मार्गदर्शन -21
आपने महान ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत नूह की कहानी अवश्य सुनी होगी।
उन्होंने 950 साल तक लोगों को एकेश्वरवाद की उपासना का निमंत्रण दिया। उन्होंने लोगों के मार्गदर्शन और लोगों के मुर्दा दिल को जगाने के लिए अनथक प्रयास किये परंतु इतने लंबे समय के प्रयासों के बाद मात्र कुछ लोग ही ईमान लाये। पवित्र कुरआन सूरये हूद की मूल्यवान आयतों में हज़रत नूह के थोड़े से साथियों की प्रशंसा करते हुए हज़रत नूह और उनके साथियों की कहानी को विस्तार से बयान करता है। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली खामनेई इस संबंध में कहते हैं” हज़रत नूह पर ईमान लाने वाले वास्तव में चुने हुए इंसान थे। हज़रत नूह ने 950 साल तक लोगों को आमंत्रित किया। 950 वर्षों तक उनके आमंत्रण व प्रयास का परिणाम यह था कि अज्ञानी और उद्दंडी लोगों में से केवल थोड़े से लोग ही हज़रत नूह पर ईमान लाये। महान ईश्वर पवित्र कुरआन में कहता है” किन्तु थोड़े से लोगों के अलावा उस पर ईमान नहीं लाये।“
इन लोंगो के ईमान लाने, उनके महान ईश्वर की बंदगी पर डटे रहने और हज़रत नूह के अनुसरण के बाद नास्तिकों के लिए ईश्वरीय परीक्षण का समय निकट आ गया। उस प्रसिद्ध ईश्वरीय परीक्षा का नाम तूफाने नूह है। प्रकोप नाज़िल होने से पहले महान ईश्वर ने हज़रत नूह पर वहि की अर्थात अपना संदेश भेजा कि वह अपने अनुयाइयों के साथ नाव बनायें। हज़रत नूह और उनके अनुयाई नाव बनाने लगे परंतु इन लोगों ने यह कार्य न केवल समुद्र के किनारे नहीं किया बल्कि सूखी ज़मीन पर अंजाम दिया। इस आधार पर जब नास्तिक जब हज़रत नूह और उनके अनुयाइयों के पास से गुज़रते थे तो उनका मज़ाक़ उड़ाते और कहते थे कि देखो नूह और उनके चाहने वाले उस नगर के किनारे एक बड़ी नाव बनाने में व्यस्त हैं जिसमें वे रहते हैं।
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता उपहास उड़ाने के मुकाबले में हज़रत नूह के साथियों व अनुयाइयों के डटे रहने के बारे कहते हैं” नूह पर ईमान लाने वाले वे लोग थे जिन्होंने उपहासों को सहन किया, वे नहीं जानते थे कि नाव किस लिए है? उन्हें तूफान की घटना और उस पानी की सूचना नहीं थी जो आसमान से बरसने और ज़मीन से निकलने वाला था परंतु उनका ईमान इतना मज़बूत था कि उन्होंने इन उपहासों और अपने विरुद्ध समाज के शक्तिशाली आम जनमत के दबाव को सहन किया। हज़रत नूह पर ईमान लाने वाले ग़रीब भी थे। शायद उन्हें उस समय के समाज के तीसरे और चौथे दर्जे का नागरिक समझा जाता था। अब आप सोचें कि बहुत अधिक लोगों के मुकाबले में जिनके पास पैसा है, शक्ति है, संसाधन है, प्रचार है, जिनका मज़ाक उड़ाया जाता है, अपमान किया जाता है परंतु वे सहन करते हैं। इस प्रकार के सहन के लिए मज़बूत ईमान की आवश्यकता है। हज़रत नूह के आस- पास और उन पर ईमान रखने वालों के पास इस प्रकार का मज़बूत ईमान था। बाद में जब नाव बनाने का विषय सामने आया तो उनका ईमान और अधिक स्पष्ट व मज़बूत हो गया। उन लोगों ने अपने पैग़म्बर पर यह दबाव नहीं डाला कि यह कौन सा काम है जिसे आप अंजाम दे रहे हैं? क्यों सूखे में नाव बना रहे हैं क्यों मज़ाक बन गये हैं? नहीं यह सब कुछ नहीं कहा समस्त कड़ुवाहटों को सहन किया।“
मूसलाधार वर्षा होने और ज़मीन से पानी निकलने के बाद ज्ञात हो गया था कि बहुत बड़ी घटना होने वाली है। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम, उनके साथी और हर जानवर का एक- एक जोड़ा नाव में सवार हुआ और उसके बाद दुनिया पानी में डूब गयी। काफिर और नास्तिक सबके सब डूब गये किन्तु सारा मामला यही नहीं था बल्कि हज़रत नूह के थोड़े से साथियों के समक्ष परीक्षा थी।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता उन दो परीक्षाओं की ओर संकेत करते हैं जिनका महान ईश्वर ने हज़रत नूह के साथियों से लिया है। एक परीक्षा सख्ती के दिनों की है जबकि दूसरी आराम के दिनों की है। वरिष्ठ नेता कहते हैं चुने हुए मोमिन हज़रत नूह के पास रह गये। काफिरों की परीक्षा समाप्त हो गयी थी परंतु मोमिनों की परीक्षा अभी समाप्त नहीं हुई थी। एक परीक्षा यह थी कि पैग़म्बर पर ईमान के दौरान कठिनाइयों के मुकाबले में धैर्य करें और मज़ाक उड़ाने को सहन करें। यह कड़ी परीक्षा थी कड़े समय की परीक्षा थी। हज़रत नूह के अनुयाइयों ने इस परीक्षा को आसानी से दे दिया।
हज़रत नूह के अनुयाइयों की दूसरी परीक्षा आराम के दिनों की थी और उसमें उनके समस्त चाहने वाले सफल नहीं हो पाये। वरिष्ठ नेता इस घटना की व्याख्या में कहते हैं” जिन लोगों ने हज़रत नूह के साथ कठिनाइ सहन की थी वही लोग आराम में हो गये। हज़रत नूह से कहा गया” हे नूह! हमारी ओर से सलामती और उन बरकतों के साथ नाव से उतरो जो तुम पर और तुम्हारे साथ वालों पर होंगी।“
पानी के तूफान पर हज़रत नूह की नाव के चलने का समय समाप्त हो गया जो ईश्वरीय प्रकोप था। सब सुरक्षित दुनिया में नाव से उतरने वाले थे उस दुनिया में अब अहंकारी, भोग विलास और एश्वर्य करने वाले नहीं थे। उन्हें अपने इस्लामी और ईश्वरीय जीवन को शुरु करना था। कुरआन कहता है “हमने नूह से कहा कि नाव से उतरो परंतु इसके आगे आयत में कहा गया है कि कुछ दूसरे गिरोह भी हैं जो शीघ्र आयेंगे और हम आरंभ में उन्हें सुखभोग करायेंगे और अंत में हमारा कड़ा दंड उन तक पहुंच जायेगा।“
यहां पर महान ईश्वर केवल हज़रत नूह और उनके उन साथियों पर सलाम भेजता है जो ईमान पर बाक़ी रह गये। तो इससे ज्ञात होता है कि आराम और शांति के दौरान हज़रत नूह के समस्त साथी अपने उन वचनों के प्रति वचनबद्ध नहीं रहे जिसका वचन उन्होंने हज़रत नूह को दिया था।
ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आराम के समय ईश्वरीय परीक्षा में सफल होने की शर्त को इस प्रकार बयान करते हैं” यह आराम के समय की परीक्षा है। कौन लोग इस परीक्षा में सफल हो सकते हैं? ईश्वर से भय रखने वाले लोग। हज़रत अली अलैहिस्सलाम से एक रवायत है जिसमें आप फरमाते हैं” जो व्यक्ति तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय को छोड़ देता है तो आनंद और प्रसिद्धि उसे धोखे देती हैं। वह गुमराही में ग़लत कार्य अंजाम देगा। वरिष्ठ नेता आगे कहते है” हां जब ईश्वरीय भय और आत्म निरीक्षण न हो और हम अपने कार्यों के प्रति, बातों के प्रति, अपने लेन-देन और सरकारी कार्यों के प्रति, जिसकी हमने ज़िम्मेदारी ली है और जिन कार्यों का निर्वाह हमारा दायित्व है, और संक्षेप में जिन कार्यों का निर्वाह इस्लाम ने हम पर आवश्यक करार दिया है, अगर हमारा ध्यान न रहे तो हम गुमराही में पड़ जायेंगे।
वरिष्ठ नेता इस समय के दौर और ईश्वरीय परीक्षा की ओर संकेत करते हुए कहते हैं” हमने एसे संघर्षकर्ताओं को देखा है जिन्होंने सख्ती में दुश्मनों से बेहतरीन रूप में संघर्ष किया परंतु आराम के दौर में वे भ्रष्टाचार और गुमराही में पड़ गये और जो कड़ा दंड ईश्वर ने हज़रत नूह के कुछ साथियों को आराम के समय दिया था वह इस बात का सूचक है कि आराम के समय परीक्षा के दौर में उन्होंने बुरा अमल अंजाम दिया क्योंकि उनके पास तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय नहीं था। हां ईश्वरीय परीक्षा व्यापक है और इसमें समस्त वर्ग शामिल हैं। जिन लोगों की, पोज़ीशन, पदों या भाषण के कारण लोगों को उनसे अधिक अपेक्षा है अगर वे गुमराह हो जायें तो उनकी गुमराही अधिक बुरी और ख़तरनाक होंती है उन्हें चाहिये कि अपना ध्यान अधिक रखें और ईश्वरीय भय को अपने अंदर अधिक मजबूत बनायें।
पवित्र कुरआन में हज़रत युसूफ की कहानी का वर्णन है और वह भी बहुत शिक्षाप्रद है। इस कहानी की महत्वपूर्ण शिक्षा मिस्र के राजा की पत्नी की अवैध मांग के मुकाबले में हज़रत युसूफ का प्रशंसनीय तक़वा है। वरिष्ठ नेता इस बारे में कहते हैं“ हज़रत युसूफ एसी स्थिति में मिस्री राजा के घर में थे जब वे सुन्दर जवान थे और मिस्री राजा के घर में उन्हें सम्मान प्राप्त था फिर भी उन्होंने अपनी इच्छा को ठोकर मार दी इसलिए वह उस उच्च पद के योग्य हुए जिसे ईश्वर ने उन्हें दिया यानी पैग़म्बरी। ईश्वर इस चीज़ को जानता है कि इस बंदे में किस प्रकार की योग्यता मौजूद है और वह इस प्रकार के अपने इरादे का प्रयोग उसके मार्ग में करेगा। अतः ईश्वर दूसरी बड़ी और भारी ज़िम्मेदारियों को उसके हवाले करता है कि उनमें से हर एक का अपने स्थान पर बड़ा पुण्य व पारितोषिक है।“
ग़लत इच्छाओं को नियंत्रित करना इंसान के हाथ में है इस शर्त के साथ कि ईश्वरीय भय व तक़वा के कारण इरादा मजबूत हो। वरिष्ठ नेता इस संबंध में बल देकर कहते हैं यह आपके इरादे पर निर्भर है कि आप अपनी आंतरिक इच्छा के मुकाबले में संयंम से काम लें या न लें। अगर आपने संयंम से काम लिया तो एक परिणाम होगा और उसके प्रभाव होंगे और अगर संयंम से काम नहीं लिया तो परिणाम कुछ और होगा। बहरहाल जो नतीजा होगा वह आपके कार्यों का नतीजा होगा और ये आप हैं जो चयन करते हैं।
वरिष्ठ नेता हज़रत युसूफ की प्रशंसा करते हुए इस प्रकार के आदर्श को युवाओं के लिए योग्य मानते और कहते हैं” आप सोचें कि युसूफ नामका 18-19 साल का लड़का और वह भी बहुत खुबसूरत हो और इन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न महिला उनसे प्रेम करने लगती है। यहां पर दो प्रकार से अमल किया जा सकता है पहला आत्म समर्पण कर देना और व्यभिचारी बन जाना और दूसरे पाप करने से इंकार कर देना है। अचानक विकास करके उच्च स्थान प्राप्त कर लेना है। यह बहुत स्पष्ट चीजों में है जिसके प्रभाव व परिणाम को इंसान बहुत जल्द देखता है। आपने हर ग़लत इच्छा का मुकाबला किया है उसका पहला प्रभाव यह होगा कि आप बाद वाले प्रतिरोध के लिए और मज़बूत हो जायेंगे।