मार्ग दर्शन- 18
पवित्र कुरआन ऐसा महासागर है जिसकी गहराइयों में मूल्यवान रत्नों के खज़ाने हैं। ये खज़ाने वही ज्ञान हैं जो पवित्र कुरआन की आयतों और उसके सूरों में नीहित हैं और इंसान इन्हीं खजानों को निकाल कर ज्ञान अर्जित करने की राह में कदम रखता है और पवित्र कुरआन की तिलावत इस दिशा का आरंभिक बिन्दु है।
इस्लामी गणतंत्र ईरान में और वरिष्ठ नेता की मौजूदगी में प्रतिवर्ष पवित्र कुरआन की तिलावत की एसी सभाएं आयोजित की जाती हैं जिनकी विशेषता शब्दों में नहीं बयान की जा सकती। इन सभाओं में विभिन्न देशों के कारी भाग लेते हैं पवित्र कुरआन की तिलावत का द्रष्य बड़ा ही आध्यात्मिक और मनोहर लगता जाता है।
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता पवित्र कुरआन की तिलावत को उसके ज्ञान के खज़ानों को समझने की भूमिका समझते हैं और इन खजानों को समझने के महत्व के बारे में कहते हैं” अगर वास्तविक अर्थों में हम कुरआन से लाभान्वित होना चाहते हैं तो हमें कुरआन के ज्ञानों से परिचित होना चाहिये।“
पवित्र कुरआन से लाठ उठाना उस समय संभव होगा जब व्यक्ति पवित्र कुरआन से लगाव रखे, पवित्र कुरआन के शब्दों के अर्थों को समझे और अपने तथा पवित्र कुरआन के मध्य संबंध को सुरक्षित रखे। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता की दृष्टि में पवित्र कुरआन के ज्ञानों व शिक्षाओं को समझने का पहला कदम कुरआन की अच्छी तिलावत है। वरिष्ठ नेता पवित्र कुरआन की उपमा एक सुन्दर व भव्य इमारत से देते हैं जिसमें सुन्दर हाल और कमरे आदि हों। निःसंदेह इस भव्य इमारत में एक प्रवेश द्वार होगा। वरिष्ठ नेता का मानना है कि अगर उस प्रवेश द्वार का निर्माण हम सुन्दर करें तो उस इमारत में प्रवेश के लिए लोग उत्सुक होंगे और सुन्दर तिलावत कुरआन की ऊंची व भव्य इमारत का प्रवेश द्वार है और अगर यह तिलावत अच्छी होगी तो अधिक लोग कुरआन की ओर आयेंगे और लोगों के दिलों को अपनी ओर आकर्षित करेगी। वरिष्ठ नेता का पवित्र कुरआन की तिलावत के बारे में मानना है कि कुरआन की तिलावत एक बड़ी विशेषता और एक पुण्य है किन्तु यह तिलावत ज्ञान तक पहुंचने का एक साधन है। यह कुरआन एक महासागर है। आप जितना आगे बढ़ेंगे उतना अधिक प्यासे होंगे, आपकी रूचि अधिक होगी और आपका दिल अधिक प्रकाशमयी होगा।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का मानना है कि न केवल कुरआन को सही ढंग से पढ़ना चाहिये बल्कि जैसे उसकी तिलावत हज़रत जीब्राईल की ज़बान से हो रही है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता पवित्र कुरआन की तिलावत करने वालों से सिफारिश करते हुए कहते हैं” यह बिन्दु बहुत महत्वपूर्ण है कि कुरआन की तिलावत करने वाले का इरादा यह होना चाहिये कि यह बात सामने वाले के मन में असर करे यानी आप हमारे दिल को हिला देना चाहते हैं। यह उद्देश्य न हो कि हम तिलावत करने वाले की प्रशंसा करेंगे बल्कि उद्देश्य यह होना चाहिये कि तिलावत करने वाला अपनी तिलावत से हमारे दिल को हिला देगा।“
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता एक रवायत की ओर संकेत करते हैं जिसमें आया है कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन और इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिमुस्सलाम जब कुरआन की तिलावत करते थे तो इतनी सुन्दर और प्रभावी तिलावत करते थे कि जो लोग तिलावत करने के स्थान के पास से गुजरते थे उनके ज़ानू लरज़ जाते और वे नहीं चल सकते थे। रुक जाते थे कुरआन की तिलावत सुनते थे और जब आंनदित हो जाते थे तब आगे बढ़ जाते थे।
दूसरी अच्छाइयों की भांति पवित्र कुरआन की तिलावत के लिए भी मुसीबतें हैं और कारी को चाहिये कि उनके प्रति सावधान रहे। पवित्र कुरआन की तिलावत विशुद्ध नियत के साथ होनी चाहिये। वह दूसरों को अपनी आवाज़ सुनाने के लिए नहीं होनी चाहिये। महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि पवित्र कुरआन की तिलावत का लक्ष्य संबोधकों के दिलों को प्रभावित करना और उन्हें महान ईश्वर से और अधिक समीप करना हो। वरिष्ठ नेता की नज़र में कारी द्वारा पवित्र कुरआन के अर्थों पर ध्यान न दिया जाना तिलावत की एक मुसीबत है। वह कहते हैं” समस्या यह है कि जब हमारा कारी तिलावत करता है और यह सुन्दर शैली सीख लेता है और पढ़ता है और वह यह सोचे कि उसका कार्य इन शब्दों को अच्छी शैली व आवाज़ में बयान करना है। तो यह भी एक समस्या है अगर ऐसा होता है तो हानिकारक है। हमारा कारी जब कुरआन पढ़ता है तो उसे चाहिये कि इस प्रकार कुरआन की तिलावत करे कि मानो वह संबोधक के दिल पर कुरआन को नाज़िल कर रहा है। आपको चाहिये कि कुरआन को इस तरह पढ़ें कि मानो कुरआन की आयतों के अर्थ संबोधक के दिल पर उतर रहे हैं। ध्वनी व स्वर को अर्थों के अनुसार करना और आयतों के अर्थों पर ज़ोर देने के लिए आवाज़ की सहायता लेना। इस आवाज़ की सबसे महत्वपूर्ण कला यह है कि उसकी सहायता से अर्थों व विषयों पर जोर दिया जा सके और संबोधक के दिमाग में बैठ जाये।“
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता पवित्र कुरआन से शिक्षा लेने वाली बातों और मूल्यवान शिक्षाओं के बारे में कहते हैं विभिन्न रवायते हैं जो कहती हैं कि कुरआन का एक ज़ाहिरी और दूसरा भीतरी अर्थ है। उसके रहस्य हैं, उसकी गहराई है वह उस समुद्र की भांति है जो देखने में पानी है परंतु केवल यही विदित नहीं है उसकी गहराई है उस गहराई में भी वास्तविकताएं हैं, चीज़ें हैं, निश्चित रूप से यह है, किन्तु हम इस विदित से भी लाभ उठा सकते हैं, किस शर्त के साथ? ध्यान देने और चिंतन- मनन की शर्त के साथ। हां पवित्र कुरआन में बहुत बल्कि अनगिनत शिक्षाएं मौजूद हैं और हम साधारण लोग इसके अर्थों पर ध्यान देकर इससे बहुत अधिक लाभ उठा सकते हैं। यह शिक्षाएं पवित्र कुरआन की आयतों में बहुत अधिक हैं और उनसे जीवन में पाठ लिया जा सकता है।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि तिलावत के प्रभावी होने का एक मार्ग यह है कि कारी कुरआन के शब्दों को समझे। आपका मानना है कि जब कारी आयत के अर्थों और उसके अनुवाद को समझता है और अर्थो के दृष्टिगत अपने पढ़ने के स्वर व ध्वनि को परिवर्तित करता है तो उस समय सुनने वाले का दिल भी इस आयत के अर्थ को समझने की ओर जाता है। वरिष्ठ नेता कारियों को संबोधित करते हुए बल देकर कहते हैं आप जिस आयत की तिलावत करते हैं उसके अर्थ को अच्छी तरह समझें। इसी अर्थ को जो एक अरबी भाषी समझ सकता है, इसी विदित अर्थ को सही तरह से समझो। जब यह समझ लिया जाये तो उस समय तिलावत से सुनने वाले को चिंतन- मनन का अवसर मिलता है यानी इंसान उसमें चिंतन- मनन कर सकता है।
पवित्र कुरआन की तिलावत से इंसान में उसकी आयतों, कहानियों और उदाहरणों को समझने की जिज्ञासा पैदा होती है। समूचा कुरआन शिक्षाओं व पाठों से भरा पड़ा है और वे पाठ महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए इंसान को गतिशील बनाते हैं। वरिष्ठ नेता पवित्र कुरआन की तिलावत को दो प्रकार में बांटते हैं और पहली प्रकार के बारे में कहते हैं कुरआन को समझने, चिंतन- मनन करने और लाभ उठाने के लिए पढ़ें। कुरआन पढ़ने का एक तरीक़ा यह है कि इंसान कुरआन के विदित को अंत तक पढ़े। हम यह नहीं कहते कि इस प्रकार की तिलावत का कोई लाभ व प्रभाव नहीं है परंतु वह उस तिलावत के मुकाबले में कुछ नहीं है जिसकी कुरआन की तिलावत से अपेक्षा है।“
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कुरआन की तिलावत की दूसरी शैली की सिफारिश करते हैं और उसे इस प्रकार बयान करते है” एक तिलावत यह है कि इंसान एक सुनने वाले की भांति ईश्वर की बात सुने। ईश्वर आपसे बात कर रहा है। जैसे आपको एक प्रिय और एक महान व्यक्ति का पत्र मिला हो। आप पत्र को ले लेते और उसे पढ़ते हैं। किस लिए पढ़ते हैं? इसलिए कि आप यह देखना चाहते हैं कि उसने आपके लिए क्या लिखा है। कुरआन को इस तरह पढ़ो। यह कुरआन ईश्वरीय पत्र है। इस कुरआन को उस हस्ती ने ईश्वर से लेकर आपको दिया है जिसकी ज़बान और दिल सबसे अधिक पवित्र व अमीन है। हमें उससे लाभ उठाना चाहिये। इसीलिए रवायत में है कि जब आप सूरे की तिलावत करते हैं तो आपका इरादा यह न हो कि सूरे को पढ़कर अंत तक पहुंचा दें बल्कि आपका इरादा कुरआन को समझने का हो चाहे आप सूरे के आखिर तक, सूरे के बीच तक या किसी खंड के बीच में न पहुंचे हों और उसे पूरा भी न करें परंतु आप उसमें चिंतन- मनन करें। अगर किसी को कुरआन से रुचि और प्रेम हो जाये तो वह निश्चित रूप से कुरआन को नहीं छोड़ेगा। अगर हमें कुरआन से प्रेम हो जाये तो वास्तव में हम कुरआन नहीं छोड़ेंगे।“