शरणार्थियों के संबंध में यूरोपीय देशों द्वारा मानवाधिकार के हनन
एशिया व अफ़्रीक़ा में संकट के केंद्रों से यूरोप की ओर शरणार्थियों का रेला, दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप के लिए सबसे बड़े राजनैतिक, सुरक्षा व सामाजिक संकट में बदल चुका है।
इसी तरह यह संकट, राष्ट्रवाद की ओर यूरोपीय लोगों के झुकाव के कारण शरणार्थियों से दुश्मनी में भी बदल चुका है और इसने यूरोप में समरसता की योजनाओं के आधारों को हिला कर रख दिया है। हमेशा ही युद्ध, अतिग्रहण, हिंसा और यातनाओं के अन्य स्वरूपों के चलते इन घटनाओं में ग्रस्त लोग अपना घर-बार छोड़ कर सुरक्षित स्थानों की ओर पहुंचने की कोशिश करते रहे हैं। ये लोग इस भय से कि उन्हें हिंसा, उत्पीड़न और हत्या का शिकार बनाया जा सकता है, अपना देश और घर-बार छोड़ने पर विवश हो जाते थे और ऐसे देशों की ओर पलायन कर जाते थे जहां उन्हें इन समस्याओं से मुक्ति मिल जाए। आज के पलायनकर्ता भी इस ऐतिहासिक सिद्धांत से इतर नहीं हैं।
आज के समय में अत्यधिक औद्योगिक प्रगति के बावजूद शिष्टाचार और मानवाधिकारों के पालन में गिरावट है और कमज़ोर लोगों के अधिकारों के हनन में वृद्धि हुई है। यूरोप में शरणार्थियों की स्थिति आज कल कुछ इस प्रकार की है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के शरणार्थी उच्चायुक्त ने इसे सबसे दुखद मानव त्रासदी बताया है। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों व संस्थाओं की रिपोर्टों के अनुसार यूरोपीय देशों में मौजूद शरणार्थी मानवीय त्रासदी के मुहाने पर पहुंच चुके हैं और जहां मानवाधिकार के बारें में अत्यंत सुंदर शब्द व वाक्य प्रयोग किए जाते हैं, वहां ज़बान इन इंसानों और इनके साथ होने वाले बुरे बर्ताव का उल्लेख नहीं कर सकती।
शरणार्थी उस व्यक्ति, उन लोगों या उस समूह को कहा जाता है जो विभिन्न कारणों से किसी स्थान को छोड़ कर दूसरे स्थान पर शरण लेने को विवश होता है। इंसान के इस संसार में आने के बाद से लेकर अब तक जान की रक्षा, मनुष्य के सबसे बड़े लक्ष्यों में से एक है। पहले यह ख़तरा नरभक्षी जानवरों और फिर इंसानों की ओर से ही रहा है। इस ख़तरे से बचने के लिए इंसान गुफाओं और दुर्गम स्थानों की शरण में जाता था। फिर जब समाज गठित होने लगे और नरभक्षी पशुओं से भय का स्थान अपने ही जैसे इंसानों से डर ने ले लिया। नए नए खोजे गए देश अमरीका की ओर पहले शरणार्थियों के पलायन और अमरीका में होने वाले गृह युद्धों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। बीसवीं सदी में पहले विश्व युद्ध ने शरणार्थियों का एक बहुत बड़ा रेला उत्पन्न कर दिया जिसके चलते शरणार्थियों के समर्थन के संबंध में कई संधियां हुईं। अलबत्ता ये संधियां समग्र नहीं थीं और इनमें शरणार्थियों की नई समस्याओं का समाधान नहीं था और इनसे शरणार्थियों की बढ़ती संख्या की आशाओं को पूरा करने की अपेक्षा नहीं रखी जा सकती थी। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने वर्ष 1950 में शरणार्थियों की स्थिति स्पष्ट करने पर आधारित एक प्रस्ताव पारित किया जिसके फल स्वरूप 1951 में शरणार्थियों का कन्वेंशन अस्तित्व में आया।
युद्ध और प्राकृतिक आपदाएं पिछली शताब्दियों में सामूहिक पलायनों का मुख्य कारण रहीं है। संकटग्रस्त क्षेत्रों के पड़ोसी देश, प्रायः इन सामूहिक पलायनों की पहली मंज़िल रहे हैं। अफ़्रीक़ा, एशिया और लैटिन अमरीका में पिछली शताब्दी में इस प्रकार के पलायन बहुत अधिक देखने में आए हैं। पिछली सदी में दसियों लाख शरणार्थियों की मेज़बानी करने वाले देशों में से एक इस्लामी गणतंत्र ईरान है। ईरानियों ने तीन दशक से अधिक समय तक अफ़ग़ानिस्तान व इराक़ में युद्ध व अशांति के कारण इन देशों के दसियों लाख नागरिकों को शरण दी। इस समय भी इस्लामी गणतंत्र ईरान में अफ़ग़ानिस्तान के तीस लाख से अधिक नागरिक रह रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के शरणार्थी उच्चायुक्त ने कई बार अपनी रिपोर्टों में ईरान की सरकार व जनता द्वारा दसियों लाख अफ़ग़ान शरणार्थियों की मेज़बानी की सराहना की है।
वर्ष 2011 में अरब व पश्चिमी देशों के गठजोड़ और साथ ही तुर्की द्वारा सीरिया में संकट उत्पन्न किए जाने के कारण यह देश एक खंडहर में बदल गया और दसियों लाख सीरियाई नागरिक, इराक़, तुर्की, लेबनान और सीरिया में शरण लेने पर विवश हो गए। चूंकि सीरियाई शरणार्थियों के अधिकांश शिविरों की स्थिति अत्यंत अनुचित और उनमें लम्बे समय तक रहने की सुविधाओं व संभावनाओं का अभाव है इस लिए बहुत से शरणार्थियों ने विभिन्न मार्गों से अपने आपको यूरोप पहुंचाने की कोशिश की। उनमें से बहुत से भूमध्य सागर की उफनती लहरों में पुरानी और टूटी फूटी नौकाओं में सवार हो कर यूरोप की ओर निकल खड़े हुए। इस कोशिश में सैकड़ों महिलाएं और बच्चे अपनी जान से हाथ धो बैठे और जो लोग यूरोप के तटों तक पहुंचने में सफल भी हुए उन्हें भी अत्यंत कटु वास्तविकता का सामना करना पड़ा। संसार में मानवता प्रेम का दावा करने वालों ने यूरोप की ओर शरणार्थियों के बढ़ते रेले को देख कर सभी अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों के विपरीत अपनी सीमाओं को बंद करने का विकल्प अपनाया। इसी लिए हम देख रहे हैं कि यूरोप में शरणार्थियों का सुरक्षा बलों पुलिस और राष्ट्रवादियों की हिंसा, अपमानजनक व्यवहार और मार-पीट से स्वागत किया जा रहा है।
अप्रैल 2015 के आरंभ से लेकर अब तक शायद ही कोई दिन ऐसे गुज़रता हो जब यूरोपीय देशों में शरणार्थियों के साथ हिंसक व्यवहार की ख़बर न आती हो। संयुक्त राष्ट्र संघ के शरणार्थी उच्चायुक्त ने भी पलायनकर्ताओं और शरणार्थियों के विषय में सभी यूरोपीय देशों से मांग की कि वे वार्ता के माध्यम से संकट को समाप्त करें और सभी शरणार्थियों के संबंध में मानवाधिकारों का पालन करें। लेकिन इससे शरणार्थियों के संबंध में यूरोपीय सरकारों की नीतियों में कोई बदलाव नहीं आया है।
लोगों को बेघर और शरणार्थी होने के कारण गिरफ़्तार करना अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के अनुसार प्रतिबंधित है। इसके बावजूद यूरोपीय देशों में शरणार्थियों की बढ़ती संख्या के दृष्टिगत इन देशों ने सही नीति न अपना पाने के कारण बहुत से शरणार्थियों को गिरफ़्तार कर लिया है। इनमें से अधिकांश शरणार्थी इराक़, सीरिया व अफ़ग़ानिस्तान के नागरिक है। हंग्री की पुलिस ने सर्बिया की सीमा के निकट स्थित होरगूश क्षेत्र में सीरियाई शरणार्थियों को रोकने की कोशिश की और जब उन्होंने प्रतिरोध किया तो उनके साथ हिंसा से काम लिया गया। पुलिस ने शरणार्थियों को लाठी-डंडों से पीटने के बाद उन पर मिर्ची की गैस का स्प्रे किया जिससे शरणार्थियों का दम घुंटने लगा। इस घटना की जो वीडियो क्लिप सामने आई है उसमें एक रक्तरंजित पिता को देखा जा सकता हो जो अपने बच्चे को मज़बूती से बांहों में दबोचे हुए है।
जर्मनी के एक शरणार्थी शिविर के चित्र सामने आने के बाद इस देश के नोरडराइन वेस्टफ़ालेन राज्य के अधिकारियों की बड़ी फ़ज़ीहत हुई है। स्पेन के टीवी पर एक टीकाकार ने शरणार्थी शिविर में तैनात सुरक्षा बलों के हिंसक रवैये के चित्रों के बारे में कहा कि यह अबू ग़रेब नहीं बल्कि जर्मनी में शरणार्थियों का एक केंद्र है। दो सुरक्षाकर्मी दिखाई दे रहे हैं जिनमें से एक अपने जूते से अलजीरियाई शरणार्थी के सिर पर ठोकर मार रहा है। एक अन्य चित्र में सुरक्षाकर्मी, एक शरणार्थी को उस तकिए पर सोने पर विवश कर रहे हैं जिस पर उसने उलटी कर दी थी।
जर्मनी, स्वेडन और ऑस्ट्रिया जैसे कुछ पश्चिमी देशों ने यूरोप की ओर शरणार्थियों का रेला आने के आरंभिक दिनों में मानवताप्रेम का मुखौटा लगा कर फूलों के साथ उनका स्वागत किया लेकिन जब सीरिया में स्थिति बिगड़ने पर शरणार्थी निरंतर यूरोप पहुंचने लगे तो फिर इन सरकारों का रवैया भी बदल गया। इस समय भी अधिकांश यूरोपीय देश, इस महाद्वीप की ओर शरणार्थियों के आगमन के बारे में एक जैसे विचार रखते हैं और अगर उनमें कुछ मतभेद है भी तो वह इस बारे में है कि इस लक्ष्य को कैसे प्राप्त किया जाए?