Jan २९, २०१७ १६:५५ Asia/Kolkata

धरती का तापमान बढ़ना एक गंभीर चुनौती है जिसने विशेषज्ञों और चिंता में डाल दिया है।

उनका मानना है कि धरती का तापमान बढ़ने का मूल कारण कार्बन डायआक्साइड में वृद्धि है। ईंधन के प्रयोग से 24 प्रतिशत कार्बन डीय आक्साइड वातावरण में फैली है जो धरती का तापमान बढ़ने का मूल कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन के प्रयोग के बाद कार्बन डायआक्साइड पैदा करने में नंबर आता है जंगलों को ख़त्म करने और वृक्षों के काटे जाने का। शोध से पता चला है कि जंगल 18 प्रतिशत कार्बन डाई आक्साइड को अपने भीतर खींच लेते हैं। यदि यह जंगल कटते जाएंगे तो कार्बन डाइ आक्साइड की यह मात्रा वातावरण में फैली ही रहेगी। संयुक्त राष्ट्र संघ के पर्यावरण कार्यक्रम की हालिया रिपोर्ट के अनुसार यदि दुनिया में जलवायु के परिवर्तन और जंगलों पर उसके कुप्रभावों का यह क्रम इसी तरह जारी रहा तो वर्ष 2100 के बाद प्रति वर्ष दुनिया की अर्थ व्यवस्था को 1 ट्रिलियन डालर का नुक़सान होगा।

जापान के वन संरक्षण विभाग के अध्ययनों से भी इसकी पुष्टि होती है। इस अध्ययन से पता चला है कि एक वर्गमीटर के बराबर पत्तियां चौबीस घंटे में 5 युनिट आक्सीजन पैदा करती हैं जिसकी क़ीमत एक डालर है। इस तरह पांच साल का एक पेड़ प्रतिदिन औसतन 140 युनिट आक्सीजन पैदा करता है और कुल मिलाकर और एक साल में उससे पैदा होने वाली आक्सीजन का मूल्य दस हज़ार डालर होता है। बीस साल का पेड़ सालाना एक लाख 20 हज़ार डालर की आक्सीजन पैदा करता है और 50 साल का मोटा वृक्ष प्रतिवर्ष साठ लाख डालर की आकसीजन पैदा करता है। यह जंगलों का एक पर्यावरण संबंधी लाभ है जिससे अधिकतर लोग और अधिकारी अनभिज्ञ हैं। इसी वजह से दुनिया के बहुत से क्षेत्रों में कोई पाइपलाइन बिछाने के लिए या कारख़ाना अथवा सड़क बनाने के लिए बड़ी सरलता से वृक्षों को काट दिया जाता है। पर्यावरणविद हमेशा इस बात पर आग्रह करते हैं कि डेढ़ सौ साल पुराने वृक्ष को यदि काट दिया गया तो दस या बीस पेड़ लगाकर उस नुक़सान की भरपाई नहीं की जा सकती।

वनस्पतियां भी कार्बन डाई आक्साइड को अपने भीतर खींचती भी हैं और फैलाती भी हैं लेकिन स्वस्थ जंगल विशेषकर गर्म क्षेत्रों में वर्षा से उगने वाले जंगल पौधशाला गैसों के उत्सर्जन से बढ़कर उन्हें अपने भीतर खींच लेते हैं। यदि वर्ष से उगने वाले जंगलों का क्षेत्रफल कम हुआ तो अरबों टन कार्बोनिक गैस वातावरण में फैल सकती है तथा धरती का तापमान और भी बढ़ सकता है लेकिन अगर वर्ष से उगने वाले जंगलों का क्षेत्रफल बढ़ा तो कुछ समय के लिए ही सही धरती का तापमान बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाएगी। हालांकि इस प्रकार के जंगलों में लगातार कमी आती जा रही है।

दूसरी ओर धरती का तापमान बढ़ने के कारण पड़ने वे सूखे से भी जंगल नष्ट हो रहे हैं। जैसे कि वर्ष 2005 और 2010 में दुनिया में भीषण सूखा पड़ा। इस सूखे की लपेट में दुनिया के अत्यधिक आर्द्र क्षेत्र भी आ गए। सूखे में दसियों लाख वृक्ष नष्ट हो गए। हालिया अनुसंधान रिपोर्टों से पता चला कि जलवायु में परिवर्तन के  अमेज़न जंगलों पर विनाशकारी प्रभाव पड़े हैं। फ्रांस प्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि अमेज़न के विशाल व  हरे भरे  क्षेत्र का तापमान वर्ष 2010 के बाद से दो डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है और वर्ष 2040 तक इस क्षेत्र की वर्षा में भी जिससे इस पूरे क्षेत्र की सिंचाई होती है कमी आ जाएगी।

अमेज़न जंगल बहुत तेज़ी से कम होते जा रहे हैं। इन जंगलों को धरती के फेफड़ों की संज्ञा दी गई है और जलवायु के संतुलन को बनाए रखने में इन जंगलों की बड़ी निर्णायक भूमिका है। अमेज़न के जंगल 75 लाख वर्गमीटर के क्षेत्रफल पर फैले हुए हैं यह दुनिया के सबसे बड़े वर्षा जंगल हैं जो एक्वेटर के नीचे स्थित हैं। यह जंगल आठ देशों ब्राज़ील, पेरू, इक्वाडोर, कोलम्बिया, वेनेज़ोएला, गिनी, सोरीनाम, बोलीविया तथा इसी प्रकार फ़्रांस में फैले हैं। अमेज़न के आर्द्र और बड़े पत्तों वाले जंगल अपनी वनस्पतियों के साथ मिलकर धरती के पर्यावरण की रक्षा में मूल भूमिका रखते हैं। दुनिया में मौजूद कुल आक्सीजन का बीस प्रतिशत भाग अमेज़न के जंगलों से पैदा होता है जबकि यह जंगल पर्यावरण में मौजूद कार्बन डाइ आक्साइड का डेढ़ अरब टन भाग सोख लेते हैं। यह जंगल वर्षा, तापमान, हवाई तथा जलवायु को संतुलित रखते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेज़न के जंगल ख़त्म हो जाएं तो धरती का बीस प्रतिशत मीठा पानी ख़त्म हो जाएगा। वर्ष 1970 से अब तक ब्राज़ील लगभग छह लाख वर्ग किलोमीटर जंगल गवां चुका है। यह स्पेन तथा पुर्तगाल के संयुक्त क्षेत्रफल से अधिक भूभाग के बराबर है। पिछले दस साल के दौरान भी सालाना लगभग 30 लाख हेक्टेयर जंगल नष्ट हुए हैं। पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि यदि यह जंगल इसी तरह नष्ट होते रहे तो दुनिया का तापमान और बढ़ेगा तथा मरुस्थलीय क्षेत्रों का दायरा बढ़ता जाएगा।

धरती का तापमान बढ़ने के कारण गर्म क्षेत्रों के जंगलों में नए वृक्षों के उगने की प्रक्रिया मद्धम पड़ गई है जिसके कारण यह जंगल आग, बीमारियों और कीटाणुओं के हमलों से लड़ने में कमज़ोर होते जा रहे हैं और इन जंगलों में वृक्ष सूखकर गिर जाते हैं। इन वृक्षों में की कार्बन डाई आक्साइड भी वातावरण में फैल जाती है। इस गैस का इस तरह वातावरण में फैलना और इसके कारण तापमान का बढ़ना सूखा, बीमारियों तथा इंसानों के पलायन जैसी समस्याएं उत्पन्न करेगा। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि तापमान बढ़ता रहा तो वनस्पतियां लगातार सूखती जाएंगी। उनके विकास के लिए अधिक ऊर्जा ख़र्च होगी तथा वह बीमारियों से लड़ने के क़ाबिल भी नहीं रहेंगी। इसका नतीजा यह होगा कि धीरे धीरे जंगल छोटे होते जाएंगे। इस समय दुनिया में साढ़े तीन करोड़ हेक्टयर जंगल नष्ट हो चुके हैं और मरुस्थलीय क्षेत्रों में लगभग 80 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है।

जलवायु परिवर्तन के अलावा भी कुछ कारक हैं जो जंगलों के नष्ट होने में भूमिका रखते हैं। लकड़ी का कारोबार, लकड़ी को ईंधन के रूप में प्रयोग करना, जंगलों को चरागाह के रूप में प्रयोग करना तथा जंगलों में खेत और बस्तियां बनाना भी जंगलों के ख़त्म होने के प्रभावी कारक है। युद्धों में भी जंगलों को नुक़सान पहुंचता है। युद्ध में एक पक्ष दूसरे को जंगलों में छिपने का अवसर न देने के उद्देश्य से जंगलों को नष्ट कर देने का क़दम उठाता है। अमरीका ने वियतनाम में जंगलों को इस उद्देश्य के तहत नष्ट करने के लिए नारंगी रंग का पदार्थ प्रयोग किया था। इस युद्ध को वर्षों का समय बीत गया है लेकिन आज तक उसका कुप्रभाव बाक़ी है।

जिन जंगली क्षेत्रों में वृक्ष नष्ट हुए हैं। वहां की मिट्टी गंभीर रूप से क्षरण का शिकार हुई है और इसके नतीजे में वर्षा के समय बाढ़ के लिए स्थिति अनुकूल हो जाती है। जंगलों के नष्ट होने का एक बुरा परिणाम यह है कि जलचक्र बाधित होता है और करोड़ों इंसानों और अन्य प्राणियों का जीवन विघ्न का शिकार हो जाता है। संयुक्त राषट्र संघ के पर्यावरण कार्याक्रम की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि दुनिया में जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया जारी रही और उसके कुप्रभाव जंगलों पर पड़ते रहे तो वर्ष 2100 तक लगभग एक अरब इंसान जिनका जीवन जंगलों से जुड़ा हुआ है गंभीर समस्या में पड़ जाएंगे। यह वह इंसान है जो अधिकतर विकासशील देशों में बसते हैं।

इंसानों तथा अन्य जीवों का जीवन जंगलों पर निर्भर होने के कारण अब सभी देश औपचारिक या अनौपचारिक रूप से जंगलों की रक्षा और पर्यावरण को नष्ट होने से बचाने के लिए प्रयास में लग गए हैं। सभी सरकारों ने जंगलों की रक्षा के लिए विभागों का गठन किया है। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भी पर्यावरण की रक्षा पर गंभीरता से काम शुरू कर दिया है। जैसे कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने धनी देशों से अनुरोध किया है कि वह प्रतिवर्ष 10 से 15 अरब डालर की रक़म संयुक्त राष्ट्र संघ के जलवायु कोष में जमा करवाएं। लेकिन साक्ष्यों से पता चलता है कि यह देश अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं कर रहे हैं। जबकि विश्व समुदाय की अपेक्षा यह है कि औद्योगिक देश प्रदूषक गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने वाले क़ानून बनाकर इस समस्या के समाधान में विकासशील देशों की मदद करें। इस लिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून के कथनानुसार धरती एसा ग्रह है जिस पर हमारी भावी पीढ़ियां जीवन व्यतीत करेंगी और हमारे पास कोई वैकल्पिक ग्रह नहीं है।