बहरैन की क्रान्ति-1
बहरैन की जनक्रान्ति इस समय संवेदनशील चरण में पहुंच चुकी है।
यह संघर्ष दसियों साल से आले ख़लीफ़ा शाही सरकार के अत्याचार तथा अमरीका और ब्रिटेन के साम्राज्य के विरुद्ध जारी है। बहरैन की जनक्रान्ति बहुत से उतार चढ़ाव से गुज़रते हुए आगे बढ़ती रही है और अब सबसे संवेदनशील समय आ गया है।
आले ख़लीफ़ा सरकार ने बहनै की जनक्रान्ति के नेता और वरिष्ठ धर्मगुरू आयतुल्लाह शैख़ ईसा क़ासिम की नागरिकता को निरस्त करके उनके विरुद्ध मनी लांड्रिंग के निराधार व हास्यास्पद आरोपों के आधार पर अदालती कार्यवाही करना चाहती है। दूसरी ओर उसने सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी अलवेफ़ाक़ के प्रमुख शैख़ अली सलमान तथा क्रान्तिकारी धर्मगुरू तथा बहरैन धर्मगुरू परिषद के प्रमुख सैयद मजीद मिशअल जैसे नेताओं को जेलों में डालकर हालात को और भी विस्फोटक बना रही है। शाही सरकार पहले ही इन दोनों संगठनों को भंग कर चुकी है। एसा लगता है कि आले ख़ालीफ़ा सरकार बिना सोचे समझे क़दम उठा रही है और बहनै की जनक्रान्ति को कुचल देने पर तुली हुई है।
बहरैन की जनक्रान्ति इन्हीं हालिया पांच सालों तक सीमित नहीं है जिसे शाही सरकार कुचलने में सफल हो जाएं यह आंदोलन तो वर्ष 1971 से बल्कि उससे भी पहले से चल रहा है तथा बहरैन की जनता सरकार के भेदभाव और अतिक्रमणों के विरुद्ध उचित अवसरों पर विरोध जताते रहे हैं। यह विरोध मुख्य रूप से बहरैन की शीया आबादी की तरफ़ से होता है जो देश की कुल जनसंख्या का 70 प्रतिशत भाग है। बहनै की जनक्रान्ति की जड़ों की समीक्षा करनी है तो इस धरती के इतिहास की संक्षिप्त जानकारी ज़रूरी है।
बहरैन का मानचित्र देखने से पता चलता है कि इस देश का क्षेत्रफल लगभग 700 वर्ग किलोमीटर है। यह छोटे छोटे 30 द्वीपों से मिलकर बना है। इनमें सबसे बड़ा द्वीप मनामा है और इस द्वीप का मुख्य शहर मनामा इस देश की राजधानी है। यह शहर देश के उत्तरी भाग में स्थित है। यह देश इतिहास के एक बड़े भाग में ईरान में शामिल दिखाई देता है। पश्चिमी साम्राज्यवाद ने इस भूखंड को ईरान से अलग कर दिया जबकि इसी बीच आले ख़लीफ़ा ने इस धरती पर अपना शासन स्थापित कर लिया। इससे पहले तक आले ख़लीफ़ा परिवार की हुकूमत सऊदी अरब, क़तर और कुवैत में थी लेकिन कुवैत के अन्य राजाओं से गहरे मतभेद हो जाने के बाद इस परिवार ने बहरैन पलायन किया तथा वर्ष 1783 में इस परिवार ने इस क्षेत्र का शासन अपने हाथ में ले लिया लेकिन आंतरिक मतभेद और आले सऊद की ग़द्दारी के कारण इस क्षेत्र का शासन बार बार इस परिवार के हाथ से निकल गया। अंततः वर्ष 1820 में यह क्षेत्र ब्रिटेन के अधीन चला गया। अलबत्ता ईरान ने इस क्षेत्र पर दूसरों के शासन को कभी भी मान्यता नहीं दी बल्कि हमेशा इस पर आपत्ति जताता रहा। बहरैन की जनता ने भी ब्रिटेन के 170 साल तक चलने वाले वर्चस्व काल में बार बार विद्रोह किया लेकिन ब्रिटेन ने आले ख़लीफ़ा सरकार की मदद से हर बार विद्रोह को कुचल दिया।
यह स्थिति इसी प्रकार जारी रही यहां तक कि वर्ष 1971 में ब्रिटेन की साज़िश से ईरान के पिट्ठू राजा ने ईरान से बहरैन के विघटन को स्वीकार कर लिया। वैसे यह तय पाया था कि बहरैन में संयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में एक जनमत संग्रह कराया जाएगा लेकिन जब जनमत संग्रह हुआ तो केवल 40 बहरैनी परिवारो को इसमें भाग लेने दिया गया और इसी दिखावे के जनमत संग्रह के परिणाम के आधार पर बहरैन को ईरान से अलग कर दिया गया।
बहरहाल स्वाधीनता मिल जाने के बाद भी आले ख़लीफ़ सरकार की समस्याओं में कोई कमी नहीं आई बल्कि नए समस्याएं उत्पन्न होती रहीं। अब ब्रिटेन के लिए भी यह संभव नहीं रहा कि प्रत्यक्ष रूप से इस देश में हस्तक्षेप करे अतः उसने अपने एजेंटों को इस देश के सैनिक व सुरक्षा विभागों में उच्च पदों पर बिठा दिया। इसी प्रकार क़तर से बहरैन के सीमावर्ती विवाद बढ़ते चले गए। लेकिन बहरैन की सबसे बड़ी समस्या आले ख़लीफ़ा क़बीले की अत्याचारी सरकार थी जिसे जनता की इच्छाओं और लोकतंत्र बर्दाश्त नहीं है। बहरैन को स्वाधीनता मिलने के बाद शुरू के वर्षों में सरकार ने जनाधार बनाने के लिए जनता को कुछ बहुत सीमित स्तर पर कुछ अधिकार दिए। जिसके बाद इस देश में संसद भी बन गई और संविधान भी संकलित हो गया।
इस संसद में जो प्रतिनिधि चुनकर आए उनमें शैख़ ईसा क़ासिम भी थे जो इस समय बहनै की जनक्रान्ति का नेतृत्व कर रहे हैं। लेकिन शाही सरकार ने दो साल से ज़्यादा इस संसद के कामकाज को सहन नहीं किया। वर्ष 1975 में सरकारी सुरक्षा क़ानून पास करने से संसद के इंकार के बाद शाही सरकार ने संसद को भंग कर दिया। इस क़ानून में कहा गया था कि यदि कोई भी व्यक्ति या संगठन सरकार के विरोधी रुख़ अपनाता है तो इसे देश की सुरक्षा का विरोध माना जाएगा और सरकार इस संदर्भ में संदिग्ध लोगों को तत्काल गिरफ़तार करके बिना किसी अदालती कार्यवाही के जेल में डाल सकेगी।
इसके बाद से बहरैन में संसद नहीं है और शैख़ ईसा बिन सलमान अपने भाई शैख़ ख़लीफ़ा बिन सलमान के साथ मिलकर देश में अत्याचारी सरकार चला रहे हैं। चूंकि आले ख़लीफ़ा परिवार के पास कोई जनाधार नहीं है अतः उसने शुरू ही से अमरीका, ब्रिटेन और सऊदी अरब जैसी बाहरी शक्तियों का सहारा लिया। लेकिन बहरैन की जनता ने जिसने आले ख़ालीफ़ के शासन और ब्रिटिश साम्राज्य के चलते बड़े पैमाने पर दमन और अत्याचार का सामना किया था विभिन्न रास्तों से यह प्रयास किया कि अपने नागरिक अधिकार प्राप्त करे।
इसका कारण यह भी था कि आले ख़लीफ़ा सरकार बड़ी संकीर्ण सोच रखती है और क़बायली रूजहान के साथ बहरैन के बहुसंख्या शीया समुदाय को कोई भी अधिकार देने पर तैयार नहीं है तथा इस समुदाय के लोगों से दुशमनी का बर्ताव करती है। शाही सरकार ने एक निंदनीय काम यह किया कि अलग अलग देशों से सुन्नी समुदाय के लोगों को बहरैन लाकर नागरिकता देना शुरू कर दिया ताकि देश की डेमोग्राफ़ी बदल जाए। शाही सरकार हमेशा इस प्रयास में भी रही कि शीया सुन्नी समुदाय कभी भी एकजुट न होने पाएं उनके बीच मतभेद बने रहें। लेकिन उसे इस लक्ष्य में बहुत सफलता नहीं मिली क्योंकि दोनों समुदायों ने बड़ी सूझबूझ से काम किया। आले ख़लीफ़ा शासन की डिक्टेटरशिप से पूरे देश की जनता तंग आ चुकी है। आले ख़लीफ़ा सरकार ने सेना, सुरक्षा बल तथा प्रशासनिक विभागों में शीयों को हमेशा बड़े पदों से दूर रखा है और उन्हें हमेशा आर्थिक दुर्दशा में फंसाए रखा।
वर्ष 1980 के दशक में बहरैन की जनता ने आज़ादी और समान सामाजिक अधिकारों के लिए व्यापक रूप से आंदोलन चलाया और प्रदर्शन किए ।व्रष 1992 से देश की धार्मिक व राष्ट्रीय हस्तियों ने संसद को बहाल करने की मांग शुरू की लेकिन एक साल बाद नरेश ने सलाहकार परिषद का गठन किया जो जनता का न तो प्रतिनिधित्व करती थी और न ही उसे कुछ विशेष अधिकार थे। इसी लिए जनता का विरोध बढ़ता चला गया। 17 दिसम्बर सन 1994 को कुछ प्रदर्शनकारियों के शहीद और घायल होने के बाद आंदोलन व्यापक हो गया और यह ताराख़ बहरैन के इतिहास में शहीद दिवस के रूप में दर्ज हो गई। इस आंदोलन का नेतृत्व अल्लामा अब्दुल अमीर अलजमरी ने किया जो बहरैन के वरिष्ठ क्रान्तिकारी धर्मगुरू थे। उन्हें कई बार गिरफ़तार करके यातनाएं दी गईं और वर्ष 2003 में उनका निधन हो गया। आले ख़लीफ़ा को शैख़ जमरी से इतना द्वेष था कि वर्ष 2011 में आदेश देकर उनका मक़बरा गिरवा दिया और उस जगह का अधिग्रहण कर लिया।
बहरहाल वर्ष 1997 तक आले ख़लीफ़ा सरकार ने बहनै की जनक्रान्ति को एक बार फिर कुचल दिया। इस दौरान दर्जनों लोग शहीद हुए और हज़ारों को गिरफ़तार करके जेलों में डाल दिया गया। उस समय बहरैन की कुल आबादी लगभग 5 लाख थी। बहनै की जनक्रान्ति को कुचलने में जिस व्यक्ति ने आले ख़लीफ़ा सरकार की भारी मदद की वह ब्रिटिश जनरल इयान स्टुअर्ट हेंडरसन था जिसे बहरैनी कसाई कहा जाता है। वर्ष 2011 में जान लेल्ट्स ने हेंडरसन का स्थान लिया जिसकी तीन साल पहले मौत हो गई।
वर्ष 1999 में शैख़ ईसा बिन सलमान की मौत हो गई और फिर उनके बेटे शैख़ हमद बिन ईसा ने शासन अपने हाथ में ले लिया। शैख़ हमद ने शुरू में घोषणा की कि वह देश की राजनैतिक व सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहते हैं तथा संविधान में भी सुधार लाने का इरादा रखते हैं और संवैधानिक राजशाही व्यवस्था स्थापित करने की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंन कुछ राजनैतिक क़ैदियों को आज़ाद कर दिया तथा एक घोषणापत्र पर जनमत संग्रह करवाया। जनता को इस बारे में विश्वास नहीं था लेकिन फिर भी लोगों ने जनमत संग्रह में भाग लिया।
अधिक समय नहीं बीता था कि यह हक़ीक़त सामने आ गई कि शैख़ हमद सिर्फ़ दिखावे का सुधार करना चाहते हैं और सभी अधिकारी शाही ख़ानदान के हाथ में रखना चाहते हैं। नई व्यवस्था में दो सदन बनाए गए एक का नाम मजलिसे शूरा रखा गया जिसके सदस्यो का चयन शाही परिवार के हाथ में था और अधिकतर अधिकार इसी सदन को दिए गए। दूसरा सदन प्रतिनिधि सभा के नाम से था जिसे कोई विशेष अधिकार नहीं दिए गए। जैसे कि बहरैन की जनता चाहती है कि शैख़ ख़लीफ़ा बिन सलमान को प्रधानमंत्री पद से हटाया जाए जो वर्ष 1971 से इस पद पर जमे हुए हैं और इस पूरी अवधि में बार बार जनता का दमन करते आए हैं लेकिन वह संसद के समर्थन के बग़ैर अपने इस पद पर बने हुए हैं।
आले ख़लीफ़ा शासन से क्षुब्ध होने के बावजूद बहरैनी दलों और संगठनों ने वर्ष 2006 और वर्ष 2010 में होने वाले चुनावों में भाग लिया लेकिन शैख़ हमद शासन ने उन्हें बार बार परेशान किया और उन पर निराधार आरोप लगाए। इन संगठनों के नेताओं पर शाही सरकार यह आरोप लगाती है कि वह इस्लामी गणतंत्र ईरान से सहयोग करते हैं हालांकि उसने अब तक एक भी प्रमाण पेश नहीं किया है।