बहरैन की क्रान्ति-2
यदि बहरैन की जनता की मांगों की समीक्षा की जाए तो साफ़ पता चलता है कि इस देश के लोग भेदभाव और तानाशाही व्यवस्था से मुक्ति पाकर अपने भविष्य के फ़ैसले अपने हाथ से करने का अधिकार चाहते हैं।
लेकिन उनकी इस मांग को अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और पश्चिमी सरकारों का समर्थन मिलना तो दूर की बात है यह संस्थाएं और सरकार पूरी तरह बहरैन की जनक्रान्ति की उपेक्षा कर रही हैं।
पिछली चर्चा में हमने आले ख़ालीफ़ा परिवार और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध बहरैन की जनता के संघर्ष के इतिहास की संक्षिप्त समीक्षा की थी। हमने बताया कि बहरैन के वर्तमान शासक शैख़ हमद बिन ईसा ने वर्ष 2001 में लोकतांत्रिक सुधारों का वादा किया और एक घोषणापत्र पर जनमत संग्रह करवाया लेकिन उस पर उन्होंने अमल नहीं किया। दस साल बाद जब अन्य अरब देशों की तरह बहरैन भी तानाशाही सरकार के तहत संचालित हो रहा था अचनाक ट्यूनीशिया से अरब क्रान्ति की चिंगारी उठी और ज़ैनुल आबेदीन बिन अली की सरकार गिर गई। इसके बाद मिस्र की जनता ने क्रान्ति शुरू कर दी और तानाशाह हुसनी मुबारक की सरकार गिर गई। इसी बीच बहरैन की जनता ने भी सरकार के अत्याचारों और भेदभाव के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया लेकिन बहरैन की यह क्रान्ति पिछले आंदोलनों की तुलना में अधिक व्यापक और शक्तिशाली साबित हुई और लंबा समय बीत जाने के बाद भी जारी है।
14 फ़रवरी सन 2011 को बहरैन की जनता की क्रान्ति शुरू हुई और दसियों हज़ार लोगों ने तानाशाही सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन किए। इसके बाद से लगातार लोग सड़कों पर आकर विरोध प्रदर्शन करने लगे। लोगों ने राजधानी मनामा के पर्ल स्वक्वायर पर धर्ना दिया। इन प्रदर्शनों पर आले ख़लीफ़ा की शाही सरकार ने हमले किए जिसमें बहुत से लोग हताहत और घायल हुए। बहरैन की जनता की मांग यह है कि देश में वास्तविक संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था हो और देश का संचालन जनता के हाथों अंजाम पाए। इस समय बहरैन में संसद तो है लेकिन उसके पास अधिकार नहीं हैं। दूसरी ओर आले ख़लीफ़ा सरकार इस प्रकार संसदीय चुनाव करवाती है कि 70 प्रतिशत से अधिक शीया आबादी के प्रतिनिधियों को संसद में 50 प्रतिशत से कम सीटें मिलें ताकि तानाशाहों और उनके विदेशी समर्थकों के हितों को कोई ख़तरा न हो।
बहरैन की जनता की यह भी मांग है कि राजनैतिक दलों और मीडिया को आज़ादी दी जाए तथा राजनैतिक क़ैदियों को रिहा किया जाए। 2011 में बहरैन की जनक्रान्ति शुरू होने के बाद से आले ख़लीफ़ा सरकार ने बहुत से लोगों को गिरफ़तार करके जेलों में डाल दिया है और भयानक रूप से यातनाएं दी हैं। मानवाधिकार की अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने बहुत विलंब से इस कड़वी सच्चाई को माना कि बहरैन में सरकार अमानवीय बर्ताव कर रही है। कारावास अध्ययन संस्था की रिपोर्ट के अनुसार बहरैन में 4028 क़ैदी जेलों में बंद हैं जो इस देश की आबादी के अनुपात की दृष्टि से पूरे पश्चिमी एशिया में सबसे बड़ी संख्या है। यहां तक कि बहरैनी सरकार ज़ायोनी शासन से भी आगे निकल गई है। इस समय बहरैन में एक भी सरकार विरोधी समाचार पत्र प्रकाशित नहीं होता तथा वास्तव में जो विपक्षी दल हैं उन्हें भंग कर दिया गया है।
बहरैन की क्रान्तिकारी जनता की एक मांग यह भी है कि प्रधानमंत्री ख़लीफ़ा बिन सलमान को हटाया जाए जो वर्तमान नरेश के चाचा हैं। वह वर्ष 1971 से इस पद पर असीन हैं और वह देश में घुटन का वातावरण बनाने और विरोधियों को कुचलने में आगे रहे हैं। इसी लिए बहरैन की जनता बहुत दिनों से मांग क रही है कि 81 वर्षीय प्रधानमंत्री को पद से हटाया जाए।
बहरैन की जनता वास्तव में मानवाधिकार और लोकतंत्र के बारे में पश्चिमी देशों के दोहरे रवैये का शिकार हुई है। यह सरकारें बहरैन की तानाशाही सरकार से अच्छे संबंध रखती हैं इस लिए वह बहरैनी जनता के जनान्दोलन और उनकी लोकतांत्रिक मांगों का सही ढंग से समर्थन करने पर तैयार नहीं हैं। बहरैन की जनता की मांगें वास्तव में इस देश में आले ख़लीफ़ा का तानाशाही शासन समाप्त करने के लिए हैं। यही कारण है कि तानाशाही सरकार इस आंदोलन का पूरी शक्ति से विरोध कर रही है। शुरू में एक महीने तक जनता ने सरकार पर भारी दबाव बनाया और इस बीच सबसे बड़े विपक्षी दल अलवेफ़ाक़ के नेताओं ने तानाशाही सरकार से जनता की मांगों के बारे में विस्तार से बात की लेकिन साफ़ ज़ाहिर था कि तानाशाही सरकार जनता की मांगें मानने वाली नहीं है इस लिए वार्ता विफल हो गई। 15 मार्च 2011 के अमरीका के तत्कालीन युद्ध मंत्री राबर्ट गेट्स के बहरैन दौरे के अवसर पर अचानक सऊदी अरब ने 1000 सैनिक भेज दिए और उसके बाद टैंकों और हेलीकाप्टरों का प्रयोग करके जनता के शांतिपूर्ण आंदोलन को कुचलना शुरू कर दिया। इस हमले में दर्जनों प्रदर्शनकारी मारे गए। सेना ने पर्ल स्क्वायर को गिरा दिया और वहां हर प्रकार के धरना प्रदर्शन पर रोक लगा दी।
कुछ दिन बाद संयुक्त अरब इमारात के 500 सैनिक भी बहरैन पहुंच गए ताकि बहरैन में सऊदी सैनिकों की उपस्थिति को फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद के रक्षा समझौते के तहत उठाया गया क़दम दर्शाया जा सके। हालांकि यह रक्षा समझौता विदेशी हमले का मुक़ाबला करने के लिए हुआ था जन प्रदर्शनों को कुचलने के लिए नहीं। इस सब के बाद भी बहरैन की जनता की क्रान्ति रुकी नहीं और साढ़े पांच साल का समय बीत जाने के बाद भी जनान्दोलन किसी बिफरे हुए समुद्र का दृश्य पेश कर रहा है। सऊदी अरब के सैनिकों की मदद से आले ख़लीफ़ा सरकार के सुरक्षा बलों ने बड़े भयानक अपराध किए हैं। बहुत से बेगुनाह इंसान शहीद कर दिए गए। हज़ारों की संख्या में लोग घायल हुए और जेलों में डाल दिए गए। घरों और मस्जिदों को ध्वस्त कर दिया गया। आम जनता को नमाज़े जुमा की भी अनुमति नहीं दी जा रही है। लेकिन फिर भी जनान्दोलन जारी है।
जनान्दोलन जारी रहने की वजह यह है कि इसकी जड़े बहुत गहरी हैं। हालांकि यह जनान्दोलन वर्ष 2011 की शुरुआत में कई अरब देशों में क्रान्ति शुरू होने के अवसर ज्वालामुखी की तरह फट लेकिन इसका इतिहास बहुत पुराना है। इस तरह अरब जगत की क्रान्ति केवल एक बहाना बनी और बहरैन की जनता ने लंबे समय से जारी अत्याचारी शासन के विरुद्ध अपनी लड़ाई छेड़ दी। बहरैन की जनता 170 साल तक ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहने के बाद ज़ाहिरी तौर पर वर्ष 1971 में स्वतंत्रता प्राप्त कर ली लेकिन उसके बाद भी इस देश में ब्रिटेन, अमरीका और आले सऊद का हस्तक्षेप जारी है। विदेशी हस्तक्षेप का मुक़ाबला करने और देश के भीतर जारी अत्याचार पर विराम लगाने का जज़्बा बहरैन के आंदोलन में ख़ून की तरह दौड़ रहा है।
बहरैन की जनता के आंदोलन की दूसरी वजह ग़रीबी और भेदभाव है। देश की अधिकतर आबादी में ग़रीबी फैली हुई है और विशेष रूप से शीया आबादी शाही सरकार का प्रकोप झेल रही है। तेल संसाधनों में होने वाली कमी को देखते हुए इस बात की आशंका है कि ग़रीबी और भी बढ़ेगी। बेरोज़गारी बढ़ी हुई है और शाही सरकार देश की डेमोग्राफ़ी बदलने पर अड़ी हुई हैं। देश में इतनी आर्थिक समस्याएं होने के बावजूद शाही परिवार का हर सदस्य राजाओं जैसा जीवन व्यतीत कर रहा है।
बहरैन की जनता ने वर्षों बल्कि दशकों से जारी अपने आंदोलन से बहुत से अनुभव प्राप्त किए हैं और उसे सरकार के हथकंडों की पूरी जानकारी है। इसी लिए इस देश के लोग अन्य अरब देशों की तरह आसानी से सरकार के झांसे में आने वाले नहीं हैं। इस देश के लोगों के पास आयतुल्लाह शैख़ ईसा क़ासिम जैसे नेता हैं जो देश का मार्गदर्शन कर रहे हैं। इसी लिए टीकाकार मानते हैं कि बहरैन की जनता के आंदोलन को कुचलना आसान नहीं है। विशेषज्ञ यह समझते हैं कि जब तक जनता को उसके अधिकार नहीं मिल जाते यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।
इस बीच सऊदी सरकार को दूसरों से ज़्यादा चिंता सता रही है कि कहीं बहरैन की क्रान्ति सफल न हो जाए। इसका कारण यह है कि आले ख़लीफ़ा सरकार की तरह आले सऊद सरकार भी देश की जनता विशेष रूप से शीया समुदाय को उसके अधिकार देने पर तैयार नहीं है। सऊदी अरब के शीया भी लंबे समय से अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे हैं। अतः यदि बहरैन की जनता की क्रान्ति सफल हो जाती है तो इसका सीधा असर सऊदी अरब पर पड़ेगा। तथा सऊदी अरब के शीया समुदाय के आंदोलन में नई शक्ति आ जाएगी। इसके अलावा बहरैन में लोकतंत्र की स्थापना हो जाने से क्षेत्र की अन्य शाही सरकारों पर भी प्रभाव होगा क्योंकि तानाशाही व्यवस्था वाले देशों की जनता में भी लोकतंत्र की ललक पैदा होना स्वाभाविक है और वह भी लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू कर देंगे। ऐसी स्थिति में आले सऊद सरकार सबसे अधिक समस्या में होगी क्योंकि तानाशाही व्यवस्थाओं की अगुवा वही है। इस प्रकार देखा जाए तो जहां क़रीब स्थित होने के कारण सऊदी अरब के लिए बहरैन में सैनिक हस्तक्षेप करना आसान हो गया है वहीं आले सऊद सरकार के लिए यह स्थिति ख़तरनाक भी है।