हम और पर्यावरण-6
हमने प्राणियों के जीवन और पर्यावरण की रक्षा में तालाबों की भूमिका का उल्लेख किया था।
आज भी तालाब का अर्थ, ऐसी गीली मिट्टी या पानी से भरे हुए गढ़े से है, जिसके किनारे कीचड़ से भरे हुए होते हैं, जो कीटाणुओं, बैक्टीरिया और मलेरिया जैसी बीमारियों के फैलने का केन्द्र होता है। इसी कारण अकसर तालाबों के लिए दलदल जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इसीलिए जल निकासी द्वारा तालाबों को कृषि भूमि में बदलना न केवल गांव के निवासियों और सरकारों का प्रथम उद्देश्य है, बल्कि इसे विकास का एक प्रतीक माना जाता है। यह प्रक्रिया आज भी जारी है और जीवन की विविधता की रक्षा एवं स्थिर प्रगति जैसी नई परिभाषाओं ने भी पारम्परिक दृष्टिकोण को कम ही प्रभावित किया है। हालांकि तालाबों को नष्ट करना केवल विकासशील देशों से विशेष नहीं है, बल्कि विकसित देशों में भी कृषि का विस्तार तालाबों के विनाश पर होता है। इस तरह से दोनों प्रकार के देश समान हैं। उदाहरण स्वरूप, साम्राज्यवाद के काल से आज तक अमरीका में 8 करोड़ 70 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर फैले तालाब नष्ट हो चुके हैं और जो तालाब बाक़ी हैं, उद्योगों के विस्तार के कारण वह भी विनाश की कगार पर हैं। हालांकि अमरीका में साफ़ पानी का क़ानून, तलकर्षण, पुश्ता बनाने एवं तालाबों के भरने की निगरानी करता है और उनकी व्यवस्था करने पर बल देता है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि जो अवसर हाथ से चले गए उनकी भरपायी के लिए थोड़ी देर हो चुकी है। अध्ययनों से पता चलता है कि अगर तालाबों का पुनर्निमाण भी किया जाए तो उनमें वह पहली वाली ख़ासियत नहीं रहेगी, बल्कि वह पानी का केवल एक भंडार होंगे, जिनकी भूमिका एक कृत्रिम झील की होगी। इसलिए तालाब को उसकी असली हालत पर बाक़ी रखा जाना ज़रूरी है।
एक तालाब का नष्ट होना, ग़लत प्रबंधन एवं ग़लत जीवन शैली को दर्शाता है। एक तालाब के नष्ट होने के कारण, ज़मीन के एक भाग की क्षमता बर्बाद हो जाती है। इसी कारण लोग घरबार छोड़ देते हैं, व्यवसाय समाप्त हो जाते हैं, कृषि एवं मछली पालन उद्योग नष्ट हो जाते हैं, स्थिर खाद्य पदार्थ स्रोत नष्ट हो जाते हैं, पर्यटन जैसी विभिन्न सामाजिक क्षमताएं नष्ट हो जाती हैं और विभिन्न प्रकार के रोग फैल जाते हैं।
अगर कोई तालाब सूख जाता है तो उसके इर्दगिर्द के भूमिगत पानी के स्रोत भी सूख जाते हैं और जब तालाब की प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है तो उसकी भरपायी के लिए समय एवं भारी ख़र्च की ज़रूरत होती है। चेतावनियों पर ध्यान नहीं देना और देर से क़दम उठाना, ज़मीन के बड़े भाग के विनाश का कारण बनता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तालाबों की एक महत्वपूर्ण भूमिका, धूल भरी आंधियों को रोकना है। इसलिए कि तालाब हवा में नमी को बढ़ाते हैं और धूल को उड़ने से रोकते हैं, अगर वह नष्ट हो जायेंगे तो हवा में धूल के कण अधिक हो जायेंगे। तालाबों में नमक और रेत अधिक होता है, इसलिए उनके सूख जाने से वह धूल और मिट्टी का स्रोत बन जाते हैं। वास्तव में सूखे तालाब, आंधी और तूफ़ान के लिए ज़रूरी पदार्थों की आपूर्ति करते हैं। इराक़ में अमरीकी हवाई शोध केन्द्र एनओएए के अनुसार, हालिया दिनों में ईरान में धूल भरी आँधियों में वृद्धि का कारण, पूर्वी इराक़ के रेगिस्तानों विशेष रूप से अल-जज़ीरा इलाक़े का विस्तार है। यह इलाक़ा बग़दाद के निकट दजला और फ़ुरात नदियों के बीच में स्थित है। विगत में इस इलाक़े में असंख्यक तालाब हुआ करते थे। लेकिन 1990-91 से निरंतर सूखे के कारण एवं पर्यावरण कारकों जैसे कि सीरिया द्वारा फ़ुरात के बहाव के ऊपरी भाग में पानी का बटवारा, तुर्की सरकार द्वारा विभिन्न इलाक़ों में दजला नदी पर बांधों का निर्माण, इराक़ियों द्वारा कृषि के लिए नदियों, झीलों और तालाबों के पानी का अत्यधिक प्रयोग समस्त तालाबों विशेष रूप से अल-जज़ीरा इलाक़े के तालाबों के सूखने का कारण बने हैं।
दूसरी ओर निरंतर सूखे एवं इराक़ व अमरीका के युद्ध के कारण, इस इलाक़े की वनस्पतियां और बसवाड़ियां पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं। यही कारण है कि तालाब के तल में मौजूद रेत के कण आसानी से इराक़ की मौसमी हवा में जिसे शमाल कहा जाता है, उड़ जाते हैं और पड़ोसी देशों को नुक़सान पहुंचाते हैं।
विशेषज्ञों के अध्य्यनों के अनुसार, मध्यपूर्व में धूल भरी आँधियों की समस्या उस समय एक संकट बन गई जब हूरुल अज़ीम तालाब में मानवीय हस्तक्षेप में वृद्धि हो गई। हुरूल अज़ीम ईरान व इराक़ के स्थायी तालाबों में से है कि जो मेसोपोटामिया का बाक़ी रहने वाला बहुत बड़ा तालाब है। यह तालाब ईरान-इराक़ सीमा पर स्थित है।
मेसोपोटामिया का तालाब तीन भागों में बंटा हुआ है, महत्वपूर्ण भाग केन्द्रीय हूर, हूरुल हिमार और हुरूल हुवैज़ा। इन तीन भागों में से केन्द्रीय हूर और हुरूल हिमार पूर्ण रूप से इराक़ी सीमा में स्थित है, जबकि हुरुल हुवैज़ा का दो तिहाई भाग भी इराक़ में है, केवल एक तिहाई भाग ईरान में स्थित है। हूरुल अज़ीम तालाब ख़ुज़िस्तान प्रांत के पश्चिम में और करख़े नदी के अंत तथा आज़ादगान के जंगली इलाक़े में 1 लाख 18 हज़ार हेक्टेयर में फैला हुआ है। यह तालाब पानी की सतह पर धूल और मिट्टी के कणों को दूसरे इलाक़ों में जाने से रोकता है। हूरुल अज़ीम के सूखने से ईरान और इराक़ में धूल भरी आँधियों की संख्या में वृद्धि हुई है। यही कारण है कि जो पर्यावरण विशेषज्ञ ईरानी और इराक़ी सीमा पर मेसोपोटामिया के तालाबों के सूखने को धूल भरी आँधियों के उत्पन्न होने का कारण बताते हैं। पिछले 4 दशकों में यह तालाब 90 प्रतिशत तक नष्ट हो चुके हैं और अब ख़ाक व धूल का ढेर बन चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोस्कोप द्वारा किए गए अध्ययनों पता चलता है कि हालिया दिनों में ईरान के दक्षिण एवं पश्चिम में आने वाली आँधियों में उड़ने वाली धूल के कणों में डायटम और काई पायी गई है। इसके अलावा, धूल में ओस्ट्रकोड भी पाया जाता है। इससे पता चलता है कि हालिया दिनों में आने वाली आँधियों का स्रोत तालाब हैं न कि रेगिस्तान। फ़ार्स खाड़ी पर्यावरण संस्था द्वारा ली गई सेटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि अधिकांश आँधियों का स्रोत मेसोपोटामिया का यही इलाक़ा है कि जहां कुछ ही समय पहले मध्यपूर्व का सबसे बड़ा तालाब स्थित था जो अब सूख चुका है।
यद्यपि विश्व समुदाय, मेसोपोटामिया के विनाश की त्रासदी को 1990 के दशक में सद्दाम के शासन से संबंधित मानता है, लेकिन राष्ट्र संघ की रिपोर्ट से पता चलता है कि तुर्की इसका महत्वपूर्ण कारण है, इसलिए कि उसने दजला और फ़ुरात के पानी को बंद करने के लिए सबसे अधिक बांधों का निर्माण किया है। तुर्की की विशाल परियोजनाओं में से एक अनातोलिया है।
विभिन्न विशेषज्ञों के शोधों से भी पता चलता है कि मेसोपोटामिया के तालाबों के सूखने का कारण, पिछले कुछ वर्षों में इराक़ एवं तुर्की द्वारा दजला और फ़ुरात पर बड़े बांधों का निर्माण है। इसी कारण इलाक़े में धूल भरी आँधियां चलती हैं।
इन बांधों के निर्माण के कारण, दुनिया के बेहतरीन तालाबों में से एक और किसी ज़माने में धरती के काल्पनिक स्वर्ग के रूप में प्रसिद्ध तालाब एक सूखे जंगल में परिवर्तित हो गया। राष्ट्र संघ के पर्यावरण कार्यक्रम ने भी अपनी एक रिपोर्ट में इस सच्चाई की ओर संकेत किया है और लिखा है कि नई सहस्राब्दी की शुरूआत में मेसोपोटामिया के तालाबों के सूखने की त्रासदी विश्व में पर्यावरण की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। इस रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि इन तालाबों का विनाश मानवीय हस्तक्षेप द्वारा उत्पन्न हुई ख़तरनाक त्रासदियों में से एक है, दुनिया पर हमेशा इसके प्रभाव बाक़ी रहेंगे।
मध्यपूर्व में मेसोपोटामिया के 90 प्रतिशत तालाबों के विनाश की घटने वाली घटना ख़तरनाक संकट का एक उदाहरण है, जो इलाक़े में युद्ध और झड़पों में वृद्धि का कारण बन सकती है। इसके अलावा, प्रदूषण में वृद्धि, स्थानीय समाजों के लिए चुनौती, पुरातत्त्व स्थलों का विनाश का भी कारण बन सकती है।
इसलिए आज के इंसान को इस वास्तविकता को समझना होगा कि एक तालाब की मौत केवल किताबों से उसके नाम के मिटने का कारण नहीं है, बल्कि एक तालाब की मौत एक ऐसी ट्रेजडी है, जिसे पलटाया नहीं जा सकता और जिसके परिणाम स्वरूप, हज़ारों जीव जंतु मर जाते हैं। मेसोपोटामिया की यह दास्तान हमें चेतावनी देती है कि पृथ्वी ग्रह के अधि क विनाश के प्रति जागरूक हो जायें।