Jan २५, २०१७ १०:४० Asia/Kolkata

हमने उल्लेख किया था कि बुद्धि इंसान के लिए ईश्वर की सबसे बड़ी अनुकंपा है और ईश्वर को पहचानने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है।

लेकिन इसी बुद्धि का अगर सही इस्तेमाल नहीं किया जाए तो यह इंसान को नष्ट कर देती है। जैसा कि आज भौतिकतावादी केवल भौतिक ज़रूरतों की पूर्ति के चक्कर में ग़लत रास्ते पर आगे बढ़ते हैं और भ्रष्टाचार फैलाते हैं। साम्राज्यवादी शक्तियां अपने भौतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कमज़ोर राष्ट्रों का शोषण करती हैं। यह शोषण और अत्याचार उसी बुद्धि के ज़रिए किए जाते हैं, जो ईश्वर के मार्ग से भटक जाती है।

समस्त ईश्वरीय दूत भी इसी लिए भेजे गए ताकि मानवीय बुद्धि को निखारे और उसे उत्कृष्ट उद्देश्य की ओर मार्गदर्शित करें। ईश्वरीय दूत इसलिए भेजे गए ताकि वह ऐसे इंसान का प्रशिक्षण करें, जो अन्याय और दूसरों के अधिकारों का हनन करने से बचे और ऐसे कार्य करे जो ईश्वर को पसंद हैं।

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैय्यद अली ख़ामेनई का मानना है कि ईश्वरीय दूत विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम (स) ईश्वर की बंदगी पर बहुत अधिक भरोसा करते थे। ईश्वरीय दूतों की इस विशेषता की ओर क़ुरान के सूरए आले इमरान की 64वीं आयत में उल्लेख है कि, कह दो कि हे किताब वालों, आओ उस बात की ओर जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है, वह यह कि हम एक ईश्वर के अलावा किसी और की इबादत न करें और किसी को उसका समकक्ष क़रार न दें और हममें से कुछ लोग दूसरे कुछ लोगों को ईश्वर न मानें। जब भी इस बात को स्वीकार करने से इनकार करें तो कहो, गवाह रहना कि हम मुसलमान हैं। यह आयत इबादत में ईश्वर के एकाधिकार की बात करती है।

इस आयत की ओर संकेत करते हुए वरिष्ठ नेता कहते हैं, क़ुरान फ़रमाता है कि किसी भी चीज़ को ईश्वर का समकक्ष नहीं मानो, अर्थात इच्छाओं, स्वार्थ, अपना एकाधिकार, अत्याचार और ग़लत परम्पराओं में से किसी को भी इबादत में ईश्वर का भागीदार न बनाएं। हम सबका स्वामी केवल ईश्वर होना चाहिए, ईश्वर के अलावा कोई भी किसी इंसान का स्वामी नहीं है, इंसानों के लिए ईश्वरीय दूतों का यही संदेश था।

वरिष्ठ नेता के अनुसार, ईश्वरीय दूत इंसानों की मुक्ति के लिए आए, ताकि इंसानों के जीवन को स्वर्ग बना दें। इस संदर्भ में वे कहते हैं, संपूर्ण संसार एक बहती हुई नदी की भांति, एक बिंदु की ओर बढ़ रहा है और एक ही दिशा में आगे बढ़ रहा है। ईश्वरीय दूतों की महत्वपूर्ण कला यह है कि इस उच्च उद्देश्य से लोगों को परिचित करवायें, उसे पहचनवायें और उन्हें मार्ग दिखाएं और उनसे कहें कि सीधा रास्ता यानी ईश्वर का रास्ता क्या है। उन्हें यह समझाएं कि बुद्धि, भावना, शक्ति, हाथ और पैर, आंखें और वह नेमतें जो प्रकृति में हैं, सबके सब इस मार्ग पर चलने में इंसान की मदद करते हैं। सर्वश्रेष्ठ इंसान भी वही इंसान है, जो इस मार्ग को यानी ईश्वर के मार्ग को और संसार के उद्देश्य को पहचाने और अपनी और प्रकृति की ऊर्जा का प्रयोग इस उद्देश्य तक पहुंचने के लिए करे।

वरिष्ठ नेता के अनुसार, ईश्वर के नेक बंदों का हर कार्य, खाना, सोना, बात करना, व्यापार, खेलकूद, पढ़ना, राजनीति और सामाजिक कार्य ईश्वर के लिए है। वे आगे कहते हैं, इस उद्देश्य की दिशा में बढ़ने के साथ ही इंसान के आसपास एक स्वर्ग वजूद में आ जाती है, जो इंसान की इच्छाओं और भावनाओं और संसार के प्राकृतिक मार्ग के समन्वय से अस्तित्व में आती है। इस आध्यात्मिक एकेश्वरवादी इस्लामी जीवन में, विरोधाभास और मतभेद नहीं है।

ईश्वरीय दूतों ने रास्ते में आने वाली बड़ी बड़ी रुकावटों के बावजूद, इंसानों की शिक्षा-दीक्षा और उनकी आत्मा के शुद्धिकरण से कभी हाथ नहीं उठाया और बहुत ही जटिल परिस्थितियों में भी इस महान ईश्वरीय ज़िम्मेदारी को अंजाम दिया। उनका उद्देश्य इंसानों में परिवर्तन लाना था। ऐसा परिवर्तन, जो एक इंसान को नैतिकता, उत्कृष्टता और ईश्वर की दिशा में आगे बढ़ाए। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता का मानना है कि ईश्वरीय दूतों की एक ज़िम्मेदारी आत्मनिर्माण करना सिखाना था। जैसा कि सूरए जुमा की दूसरी आयत में है, ईश्वर वह है जिसने अनपढ़ लोगों के बीच उन्हीं में से एक दूत बनाया, जो उसकी आयतों को उनके लिए पढ़ता था और उनका शुद्धिकरण करता था और उन्हें किताब एवं बुद्धिमत्ता का पाठ पढ़ाता था, हालांकि वे लोग इससे पहले स्पष्ट रूप से भटके हुए थे।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का मानना है कि जो इंसान अपना आत्मनिर्माण न कर सके और उसके अन्दर कोई परिवर्तन न आए तो वह दूसरों को भी नुक़सान पहुंचाता है। वह दूसरों से ईर्ष्या करने लगता है, हर चीज़ पर अपना अधिकार जमाना चाहता है, दूसरों को वंचीत रखता है और उसके अस्तित्व से दुनिया को और लोगों को नुक़सान पहुंचता है। हालांकि इंसान का जन्म अच्छाई और भलाई करने के लिए हुआ है, ताकि इस प्रकार वह उत्कृष्टता की ओर बढ़ सके। वरिष्ठ नेता के अनुसार, प्रत्येक ईश्वरीय दूत को इसलिए भेजा गया, ताकि शिक्षा और प्रशिक्षण के कर्तव्य को पूरा करे।

वरिष्ठ नेता के दृष्टिकोण के अनुसार, इंसानों को एकेश्वरवाद का पाठ पढ़ाने के लिए और उनके सही प्रशिक्षण के लिए ईश्वरीय दूतों को सरकार के गठन की ज़रूरत थी, ताकि वे समाज का निर्माण ईश्वरीय मूल्यों के आधार पर कर सकें। उन्हें पहले समाज में न्याय की स्थापना करनी थी, इसलिए कि न्याय की छत्रछाया में लोग बेहतर तरीक़े से एकेश्वरवाद की ओर आकर्षित होते हैं। वे इस संदर्भ में कहते हैं, समस्त ईश्वरीय दूत और इमाम इसलिए आए ताकि दुनिया में एकेश्वरवाद के ध्वज को फहराएं और इंसानों में एकेश्वरवाद की आत्मा को ज़िंदा करें। लेकिन न्याय की स्थापना के बिना, एकेश्वरवाद का कोई अर्थ नहीं है। इसलिए आप देखते हैं कि न्याय की स्थापना का संदेश ईश्वरीय दूतों का संदेश है। न्याय के लिए प्रयास ईश्वरीय दूतों का महत्वपूर्ण कार्य है।

आयतुल्लाह ख़ामेनई न्याय को एक सही संतुलन मानते हैं। उनके अनुसार सही व्यवहार, सही संतुलन और संतुलित होने का अर्थ न्याय है। उनका मानना है कि ईश्वरीय दूत, न्याय की स्थापना विशेष रूप से सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए ही भेजे गए थे। जैसा कि क़ुरान सूरए हदीद की 25वीं आयत में कहता है, लोगों को एक दूसरे के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

समस्त ईश्वरीय दूतों के सरकार के गठन, न्याय की स्थापना और इंसानों के मार्गदर्शन जैसे उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयासों के कारण, अनेक दुश्मन थे। वरिष्ठ नेता का भी मानना है कि ईश्वरीय संदेश पहुंचाने के कारण, ईश्वरीय दूतों के बहुत से इंसान और जिन्न दुश्मन थे। वे कहते हैं कि कुछ ईश्वीरीय दूतों के अलावा, दुश्मनों ने समस्त ईश्वरीय दूतों को उखाड़ फेंका। उन्होंने हज़रत मूसा का बहुत उत्पीड़न किया और हज़रत ईसा का भी बहुत सताया और उनपर दबाव बनाया... मूल रहस्य यह है कि ईश्वरीय दूतों ने मैदान नहीं छोड़ा और उनमें से एक की हार दूसरे के बुराई से न टकराने का कारण नहीं बनीं। अधिकांश ईश्वरीय दूतों की हत्या कर दी गई या उन्हें जला दिया गया, या उन्हें क़ैद कर दिया गया या ज़िंदा ही टुकड़े टुकड़े कर दिया गया, यह सब अत्याचार शक्तिशाली लोगों और शासकों ने उनपर किए। इसके बावजूद वे डटे रहे, जिसके कारण आज दुनिया ईश्वरीय दूतों की शिक्षाओं की छत्रछाया में है, दुनिया में आप जहां भी जाएंगे तो देखेंगे कि ईश्वरीय शिक्षाओं का बोलबाला है और समस्त नैतिक गुण और न्याय, शांति जैसे सुन्दर शब्द ईश्वरीय दूतों के प्रयासों का ही परिणाम हैं। इसका रहस्य नहीं थकने और मैदान नहीं छोड़ने में है।

अंतिम ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम की तरह कुछ ईश्वरीय दूतों ने शासन के गठन में सफलता प्राप्त की, लेकिन अन्य अपने काल की परिस्थितियों के कारण इसमें सफल नहीं हो सके। लेकिन समस्त ईश्वरीय दूतों ने अपने काल के लोगों पर और भविष्य में आने वालों पर आश्चर्यचकित कर देने वाला प्रभाव छोड़ा और उन्होंने उत्कृष्ट इसांनों के प्रशिक्षण में बुनियादी भूमिका निभाई। इस संदर्भ में वरिष्ठ नेता कहते हैं, अगर हम मानव इतिहास में घटने वाली घटनाओं में ईश्वरीय दूतों की नियुक्ति को मानव भाग्य में सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावी मानें और ऐसा है भी, तो पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ईश्वरीय दूत बनाकर भेजे जाने का महत्व मानव इतिहास की सबसे अहम और बड़ी घटना है।