मार्गदर्शन -12
क़ुराने मजीद के सूरए आले इमरान की 135वीं और 136वीं आयतों में तौबा के बारे में उल्लेख किया गया है कि जो लोग महा पाप करते हैं या छोटे पापों से अपने ऊपर अत्याचार करते हैं, उन्हें ईश्वर को याद करना चाहिए और अपने पापों को लिए माफ़ी मांगनी चाहिए, कौन है ईश्वर के अलावा पापों को क्षमा करने वाला, जो कुछ उन्होंने किया है, हालांकि वे जानते हैं कि यह सही नहीं है, लेकिन वे अपने गुनाहों पर आग्रह नहीं करते, उन्हें क्षमा कर दिया जाएगा और ईश्वर उन्हें स्वर्ग प्रदान करेगा, जिसमें नहरें जारी होंगी, वे सदैव उसमें र
यह अच्छा प्रतिफल ईश्वर की ओर से उन लोगों के लिए है, जो अपने ग़लत कार्यों पर शर्मिंदा हैं और तौबा करते हैं। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनई का इस संदर्भ में कहना है कि सदाचार, का अर्थ है सचेत रहना और अपने कामों की निगरानी करना। लापरवाह व्यक्ति कोई गुनाह करता है तो अपने उस गुनाह की ओर ध्यान तक नहीं देता कि उसने कोई ग़लत काम किया है, लेकिन सदाचारी व्यक्ति बिल्कुल इसके विपरीत होता है। कोई छोटा सा भी गुनाह करता है तो तुरंत सावधान हो जाता है कि उसने ग़लत काम किया है और वह उसकी भरपाई के बारे में सोचने लगता है।
जैसा कि क़ुरान में उल्लेख है, सदाचारी जब शैतान के जाल में फंस जाते हैं, तो वह ईश्वर को याद करते हैं। अगर शैतान उनके निकट से भी होकर गुज़र जाता है या शैतान की हवा भी उन्हें लगती है तो वे तुरंत सावधान हो जाते हैं कि शैतान ने उन्हें फंसा लिया है और उनसे ग़लती हो गई है।
लापरवाह इंसान तौबा से दूर होता है। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता कहते हैं, लापरवाह इंसान कभी भी तौबा के बारे में नहीं सोचता है। उसे यह भी ध्यान नहीं रहता है कि उसने कोई गुनाह किया है। वह गुनाहों में डूबा होता है, नशे और नींद में रहता है, वास्तव में उन इंसानों की तरह है जो सोते में चलते हैं। इसलिए रहस्यवादी उस चरण को जिसमें इंसान इस लापरवाही से निकलना चाहता है, यक़ज़ा अर्थात जागरुकता कहते हैं।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता लापरवाह इंसान की विशेषताएं बयान करते हुए कहते हैं कि जब प्रलय का दिन होगा, जब वास्तविकताओं से पर्दा उठ जाएगा, उस वक़्त हम देखेंगे कि हमारे कर्मों में ऐसी चीज़े होंगी कि इंसान आश्चर्य में पड़ जाएगा और ख़ुद से पूछेगा कि मैंने कब यह काम किए थे? उसे बिल्कुल याद नहीं रहेगा। यह लापरवाही में किए गए गुनाह और पाप होंगे।
वे सभी को सिफ़ारिश करते हुए हैं कहते हैं कि तौबा करने वाले बनो और इस महत्वपूर्ण कार्य की उपेक्षा न करो। तौबा पर बल देते हुए वरिष्ठ नेता कहते हैं, तौबा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि हम लापरवाही की स्थिति से बाहर आ जाते हैं। हम कभी ख़ुद अपने बारे में ग़लती कर बैठते हैं। जब हम तौबा के बारे में सोचते हैं तो जो गुनाह और ग़लतियां हमने किए हैं, सीमाओं को लांघा हैं, जो अत्याचार हमने अपने ऊपर किए हैं, जो अत्याचार हमने दूसरों पर किए हैं वह सब हमारी आंखों के सामने ज़ाहिर हो जाएगा और हमें याद आएगा कि हमने क्या क्या किया था। उस समय हम अंहकारी नहीं होंगे और लापरवाही नहीं करेंगे। तौबा का सबसे पहला लाभ यही है। अर्थात ईश्वर से वास्तविक दुआ के रूप में क्षमा मांगी जाए और अपने गुनाहों पर शर्मिंदा हुआ जाए। वे ईश्वर को तौबा स्वीकार करने वाला और कृपालु पायेंगे। ईश्वर तौबा स्वीकार करने वाला है। तौबा वास्तव में ईश्वर की ओर पलटना है और ईश्वर इसे स्वीकार करता है अगर तौबा वास्तविक है तो।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का मानना है कि हम लोगों की यह कमी है कि अपनी ग़लतियों के प्रति लापरवाही करते हैं, सुधार से लापरवाह रहते हैं और ख़ुद स्वयं के सुधार से भी लापरवाह रहते हैं। अगर यह लापरवाहियां समाप्त हो जाएं और यह निर्णय कर लें कि हमें अपने गुनाहों के लिए तौबा करनी है, तो सब कुछ सुधर जाता है। उनके निकट तौबा के मार्ग में दूसरी रुकावट अंहकार है। वे कहते हैं, अंहकारी सुधार से बहुत दूर होता है, उसे आज़ादी और सुधार का अवसर नहीं मिलता है।
इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, ईश्वर गुनहगारों को माफ़ कर देता है, सिवाए उन लोगों के जो क्षमा याचना नहीं करते हैं। हज़रत के साथियों ने पूछा, हे ईश्वरीय दूत कौन ऐसा होगा जो नहीं चाहेगा कि उसे माफ़ कर दिया जाए। पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, वह व्यक्ति जो तौबा नहीं करता है।
इसलिए तौबा माफ़ी की चाबी है। तौबा द्वारा ईश्वरीय कृपा हासिल की जा सकती है, तौबा का इतना अधिक महत्व है।
ईश्वर ने अपने बंदों के लिए तौबा और क्षमा याचना का द्वार खोल दिया है, ताकि वे उत्कृष्टता के रास्ते पर आगे बढ़ सकें और गुनाहों में फंसकर न रह जाएं। तौबा के भी कुछ नियम हैं और इसके लिए शुद्ध नियत एवं पक्का इरादा होना चाहिए। इस संदर्भ में वरिष्ठ का कहना है कि वह तौबा लाभदायक है जो वास्तविक हो और वास्तविकता प्राप्त करने के इरादे से हो। वास्तव में ईश्वर से क्षमा याचना करो और यह इरादा करो कि उस गुनाह को दोबारा नहीं करोगे।
हालांकि संभव है कि इंसान का गुनाह करने का कोई इरादा न हो, लेकिन इसके बावजूद उसके पैर लड़खड़ा जाएं और वह कोई गुनाह कर बैठे और फिर से तौबा कर ले। अगर इंसान 100 बार भी अपनी तौबा को तोड़े तो भी तौबा का दरवाज़ा खुला रहता है। वरिष्ठ नेता कहते हैं, जब आप तौबा करते हैं तो उस समय आपकी यह नियत नहीं होनी चाहिए कि अब तो तौबा कर रहे हैं, फिर जाकर वही गुनाह कर लेंगे, ऐसा नहीं होना चाहिए। वे आगे कहते हैं, एक हदीस में है, जो कोई ज़बान से तौबा करता है, लेकिन दिल में गुनाह पर कोई पछतावा नहीं है, बल्कि प्रसन्न है, तो ऐसा इंसान अपना ही मज़ाक़ उड़ा रहा होता है। यह कैसी तौबा है? यह तौबा नहीं है। तौबा का अर्थ है कि इंसान बदल जाए, सच्चे दिल से ईश्वर से दुआ करे, इंसान को वास्तविक रूप से ईश्वर से गुहार लगानी चाहिए और उससे क्षमा मांगनी चाहिए। उसे ईश्वर से कहना चाहिए, मैंने यह गुनाह किया है, हे पालनहार, मेरे ऊपर दया कर, मेरा यह गुनाह माफ़ कर दे। इस तरह से तौबा करने से निश्चित रूप से ईश्वर क्षमा कर देगा।
इस्लाम ने सिफ़ारिश की है कि बंदों को अपने ईश्वर के समक्ष अपने गुनाहों को स्वीकार करना चाहिए। यह ईश्वर की क्षमा और रहमत का कारण बनता है लेकिन यह ईश्वरीय धर्म अपने अनुयाईयों को इस बात की अनुमति नहीं देता है कि वह किसी अन्य इंसान के सामने अपने गुनाहों की स्वीकारोक्ति करे। इस्लाम धर्म में दूसरों के सामने अपने गुनाहों की स्वीकारोक्ति से मना किया गया है। इस संदर्भ में आयतुल्लाह ख़ामेनई कहते हैं, कुछ धर्मों में लोग उपासनागृहों में धर्मगुरू या पादरी के पास जाते हैं और अपने गुनाहों की स्वीकारोक्ति करते हैं, इस्लाम में ऐसा नहीं है और ऐसा करना मना है। दूसरों के सामने अपने गुनाहों से पर्दा उठाना वर्जित है। इसका कोई फ़ायदा भी नहीं है। लेकिन कुछ धर्मों में ग़लत ढंग से ऐसा समझा जाता है कि पादरी गुनाह को माफ़ कर देता है। इस्लाम में गुनाहों को माफ़ करने वाला केवल ईश्वर है। यहां तक कि पैग़म्बर भी गुनाह माफ़ नहीं कर सकते। क़ुरान के सूरए निसा की 64वीं आयत में उल्लेख है, जब यह गुनहगार अपने ऊपर अत्याचार करते थे, जब यह तुम्हारे पास आते थे और ईश्वर से क्षमा याचना करते थे, और पैग़म्बर भी उनके लिए दुआ करते थे तो उन्होंने ईश्वर को तौबा स्वीकार करने वाला और दयालु पाया। जब उन्होंने कोई गुनाह किया तो अपने ऊपर अत्याचार किया, तुम कि जो पैग़म्बर हो अगर तुम्हारे पास आएं। ईश्वर से क्षमा याचना करें, तो ईश्वर उनकी क्षमा को स्वीकार कर लेता है। अर्थात पैग़म्बर उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करते हैं। ख़ुद पैग़म्बर गुनाह को माफ़ नहीं कर सकते, गुनाह को केवल ईश्वर माफ़ कर सकता है, यह तौबा है और वास्तव में इसका बहुत महत्व है।