बहरैन की क्रांति-3
आले ख़लीफ़ा शासन पर ध्यान योग्य प्रभाव रखने वाला एक अन्य देश अमरीका है।
1960 के दशक में फ़ार्स की खाड़ी से ब्रिटेन के निकलने के बाद, अमरीका ने उसका स्थान लेने का प्रयास किया। इस उद्देश्य के लिए स्ट्रैटेजिक स्थिति के कारण वाशिंगटन ने बहरैन द्वीप पर ध्यान केन्द्रित किया। बहरैन दिखावटी रूप से 1971 में स्वाधीन हुआ, लेकिन उसी साल अमरीका और आले ख़लीफ़ा शासन ने एक सैन्य संधि पर हस्ताक्षर किए। 1995 में अमरीकी नौसेना का पांचवा बेड़ा भी बहरैन स्थानांतरित हो गया और वाशिंगटन के लिए इस देश का महत्व दोगुना हो गया। यही कारण है कि अमरीकी सरकार मानवाधिकार, आज़ादी और लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने के बावजूद, फ़ार्स की खाड़ी के अन्य तानाशाही शासनों की भांति आले ख़लीफ़ा शासन का समर्थन करती है।
जैसा कि अनुमान था, बहरैन में जनक्रांति के शुरू होने के बाद, अमरीकी सरकार ने आले ख़लीफ़ा शासन का समर्थन किया, ताकि उसके सैनिक इस देश में स्थित सैन्य छावनी में आराम से रह सकें। इसके अलावा, बहरैन के विरोधियों का शिया होना कि जो ईरान की जनता के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित हैं, वाशिंगटन के भय का कारण है। आले ख़लीफ़ा और आले सऊद के सैनिकों द्वारा बहरैन की क्रांतिकारी जनता पर अत्याचारों के बावजूद, समय समय पर अमरीकी अधिकारी केवल आले ख़लीफ़ा शासन से संयम रखने और सरकार विरोधियों से वार्ता करने की अपील करते हैं। लेकिन स्पष्ट है कि अमरीकी अधिकारियों के यह बयान, आले ख़लीफ़ा शासन के समर्थन के कारण पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए होते हैं और मनाना के अधिकारी कभी भी इन बयानों को गंभीरता से नहीं लेते हैं। आले ख़लीफ़ा शासन जानता है कि अमरीकी सरकार इस देश में अपने सैन्य बेड़े को बाक़ी रखने और फ़ार्स खाड़ी के अन्य देशों में शांति बनाए रखने के लिए उसका समर्थन कर रही है।
एक अन्य देश जो वर्षों से बहरैन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है, ब्रिटेन है। 1820 से ब्रिटेन ने बहरैन में अपना साम्राज्य स्थापित किया हुआ था। 1971 में दिखावटी तौर पर बहरैन को आज़ादी मिल गई, लेकिन लंदन सरकार निरंतर मनामा के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करती रही।
इसके बाद से 1999 तक बहरैन में सुरक्षा विभाग की ज़िम्मेदारी एक अंग्रेज़ अधिकारी इयान हेंडरसन के कांधों पर थी। इस दौरान इस अंग्रेज़ अधिकारी ने बहरैनी जनता पर अत्यधिक अत्याचार किए। 2011 में बहरैनी जनता की क्रांति की शुरुआत के बाद से बहरैनी पुलिस क कमान एक अन्य अंग्रेज़ी अधिकारी जॉन आइलेट्स के हाथों में है। अमरीका की तरह ब्रिटेन भी कभी कभी आले ख़लीफ़ा शासन की आलोचना करके, व्यवहारिक रूप से बहरैन में लोकतंत्र की आवाज़ को कुचलने के लिए इस तानाशाही परिवार का समर्थन करता है।
देश के भीतर और बाहर बहरैन की क्रांति के शक्तिशाली दुश्मनों के बावजूद, बहरैन की जनता पूरे जोश और जज़्बे से मोर्चा संभाले हुए है और हालिया दिनों में उसने अपने नेता आयतुल्लाह शेख़ ईसा क़ासिम के प्रति अनुदाहरणीय समर्थन का प्रदर्शन किया है।
प्रदर्शनों में जनता की निरंतर उपस्थिति और अपने अधिकारों पर बल देना, प्रभावशाली पार्टियों और हस्तियों का परिणाम है। बहरैन की सबसे बड़ी पार्टी जमीयतुल विफ़ाक़ है, जिसके नेता शेख़ अली सलमान हैं, जो जेल में बंद हैं। 51 वर्षीय शेख़ सलमान संघर्ष करने वाले धर्मगुरू हैं, जिन्हें 1990 के दशक में बहरैनी जनता के आंदोलन के कारण, निर्वासित कर दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने ब्रिटेन में अपनी गतिविधियां जारी रखीं। बहरैनी जनता के बीच वे काफ़ी लोकप्रिय हैं। यही कारण है कि जब 2001 में स्वदेश वापसी पर उन्होंने अल-विफ़ाक़ पार्टी की स्थापना की तो लोगों ने बड़े पैमाने पर उसका स्वागत किया। 2006 के चुनाव में इस पार्टी ने कुल 40 में से 17 सीटों पर जीत हासिल की और 2010 में 18 सीटों पर जीत दर्ज की। बहरैन में आले ख़लीफ़ा शासन ने ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की है कि देश के बहुसंख्यक शिया मुसलमान 18 सीटों से अधिक पर जीत हासिल नहीं कर सकें।
अल-विफ़ाक़ आले ख़लीफ़ा शासन की मध्यमार्गी विरोधी पार्टियों में से एक मानी जाती है और उसने सरकार के साथ वार्ता भी की, जो परिणामहीन रही। इस पार्टी का उद्देश्य देश में लोकतंत्र की स्थापना है और उसका मानना है कि आले ख़लीफ़ा परिवार इस शर्त के साथ देश में रह सकता है कि वह शासन से दूर रहे। लेकिन बहरैन की अन्य पार्टियां आले ख़लीफ़ा शासन के अत्याचारों को देखते हुए उसके पतन की मांग करती हैं। जुंबिशे हक़, अल-वफ़ाउल इस्लामी और जुंबिशे अहरार बहरैन ऐसी पार्टियां हैं, जो आले ख़लीफ़ा के तानाशाही शासन की समाप्ति की मांग करती हैं, इसीलिए उन्होंने लोकतांत्रिक गठबंधन का गठन किया है।
जुंबिशे अहरार बहरैन की सबसे पुरानी पार्टी है। इसकी स्थापना 1956 में हुई थी। जनता के अधिकारों की प्राप्ति के लिए इस पार्टी ने कई क़दम उठाए हैं। इस पार्टी के महासचिव सईद शहाबी हैं। जुंबिशे हक़ पार्टी 2005 में अल-विफ़ाक़ के विभाजन के कारण वजूद में आई। यह पार्टी तानाशाही सरकार के ख़िलाफ़ कड़े व्यवहार की वकालत करती है। इस पार्टी के मुखिया हसन अल-मुशैमा हैं। वे सरकार विरोधी एक जानी मानी हस्ती हैं, जो 2010 से कई क्रांतिकारी नेताओं के साथ जेल में क़ैद हैं।
अल-वफ़ाउल इस्लामी पार्टी के महासचिव सैय्यद मुर्तज़ा सनदी हैं। यह पार्टी अपने संस्थापक अब्दुल वहाब हुसैन की गतिविधियों के कारण अधिक जानी जाती है। बहरैनी जनता हुसैन को उस्ताद कहती है और वे देश में क्रांति की शुरूआत करने वाले के रूप में मशहूर हैं। 14 फ़रवरी 2011 में वे प्रदर्शनकारियों की पहली पंक्ति में थे और उन्होंने अपने भाषणों से लोगों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। एक मीहने बाद ही आले ख़लीफ़ा शासन ने हुसैन को गिरफ़्तार कर लिया और उम्र क़ैद की सज़ा सुना दी।
आले ख़लीफ़ा शासन ने विपक्षी पार्टियों पर प्रतिबंध लगाकर उन्हें भंग कर दिया है और उनके नेताओं को जेलों में सलाख़ों के पीछे धकेल दिया है। आजकल इस शासन के निशाने पर बहरैन के सबसे वरिष्ठ शिया धर्मगुरू आयतुल्लाह शेख़ ईसा क़ासिम हैं। उनका जन्म 1938 में बहरैन के देराज़ इलाक़े में हुआ। 1964 में धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए वे इराक़ के पवित्र शहर नजफ़ गए और वहां आयतुल्लाह मोहम्मद बाक़िर सद्र जैसे महान विद्वानों से शिक्षा हासिल की। स्वदेश वापसी पर उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में भाग लिया और 1973 में बहरैन के पहले सांसद बने। उन्होंने कुछ अन्य सासंदों के साथ मिलकर बहरैन के संविधान का संकलन किया। लेकिन आले ख़लीफ़ा शासन से टकराव के कारण इस शासन ने दो साल बाद ही इस संसद को भंग कर दिया। इसके बावजूद शेख़ ईसा क़ासिम ने अपनी राजनीतिक गतिविधियां जारी रखीं और जनता विशेषकर युवाओं का मार्गदर्शन करते रहे। उन्होंने 1992 में ईरान के क़ुम नगर में अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाया यहां तक कि इजतेहाद या धर्मशास्त्र की उच्चतम डिग्री प्राप्त की और 2001 में बहरैन वापस लौट गए। बहरैन में जन क्रांति के दौरान उन्होंने जनता का उत्साह बढ़ाया और आध्यात्मिक एवं राजनीतिक मार्गदर्शन किया।
पिछले कई वर्षो से आले ख़लीफ़ा शासन ने जनता पर अपने अत्याचारों में अत्यधिक वृद्धि कर दी और अपने विरोधियों को रास्ते से हटाना शुरू कर दिया, ताकि जन क्रांति को कुचला जा सके। वर्तमान समय में बहरैन में कोई विपक्षी दल नहीं है और समस्त क्रांतिकारी नेताओं को जेलों में क़ैद कर दिया गया है। शेख़ ईसा क़ासिम बहरैन के सबसे वरिष्ठ धर्मगुरू हैं, जिन्हें आले ख़लीफ़ा शासन रास्ते से हटाना चाहता है। इस शासन ने 14 जून को शेख़ ईसा क़ासिम की नागरिकता भंग कर दी, जिसका देश के भीतर और बाहर बड़े पैमाने पर विरोध हुआ है। अब यह अत्याचारी शासन मनी लांड्रिंग जैसे निराधार आरोप लगाकर उन्हें क़ैद करना चाहता है। हालांकि आले ख़लीफ़ा शासन अपने इन कृत्यों के परिणामों से भी भयभीत है। आले ख़लीफ़ा शासन के इस आदेश के बाद से लोग शेख़ ईसा क़ासिम के घर के सामने धरने पर बैठे हैं और सुरक्षा बलों ने भी उनके घर को घेरे में ले रखा है।
बहरैन में धार्मिक नेताओं और विद्वानों पर मुक़दमा चलाए जाने का एक इतिहास रहा है, इसलिए दिखावटी अदालत में शेख़ ईसा क़ासिम पर मुक़दमा चलाया जा सकता है। इसलिए कि अन्य क्रांतिकारियों नेताओं पर भी मनगढ़त आरोप लगाकर उन्हें सज़ाएं सुनाई जा चुकी हैं। लेकिन शेख़ ईसा क़ासिम और शेख़ अली सलमान जैसे मध्यमार्गी नेताओं को जेल में डालना इस बात को साबित करता है कि आले ख़लीफ़ा शासन कोई सही बात सुनने के लिए तैयार नहीं है। जैसा कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता शेख़ ईसा क़ासिम के ख़िलाफ़ कार्यवाही को आले ख़लीफ़ा की नादानी क़रार देते हैं और उल्लेख करते हैं कि शेख़ ईसा क़ासिम वह हस्ती हैं, जिन्होंने जहां तक संभव था, बहरैन की जनता को सशस्त्र संघर्ष से रोके रखा, लेकिन बहरैनी शासकों का ध्यान इस बात पर नहीं है कि बहरैन के क्रांतिकारी जवानों के सामने से रुकावट को हटा लेने का मतलब, सरकार से मुक़ाबले के लिए हर तरह के रास्ते को खोलना है।
बहरैन के मामलों के अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि शेख़ ईसा क़ासिम के ख़िलाफ़ सरकार की कार्यवाही से लोगों के सब्र का पैमाना लबरेज़ हो जाएगा और संभव है यह क़दम उन्हें सशस्त्र संघर्ष करने पर मजबूर कर दे। उनका मानना है कि बहरैन की क्रांति अपने प्राचीन इतिहास के मद्देनज़र देर या सवेर परिणाम तक पहुंचेगी और आले ख़लीफ़ा परिवार सत्ता को जनता को सौंपने पर मजबूर हो जाएगा।