Feb २८, २०१७ १०:५३ Asia/Kolkata

इससे पहले बताया गया कि हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम समूद जाति के मार्गदर्शन के लिए भेजे गए थे और उन्होंने अन्य पैग़म्बरों की भांति उन लोगों को ईश्वर की अवज्ञा न करने और अपना अनुसरण करने का निमंत्रण दिया किंतु वे लोग माया मोह में ग्रस्त और ऐश्वर्य एवं आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति में लीन थे अतः उनकी बात मानने के लिए तैयार न हुए।

وَلَا تُطِيعُوا أَمْرَ الْمُسْرِفِينَ (151) الَّذِينَ يُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ وَلَا يُصْلِحُونَ (152)

और अपव्यय करने वालों का अनुसरण न करो। (26:151) कि जो धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं और सुधार का काम नहीं करते। (26:152)

इससे पहले बताया गया कि हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम समूद जाति के मार्गदर्शन के लिए भेजे गए थे और उन्होंने अन्य पैग़म्बरों की भांति उन लोगों को ईश्वर की अवज्ञा न करने और अपना अनुसरण करने का निमंत्रण दिया किंतु वे लोग माया मोह में ग्रस्त और ऐश्वर्य एवं आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति में लीन थे अतः उनकी बात मानने के लिए तैयार न हुए।

इन आयतों में हज़रत सालेह उनसे कहते हैं कि वे अपव्यय न करें और अपने कामों में सीमा से आगे न बढ़ें। उन्होंने इसी प्रकार कहा कि वे अपव्यय करने वालों के मार्ग पर भी न चलें कि जो एक प्रकार से स्वयं और दूसरों पर अत्याचार है क्योंकि अपव्यय लोगों के बीच पाप व बुराई फैलने का कारण बनता है तथा समाज के सुधार के लिए होने वाले सद्कर्मों में रुकावट डालता है।

इस्लामी संस्कृति में अपव्यय, कि जो कार्यों में सीमा को लांघना है, समाज में बुराई फैलने और उसकी तबाही का कारण बनने वाले कार्यों में तो बुरा है ही इससे भी आगे बढ़ कर यह दूसरों की आर्थिक सहायता करने जैसे अच्छे कामों में भी निंदनीय है।

इन आयतों से हमने सीखा कि धन व ऐश्वर्य से लाभ उठाना यदि बुद्धि और ईश्वरीय शिक्षाओं के परिप्रेक्ष्य में न हो तो समाज में बुराई फैलने का कारण बनता है।

अपव्यय करने वालों को महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व नहीं दिए जाने चाहिए क्योंकि उनमें समाज के संचालन की आवश्यक योग्यता नहीं होती।

अनुपयोगी अपव्ययकर्ताओं और और भोग विलासियों से समाज में सुधार की आशा नहीं रखी जानी चाहिए क्योंकि वास्तविक सुधार केवल पैग़म्बरों की उच्च शिक्षाओं की छाया में ही संभव है।

आइये अब सूरए शोअरा की आयत क्रमांक 153 और 154 की तिलावत सुनें।

قَالُوا إِنَّمَا أَنْتَ مِنَ الْمُسَحَّرِينَ (153) مَا أَنْتَ إِلَّا بَشَرٌ مِثْلُنَا فَأْتِ بِآَيَةٍ إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ (154)

उन्होंने कहा हे सालेह! निश्चित रूप से आप पर जादू-टोना कर दिया गया है। (26:153) आप तो हम जैसे एक मनुष्य के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। तो अगर आप सच्चे हैं तो (चमत्कार के रूप में) कोई निशानी ले आइये। (26:154)

हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम द्वारा समूद जाति को बुराई से दूर रहने और ईश्वर से डरने का स्नेहपूर्ण निमंत्रण दिए जाने के बदले में उस जाति के लोगों ने उन्हें एक ऐसा व्यक्ति बताया जिस पर जादू-टोना कर दिया गया हो और वह अपनी बुद्धि खो कर उलटी-सीधी बातें कर रहा हो। ऐसी बातें जिनका बुद्धि और तर्क से कोई संबंध न हो और जो उनके भोग विलास में बाधा बनती हों।

विरोधियों ने हज़रत सालेह को बुद्धिहीन बताने के बाद कहा कि यदि ये बातें आप, अपने दावे के अनुसार ईश्वर की ओर से लाए हैं और आपकी मन गढ़त नहीं हैं तो कम से कम कोई चमत्कार तो दिखाइये कि हम आपकी बातों को स्वीकार कर सकें क्योंकि आप भी हमारी ही तरह एक मनुष्य हैं और कोई कारण नहीं है कि हम आपका अनुसरण करें और अपनी इच्छाओं को छोड़ दें।

इन आयतों से हमने सीखा कि माया मोह में ग्रस्त लोगों की दृष्टि से जो भी उनके भौतिक आनंदों और सांसारिक हितों के विरुद्ध बात करे या कोई क़दम उठाए वह बुद्धिहीन है अतः वे लोग उस पर तरह-तरह के अनुचित आरोप लगाते हैं।

संसार प्रेमी सदैव उन बुरे लोगों का अनुसरण करते हैं जो किसी कारणवश आदर्श बन चुके हैं और वे अपने इस कार्य पर गर्व भी करते हैं। ऐसे लोग कभी भी सद्कर्मियों व सुधारकों का अनुसरण करने के लिए तैयार नहीं होते।

आइये अब सूरए शोअरा की आयत क्रमांक 155 और 156 की तिलावत सुनें।

قَالَ هَذِهِ نَاقَةٌ لَهَا شِرْبٌ وَلَكُمْ شِرْبُ يَوْمٍ مَعْلُومٍ (155) وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابُ يَوْمٍ عَظِيمٍ (156)

सालेह ने (चमत्कार की मांग के जवाब में) कहा, यह ऊँटनी है। (जो ईश्वर की इच्छा से पहाड़ से पैदा हुई है।) एक दिन पानी पीने की बारी इसकी है और एक निर्धारित दिन पानी लेने की बारी तुम्हारी है। (26:155) और तकलीफ़ पहुँचाने के लिए इसे हाथ न लगाना कि एक बड़े दिन का दंड तुम्हें आ लेगा। (26:156)

चूंकि ईश्वरीय पैग़म्बर अपनी पैग़म्बरी को सिद्ध करने के लिए कोई न कोई चमत्कार दिखाते हैं अतः हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के चमत्कार के रूप में भी ईश्वर के आदेश से उन्हीं पहाड़ों से एक ऊंटनी निकली जिन पर समूद जाति के धनवानों ने आलीशान महल बना रखे थे। इस ऊंटनी का पहाड़ से निकलना भी और पानी पीना भी एक चमत्कार था क्योंकि वह इतना पानी पीती थी कि एक दिन के पानी भर का भाग उससे विशेष करना पड़ता था।

हज़रत सालेह ने लोगों से कहा कि यह ऊंटनी ईश्वर के आदेश से पैदा हुई है और कोई साधारण पशु नहीं है अतः इसका सम्मान करो और इसे यातना न दो बल्कि यह जितना खाना-पीना चाहे इसे खाने दो और कोई रुकावट न डालो क्योंकि इसे किसी भी प्रकार की यातना देने का परिणाम ईश्वर के कड़े दंड के रूप में सामने आएगा।

इन आयतों से हमने सीखा कि प्रकृति के संबंध में ईश्वर के लिए कोई सीमितता नहीं है, जो ईश्वर हज़रत मूसा की लाठी को सांप में बदल सकता है वह पत्थर से ऊंट जैसा बड़ा पशु भी पैदा कर सकता है।

यदि एक पवित्र पशु के अनादर पर दंड दिया जा सकता है तो ईश्वर के प्रिय बंदों के अनादर का कैसा दंड होगा?