकियों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ सिस्टमैटिक दमन के संयुक्त कारण से पर्दा हटा। नस्लभेदी हिसाब किसाब के इस चरण में वे लोग भी शामिल हैं जिन्हें अमरीकी मीडिया, राजनीति और किताबों में लगातार नरपिशाच दर्शाया जाता हैः वे फ़िलिस्तीनी हैं।

युवा और सुधारवादी, राजनेताओं के इस्राईल के बिना शर्त समर्थन को अब आँख बंद करके क़ुबूल नहीं करते क्योंकि वे सोशल मीडिया के ज़रिए फ़िलिस्तीनियों की आवाज़ को सुन और अनुभव को महसूस कर रहे हैं। उन्हें अब यह बात समझ में आ गयी है कि इस्राईल-फ़िलिस्तीन विवाद, सिर्फ़ जटिल ही नहीं, बल्कि नस्लभेदी व असंतुलित है। सुधारवादियों को अमरीका के उपनिवैशिक अतीत और इस्राईल द्वारा फ़िलिस्तीनियों के दमन में समानता नज़र आती है।

ज़मीनी स्तर पर फ़िलिस्तीनियों के आम लोगों से संपर्क ने अमरीकियों को यह बात मानने पर मजबूर कर दिया कि अमरीका की इस्राईल को मदद फ़िलिस्तीनियों को सिस्टमैटिक तरीक़े से अमानवीय दर्शाने में योगदान दे रही है, उसी तरह जिस तरह अमरीका में क़ानूनी संरक्षण और सैन्यीकरण से, अश्वेतों का दमन हो रहा है।

इसलिए इस्राईल की ओर से फ़िलिस्तीनियों को अतिग्रहित पूर्वी अलक़ुद्स में उनके घरों से बल पूर्वक निकाले जाने और ग़ज़्ज़ा में आम लोगों पर बमबारी पर ताज़ा रिएक्शन से, अमरीकी जनमत फ़िलिस्तीन की ओर खिसकता महसूस हो रहा है।

2001 से 2011 के बीच कराए गए अपीनियन पोल में इस्राईल के पक्ष में लगातार जनमत का समर्थन नज़र आया। गैलप के अपीनियन पोल में 50 फ़ीसदी अमरीकियों में इस्राईल से हमदर्दी नज़र आयी जबकि 20 फ़ीसदी ही अमरीकी, फ़िलिस्तीनियों के प्रति हमदर्द दिखायी दिए। जब इसे राजनैतिक दलों में बांटे तो रिपब्लिकन्ज़ में यह हमदर्दी 80 फ़ीसदी थी और डेमोक्रेट्स में 60 फ़ीसदी। जबकि 7 फ़ीसदी रिपब्लिकन्ज़ और 24 फ़ीसदी डेमोक्रेट्स ही फ़िलिस्तीनियों के प्रति हमदर्द थे। लेकिन जनवरी 2018 से प्यू रिसर्च सेंटर पोल के मुताबिक़, डेमोक्रेट्स में इस्राईल और फ़िलिस्तीन के प्रति हमदर्दी बराबरी के क़रीब आना शुरू हो गयी। दोनों के प्रति डेमोक्रेट्स में 25 फ़ीसदी थी, जबकि रिपब्लिकन्ज़ वोटर्ज़ में इस्राईल के लिए हमदर्दी 79 फ़ीसदी पर बनी हुयी थी। यह डेटा, फ़िलिस्तीनी मानवाधिकार के प्रति पक्षपात के आधार पर अमरीकी नज़रिये में बढ़ते गैप को दिखा रहा है।

13 मई को हाउस रिप्रेज़ेन्टेटिव एलेक्ज़ैन्ड्रिया ओकासियो कॉर्टेज़ ने कॉन्ग्रेस में अपनी स्पीच में राष्ट्रपति बाइडेन की आलोचना की। साफ़ तौर पर उन्होंने कहाः “राष्ट्रपति और कई दूसरी हस्तियों ने इस हफ़्ते कहा कि इस्राईल को आत्म रक्षा का अधिकार है। यह भावना पूरे हाउस में महसूस की गयी, मैं पूछती हूं कि क्या फ़िलिस्तीनियों को ज़िन्दा रहने का अधिकार हैॽ क्या हम इस पर यक़ीन रखते हैंॽ अगर ऐसा है तो इसके प्रति हमारी ज़िम्मेदारी है। हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेन्टेटिव में चुन कर पहुंचने वाली पहली अमरीकी फ़िलिस्तीनी रशीदा तालिब ने फ़िलिस्तीनियों की ज़िन्दगी के प्रति सरकार की खुली उदासीनता की निंदा की। उन्होंने कॉन्ग्रेस में अपने साथियों से पूछाः फ़िलिस्तीनियों की ज़िन्दगी की अहमियत ज़ाहिर होने के लिए अभी और कितने फ़िलिस्तीनियों को मरना होगा।” रशीदा तालिब ने साफ़ तौर पर कहाः “फ़िलिस्तीनियों की आज़ादी, पूरी दूनिया में दमन के ख़िलाफ़ जारी संघर्ष से जुड़ी हुयी है।”

अमरीका के चुने गए अधिकारियों की ओर से इस तरह का बयान पांच साल पहले तक सुनाई नहीं दिया था। इस बात में शक नहीं कि फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों के समर्थन को अकसर एंटी सेमिटिज़्म का नाम देकर भ्रान्ति पैदा की जाती थी। हालांकि यह दबाव अभी भी मौजूद है। नस्ल को लेकर बदलते रवैये का फ़िलिस्तीनियों के प्रति रवैये पर गहरा असर पड़ेगा।

इक्कीसवीं सदी का नस्लभेद के ख़िलाफ़ अभियान, अमरीकियों को यह सिखा रहा है कि किस तरह चालाक मीडिया, राजनीति और अर्थव्यवस्था लोगों के पूरे समूह का दमन करता है और उसे ही उसकी मुसीबत के लिए दोषी ठहराता है। चूंकि इस सबक़ का संबंध फ़िलिस्तीन से भी है, इसलिए सवाल यह है कि अमरीकी विदेश नीति में कब फ़िलिस्तीनियों की ज़िन्दगी को अहमियत दी जाएगी। (साभारः अल-जज़ीरा)