बैतुल मुक़द्दस के बारे में यूनेस्को के हालिया मसौदा
पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र संघ की शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संस्था यूनेस्को में एक मसौदा पारित हुआ जिसमें ज़ायोनी शासन को अतिग्रहणकारी शासन बताया गया है।
इस मसौदे में मस्जिदुल अक़सा को मुसलमानों से संबन्धित बताया गया है। यूनेस्को में इस मसौदे के पारित होने के बाद यह आशा बंधी है कि इस वैश्विक संस्था की ओर से फ़िलिस्तीनियों का सांस्कृतिक, राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में भी समर्थन किया जाए ताकि उसके सकारात्मक परिणाम सामने आ सकें।
बैतुल मुक़द्दस और वहां पर स्थित मस्जिदुल अक़सा की स्थिति के बारे में वर्षों से मतभेद पाए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ इसे अतिग्रहित क्षेत्र मानता है। इसी आधार पर वह ज़ायोनी शासन से मांग कर चुका है कि इस्राईल, 1967 के छह दिवसीय युद्ध वाली सीमा तक पीछे हटे। इसके विपरीत ज़ायोनी शासन यह चाहता है कि बैतुल मुक़द्दस को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक यहूदी राज्य की राजधानी के रूप मान्यता दी जाए।
पिछले सप्ताह यूनेस्को ने जो मसौदा पारित किया उसमें बैतुल मुक़द्दस को “हरम शरीफ़” के नाम से संबोधित किया गया और उसमें “कोहे मअबद” का कोई उल्लेख नही है जिसका प्रयोग यहूदी इस स्थल के लिए करते हैं। इस मसौदे में ज़ायोनियों की ओर से मुसलमानों पर किये जाने वाले अत्याचारों की भी भर्त्सना की गई है। राष्ट्रसंघ के मसौदे के अनुसार फ़िलिस्तीनियों की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में बैतुल मुक़द्दस की रक्षा की जाए।
यूनेस्को का मसौदा ज़ायोनी शासन को अतिग्रहणकारी शासन के रूप में पेश करता है जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के आधार पर इस शासन को उसके दायित्वों की याद दिलाई गई है। मसौदे मस्जिदुल अक़सा के पश्चिमी क्षेत्र को, जो यहूदियों के निकट पवित्र स्थल है, समस्त ईश्वरीय धर्मावलांबियों के लिए सम्मानीय स्थल बताया गया है।
यूनेस्को के मसौदे में ज़ायोनी शासन से मांग की गई है कि वह मस्जिदुल अक़सा के नियंत्रण को सन 2000 से पहले वाली स्थिति पर छोड़ दे जिसके अन्तर्गत मस्जिदुल अक़सा के संचालन की पूरी ज़िम्मेदारी जार्डन के वक़्फ़ बोर्ड के पास थी। इसके आठवें अनुच्छेद में ज़ायोनियों द्वारा मस्जिदुल अक़सा के अनादर के साथ ही मुसलमानों को इस पवित्र स्थल तक जाने से रोकने की भी निंदा की गई है।
मसौदे के नवें अनुच्छेद में मस्जिदुल अक़सा पर अतिवादी यहूदियों के आक्रमण का ज़िम्मेदार ज़ायोनी शासन के सुरक्षाबलों को बताया गया है। यूनेस्को के मसौदे के दसवें अनुच्छेद में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि इस्राईल की ओर से फ़िलिस्तीनियों के अधिकारों का निरंतर हनन और इस शासन द्वारा अकारण फ़िलिस्तीनियों की गिरफ़्तारी निंदनीय कृत्य है।
यूनेस्को के मसौदे में अलख़लील क्षेत्र में अवैध निर्माण, नस्लभेदी दीवार के बनाए जाने और कालोनी वासियों के लिए विशेष मार्गों के निर्माण की भी भर्त्सना की गई है। इसी प्रकार से इसमें सुनियोजित ढंग से फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध हमलों और कालोनीवासियों को फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध उकसाने को भी निंदनीय काम बताया गया है।
इस अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ने अपने मसौदे में ज़ायोनी शासन की ओर से किये जाने वाले उल्लंघनों की ओर संकेत करते हुए इस शासन से मांग की है कि वह मस्जिदुल अक़सा के इर्दगिर्द पुनर्निमाण की 18 परियोजनाओं को तत्काल रोक दे।
इस्राईल द्वारा बहुत ही चतुराई के साथ यूनेस्को के प्रस्तावों को अस्वीकार करने के कारण अब यह तय पाया है कि फ़िलिस्तीन के विषय को “अवैध फ़िलिस्तीन” के शीर्षक के अन्तर्गत यूनेस्को की आगामी कार्यकारी बैठक के एजेन्डे में शामिल किया जाए। इस प्रस्ताव के हित में 24 जबकि इसके विरोध में 6 मत डाले गए।
इस प्रस्ताव के विरोध में ज़ायोनी शासन ने यूनेस्को के साथ सहयोग बंद कर दिया है। इस अवैध शासन के शिक्षामंत्री ने यूनेस्को के महासचिव को पत्र भेजकर यूनेस्को पर आरोप लगाया है कि वह हज़ारों साल से बैतुल मुक़द्दस से यहूदियों के संपर्क की अनदेखी कर रहा है। इस पत्र में यूनेस्को पर इस्लामी आतंकवाद की सहायता करने का भी आरोप लगाया गया है।
इस संदर्भ में ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री नेतनयाहू ने भी कहा है कि यूनेस्को में एक नौटंकी जारी है। आज इसी संगठन ने एक अन्य व्यर्थ निर्णय लिया है जिसमें कहा गया है कि इस्राईल के लोगों का “कूहे मअबद” और “पवित्र दीवार” से कोई संबन्ध नहीं है।
इस्राईल रेडियो के एक समीक्षक मुन्शे अमीर ने अपनी समीक्षा में यूनेस्को का आह्वान किया है कि वह इतिहास का पुनः अध्ययन करे। उन्होंने यह भी कहा है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की सभी संस्थाएं नाकारा ओर बेकार हैं। इस इस्राईली समीक्षक ने यूनेस्को जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं के अधिकारियों से मांग की है कि वे मतभेद फैलाने से बचें और राष्ट्रों के इतिहास और उनकी संस्कृति पर विशेष रूप से ध्यान दें ताकि उनकी सुरक्षा की जा सके। इस्राईली समीक्षक का यह मानना है कि यूनेस्को ने वही बात कही है जो ईरान की इस्लामी सरकार कहती रहती है।
इस मसौदे के पारित होने के साथ ही यूनेस्को के महासचिव ने एक बयान जारी करके बैतुल मुक़द्दस की समस्त सांस्कृतिक, धार्मिक एवं एतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा पर बल दिया है। “ईरीना बोको” ने अपने इस बयान में कहा है कि जैसाकि यूनेस्को की विभिन्न बैठकों और इसी प्रकार यूनेस्को की चालीसवीं बैठक के अवसर पर कहा गया है कि बैतुल मुक़द्दस, तीन धर्मों के मानने वालों से संबन्धित है मुसलमान, ईसाई और यहूदी। यही कारण है कि इस नगर को यूनेस्को में वैश्विक धरोहर के रूप में पंजीकृत किया गया है।
उन्होंने आगे कहा कि बैतुल मुक़द्दस जैसी धरोहर को टुकड़ों में नहीं बांटा जा सकता अतः हर समुदाय को चाहिए कि वह इस पवित्र नगर के इतिहास और उससे अपना संपर्क स्वयं तलाश करे। इस बयान के अनुसार यूनेस्को में बैतुल मुक़द्दस का पंजीकरण इस बात का प्रमाण है कि यह मतभेद के लिए नहीं बल्कि एक-दूसरे से वार्ता के लिए है। हम सबका दायित्व है कि हम आपस में टकराव से बचते हुए मिलजुल कर रहें। वर्तमान समय में इसकी बहुत अधिक आवश्यकता है।
इस मसौदे के संबन्ध में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कई देशों ने इसमें भाग नहीं लिया जैसे अल्बानिया, अर्जन्टीना, कैमरून, सल्वाडोर, फ़्रांस, घाना, यूनान, हाइटी, भारत, इटली, आइवरी कोस्ट, जापान, केन्या, नेपाल, पैरागुआ, ट्यूनीशिया, स्लोवानिया, दक्षिणी कोरिया, स्पेन, श्रीलंका, स्वीडन, टोगो, ट्रेनिडाड, यूगांडा, यूक्रेन, सर्बिया और तुर्कमनिस्तान।
इन देशों में कुछ देश एसे भी हैं जो अपने यहां की सांस्कृतिक और धार्मिक संभावनाओं से आर्थिक लाभ उठा रहे हैं जबकि मस्जिदुल अक़सा के बारे में ज़ायोनी शासन की कार्यवाहियों पर उन्होंने मौन धारण कर रखा है। इनमें से एक स्पेन भी है जो अपने यहां पर स्थित जामा मस्जिद में आने वाले लाखों पर्यटको से अच्छी कमाई कर रहा है।
कहा यह गया है कि यूनेस्को के इस मसौदे के बारे में अन्तिम निर्णय, अगले सप्ताह होने वाली बैठक में लिया जाएगा। लगभग 6 महीने पहले भी फ़्रांस के नेतृत्व में यूरोपीय देशों के समर्थन से एक प्रस्ताव पारित किया गया था किंतु गार्डियन के अनुसार यहूदी लाबी ने यूरोपीय देशों को अपने निर्णय से पीछे हटने के लिए तैयार कर लिया। साथ ही इस लाबी ने ज़ायोनी शासन के प्रधानमंत्री नेतनयाहू को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि वह संयुक्त राष्ट्रसंघ के नए महासचिव को अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीन आने का निमंत्रण दें।
नेतनयाहू ने एंटोनियो गुतरेज़ को राष्ट्रसंघ का नया माहसचिव बनने पर बधाई देने के बहाने उनसे टेलिफोन पर बात की और वार्ता के दौरान यूनेस्को के इस प्रस्ताव की आलोचना की जिसमें बताया गया है कि यहूदियों का बैतुल मुक़द्दस से कोई संबन्ध नहीं है।
इस्लामी गणतंत्र ईरान के विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता बहराम क़ासेमी ने नए मसौदे का उल्लेख करते हुए यूनेस्को के निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि इस मसौदे पर ज़ायोनी शासन की नकारात्मक प्रतिक्रिया, उसके अपराधों के आम होने और उसके धूर्ततापूर्ण कार्यो के जगज़ाहिर होने के कारण है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले यूनेस्को ने पूरे बैतुल मुक़द्दस को ज़ायोनी शासन की राजधानी के रूप में परिचित करवाया था किंतु उसके इस निर्णय का फ़िलिस्तीनियों ने जमकर विरोध किया। यूनेस्को के इस निर्णय को विश्व के बहुत से देशों और सभी फ़िलिस्तीनी गुटों ने अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के विपरीत बताया था। उनका कहना था कि यह निर्णय, अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के समर्थन के अर्थ में है।