मार्गदर्शन-14
ईश्वर की ओर से इंसान को दी गयी बड़ी अनुकंपाओं व नेमतों में से एक बुद्धि और बुद्धि से प्राप्त समझ है।
जैसा कि बुद्धि या अक़्ल की अहमियत के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम के परनाति इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ईश्वर से प्रार्थना में कहते हैं, “जिसे तूने बुद्धि दी उसे क्या नहीं दिया और जिसे तूने बुद्धि नहीं दी उसे क्या मिला?” इस बात में शक नहीं कि अन्य प्राणियों पर इंसान को श्रेष्ठा बुद्धि की वजह से हासिल है। इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई बुद्धि की अहमियत के बारे में कहते हैं, “पूरे इतिहास में ईश्वर ने किसी भी दूत को लोगों के बीच नहीं भेजा मगर सिर्फ़ इस उद्देश्य के लिए कि वह लोगों के बीच बुद्धि को परिपूर्णतः तक पहुंचाए।” वरिष्ठ नेता एक अन्य भाषण में बल देते हैं कि सभी ईश्वरीय दूतों के कारनामे में लोगों को बुद्धि के इस्तेमाल की ओर निमंत्रण सर्वोपरि रहा है। वरिष्ठ नेता कहते हैं, “बुद्धि इसान को धर्म की ओर खींच कर लाती है। बुद्धि इंसान को ईश्वर के सामने बंदगी के लिए झुकाती है। बुद्धि है जो इंसान को मूर्खता भरे कर्मों और सांसारिक मोह-माया में डूबने से बचाती है। इसलिए सबसे पहले समाज में बुद्धि की क्षमता को मज़बूत किया जाए।”
बुद्धि या अक़्ल की अहमियत के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया, “ईश्वर ने अपने बंदों में अक़्ल से ज़्यादा अहम कोई चीज़ नहीं बांटी।” जी हां ईश्वर ने अपने बंदों के बीच रोज़ी बांटी और हर अनुकंपा उसी की ओर से है। लेकिन इन सही अनुकंपाओं या नेमतों में पैग़म्बरे इस्लाम के शब्दों में अक़्ल से ज़्यादा अहम कोई चीज़ नहीं बांटी। पैग़म्बरे इस्लाम इस कथन के अंत में फ़रमाते हैं “ईश्वर ने पूरे इतिहास में किसी भी ईश्वरीय दूत को लोगों के बीच नहीं भेजा मगर इस उद्देश्य के लिए कि वह लोगों में बुद्धि को पूरिपूर्ण करें।”
वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई इस कथन की ओर इशारा करते हुए जीवन का मार्ग तय करने में अक़्ल को बहुत अहम तत्व कहते हैं। वरिष्ठ नेता बल देते हैं, “चिंतन कीजिए। सोच-विचार के ज़रिए जीवन का मार्ग तय कीजिए। आप प्रिय जवानों को मेरी सबसे अहम अनुशंसा यही है। इंसान के लिए शर्म की बात है कि वह अक़्ल व सोच-विचार को काम में न लाए। अपनी समझ का इस्तेमाल न करे और अपनी आंखें न खोले।”
अक़्ल और संयम के बीच निकट संबंध है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम एक स्थान पर एक बुद्धिमान व्यक्ति को संयमी व्यक्ति से उपमा देते हुए बल देते हैं कि बुद्धिमत्ता या अक़्लमंदी ही इंसान के संयमी बनने की पृष्ठिभूमि है। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम इस बिन्दु का उल्लेख करते हैं कि संयम से ज्ञान फूटता है। अक़्ल और संयम के बीच सुंदर संपर्क और फिर ज्ञान की प्राप्ति के लिए मार्ग समतल होना, ऐसा विषय है जिससे पता चलता है कि इस्लाम में किस हद तक अक़्ल और ज्ञान पर ध्यान दिया गया है।
इस्लाम का अक़्ल पर बहुत अधिक ध्यान देना यह दर्शाता है कि इस्लाम की नज़र में धर्म ज्ञान व बुद्धि के ख़िलाफ नहीं है। इस संदर्भ में इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता कहते हैं, “इस्लाम में बुद्धि उन स्तंभों में शामिल है जिससे आप धार्मिक नियमों का पता लगाते हैं। आस्था का आधार बुद्धि पर है जबकि इस्लाम के माध्यमिक आदेश के निर्धारण में भी अक़्ल की मदद ली जाती है। अगर आप हदीसों की किताबों को देखे जैसे ‘काफ़ी’ नामक किताब कि जो हज़ार साल पहले लिखी गयी है, के पहले अध्याय का नाम ही ‘बुद्धि व अज्ञानता’ है। जिससे अक़्ल की अहमियत का पता चलता है।”
पवित्र क़ुरआन में मामलों में सोच-विचार व चिंतन मनन पर बहुत बल दिया गया है। पवित्र क़ुरआन में चिंतन-मनन पर इतना ज़्यादा बल दिया गया है कि मानो पवित्र क़ुरआन की अस्ल बात चिंतन-मनन करना ही है क्योंकि चिंतन-मनन से इंसान मार्दगर्शन पाता है और उच्च मानवीय व आध्यात्मिक दर्जों तक पहुंचना बुद्धिमत्ता व अक़्लमंदी पर निर्भर है। इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई इस संदर्भ में पवित्र क़ुरआन के ‘मुल्क’ नामक सूरे की दसवीं आयत की ओर इशारा करते हैं जिसमें पापी लोग प्रलय के दिन कहेंगे, “अगर हम सुनते और चिंतन-मनन करते तो नरक वासियों में न होते।” इस आयत में पापी नरक में सदैव भुगतने वाले अपने अंजाम का कारण बुद्धि या अक़्ल का इस्तेमाल न करना बयान करते हैं जो विचार योग्य बिन्दु है।
जी हां सही बुद्धि इंसान के आंतरिक मार्गदर्शक की तरह है और जलते हुए चेराग़ की तरह इंसान को सही व सीधा मार्ग दिखाती है। अक़्ल उस ख़ज़ाने की तरह है जिसे इंसान को अपने भीतर से निकालना चाहिए। आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई का मानना है कि हम इंसान इस ख़ज़ाने का इस्तेमाल नहीं करते और उस व्यक्ति के समान हैं जो ख़ज़ाने के ऊपर सो रहा है लेकिन उसे पता नहीं है और उससे फ़ायदा नहीं उठाता और भूख से मर जाता है। वरिष्ठ नेता कहते हैं, “हमारी भी स्थिति वैसी ही होगी जब हम अक़्ल का सहारा नहीं लेंगे, अक़्ल को कसौटी नहीं बनाएंगे। अक़्ल को ट्रेनिंग नहीं देंगे, अपने मन को अक़्ल के हवाले नहीं करेंगे ”
इस्लामी इतिहास में बेलगाम मन के बारे में कहा गया है कि इसे अक़्ल के ज़रिए क़ाबू में करो। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने इंसान के मन को सबसे सर्कश पशु से उपमा देते हुए कहा है कि अगर इस मन को नियंत्रित नहीं करोगे तो भटक जाओगे। उस जंगली जानवर की तरह जो नहीं जानता कि उसे कहां जाना है और मारा-मारा फिरता है। चूंकि अक़्ल का एक महत्वपूर्ण काम इंसान का ईश्वर की बंदगी की ओर मार्गदर्शन करना है, ईश्वर की ओर बुद्धि का झुकाव इंसान के मन को अच्छी तरह क़ाबू कर सकता है। वरिष्ठ नेता अक़्ल की मन को संचालित करने की भूमिका की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “यह ख़ज़ाना हमारे अधिकार में है लेकिन हम इससे फ़ायदा नहीं उठाते। फिर अज्ञानता व बुद्धि के इस्तेमाल न करने के कारण अपने लोक-परलोक में बहुत सी समस्याओं का शिकार होंगे।”
शायद कुछ लोग बुद्धिमत्ता को वीरता के ख़िलाफ़ समझते हों, लेकिन इस्लाम की नज़र में ऐसा नहीं है। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता बल देते हैं, “बुद्धिमत्ता का अर्थ डर या पीछे हटना नहीं है। बुद्धिमत्ता और वीरता एक दूसरे के साथ साथ हैं। ईश्वरीय दूत इंसानों में सबसे बुद्धिमान इंसान थे। पैग़म्बरे इस्लाम फ़रमाते हैं, ईश्वर ने किसी दूत को नहीं भेजा मगर उस समय जब उनकी बुद्धि परिपूर्ण हो गयी। इन्हीं पैग़म्बर ने सबसे ज़्यादा संघर्ष व जेहाद किया और सबसे ज़्यादा ख़तरा उठाया अर्थात दृढ़ संकल्प, भविष्य पर नज़र और एकता व समरस्ता के साथ वीरता को बुद्धिमत्ता के साथ होना चाहिए।”
अक़्ल इन सारी विशेषताओं व ख़ूबियों के बावजूद कभी कभी ग़लती कर जाती है। अक़्ल को भी मार्गदर्शक की ज़रूरत होती है जिसके ज़रिए वह इंसान को मोक्ष दिला सकती है। अब सवाल यह उठता है कि यह मार्गदर्शक कौन है जिसका बुद्धि को दामन थामना चाहिए? आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई इस सवाल के जवाब में कहते हैं, “इंसान की अक़्ल हमेशा सही रास्ते पर नहीं जाती कभी कभी ग़लती भी करेगी। अक़्ल को मार्गदर्शक की ज़रूरत है। क्या ईश्वरीय संदेश वही के सिवा कोई और चीज़ बुद्धि का मार्गदर्शन कर सकती है? तो इस तरह वही पर आस्था बहुत अहम तत्व है। ईश्वरीय संदेश वही इंसान का मार्गदर्शन करती है। चिंतन-मनन से इंसान तरक़्क़ी करता है। लेकिन बहुत से चरण में अक़्ल वही और ईश्वरीय दूतों की शिक्षाओं से मदद लेती है।”