इस्लामी जगत- 16
हमने बताया कि वरिष्ठ शिया धर्मगुरु स्वर्गीय आयतुल्लाह बुरुजर्दी और शैख़ शलतूत का इस्लामी मतों को एक दूसरे के निकट लाने का प्रयास मुसलमानों के बीच समरसता और इस्लामी एकता के वैचारिक आधार को बनाने में प्रभावी था।
इसी दृष्टिकोण के आधार पर शैख़ शलतूत ने बहुत मशहूर व अहम फ़त्वा दिया था। इस फ़त्वे के आधार पर सुन्नी संप्रदाय के चारों मतों के अनुयायी 12 इमामों को मानने वाले शियों सहित दूसरे इस्लामी मतों के धर्मगुरुओं का इस्लामी आदेशों में अनुसरण कर सकते हैं। इसी प्रकार इस बात का उल्लेख किया कि आयतुल्लाह बुरुजर्दी भी उन महान धर्मगुरुओं में हैं जिन्होंने मुसलमानों के बीच एकता और इस्लामी मतों के बीच निकटता लाने के विषय को बहुत अहमियत दी। उनका मानना था कि धर्मशास्त्र के विषय पर न सिर्फ़ शिया मत बल्कि दूसरे इस्लामी मतों के बीच भी चर्चा हो और जिन महत्वपूर्ण धार्मिक मामलों में मतभेद है, उनके बारे में सभी इस्लामी मतों के तर्क पर ध्यान दिया जाए। अब इसके आगे की चर्चा पेश है।
उस्ताद शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी स्वर्गीय आयतुल्लाह बुरुजर्दी की सेवा के बारे में लिखते हैं, “आयतुल्लाह बुरुजर्दी का अपने दौर के कुछ धर्मगुरुओं के विपरीत जो ख़िलाफ़त और इमामत के विषय को ख़ास तरीक़े से पेश करते थे कि जिसके कारण मतभेद गहराते थे, यह मानना था कि यह एक ऐतिहासिक मामला है और हज़रत अली अलैहिस्सलाम का ख़लीफ़ाओं के संबंध में व्यवहार यह दर्शाता है कि इस्लाम के लिए इस विषय को नहीं उभारना चाहिए बल्कि उन विषयों के बारे में सोचना चाहिए जिसे दुश्मनों के मुक़ाबले में मुसलमानों में एकता हो। यहां तक कि उन्होंने धार्मिक शिक्षा केन्द्र के कुछ धर्मगुरुओं से कहा था, ख़िलाफ़त का विषय आज के दौर के मुसलमानों की ज़रूरत नहीं है कि जिसके बारे में हम आपस में झगड़ा करें। जो बात थी वह इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। आज जो चीज़ मुसलमानों के लिए फ़ायदेमंद है वह यह कि हमें यह बात पता होनी चाहिए कि धार्मिक आदेशों को किन स्रोतों से हासिल करें।” उनका यह प्रयास था कि शिया-सुन्नी मतों के बीच समझ का माहौल बनना चाहिए जिससे एक ओर इस्लामी जगत एकजुट हो और दूसरी ओर बहुसंख्यक सुन्नी संप्रदाय, शिया मत और शिया धर्मशास्त्र से परिचित हो। आयतुल्लाह बुरुजर्दी के दौर में पहली बार कई सौ साल बाद शियों के इस आध्यात्मिक गुरु और सुन्नियों के आध्यात्मिक गुरु शैख़ अब्दुल मजीद सलीम और उनकी मौत के बाद शैख़ महमूद शलतूत के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध बने और पत्राचार होने लगा।
आयतुल्लाह बुरुजर्दी के इस्लामी एकता के विचार उनकी शिक्षा के दौरान धर्मगुरुओं के एक समूह से प्रभावित थे। उनका मानना था कि इस्लाम के पांच मतों शिया, हनफ़ी, हंबली, मालेकी और शाफ़ई के बीच मतभेद मूल सिद्धांतों के बारे में नहीं है और मुसलमान वर्गों के बीच फूट ही इस्लामी सरकारों के पतन का मुख्य कारण और दूसरे देशों के मुसलमान देशों पर वर्चस्व का कारण बना है। इसी आधार पर उन्होंने 1328 हिजरी क़मरी में एक फ़तवा दिया जिसमें मुसलमानों के बीच एकता और सभी प्रकार के मतभेद व फूट से दूरी को अनिवार्य घोषित किया। आयतुल्लाह बुरुजर्दी सुन्नी मतों की किताबों और धर्मगुरुओं के विचारों के अध्ययन के बाद इस नतीजे पर पहुंचे थे कि शिया मासूम इमामों के दौर में सुन्नी मतों में प्रचलित फ़त्वों और रिवायतों की जानकारी से, हम इन इमामों के कथनों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
इस आधार पर उनका मानना था कि सुन्नी मत की किताबों का अध्ययन धर्मशास्त्र में इज्तेहाद की पृष्ठिभूमि है और वे स्वयं भी सुन्नी मतों की किताबों में दक्ष थे। सुन्नी धर्मशास्त्र से परिचय भी इस्लामी एकता के उनके विचारों का आधार बना।
शैख़ शलतूत के इस्लामी मतों में समरसता लाने के विचार को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण बिन्दु पक्षपात भी है। उनका मानना था कि ईश्वर ने फूट से मना किया है क्योंकि यह पक्षपात के कारण भी होता है। शैख़ शलतूत शास्त्रीय हल्क़ों के बीच मौजूद वैज्ञानिक मतभेद और आम लोगों के बीच प्रचलित पक्षपात में अंतर मानते थे। उनका मानना था कि वैज्ञानिक मतभेद जो सामाजिक व स्वाभाविक ज़रूरत है और इससे बचना मुमकिन नहीं है, उस मतभेद से अलग है जो धार्मिक पक्षपात व वैचारिक संकीर्णता का कारण बनता है। पक्षपात से मुसलमानों के बीच संबंध टूट जाता है और मन में दुश्मनी व द्वेष पनपता है जबकि शोधकार्य के नतीजे में होने वाले मतभेद का सम्मान होता है और विरोधी के विचार भी प्रशंसनीय होते हैं। जब शैख़ शलतूत से यह सवाल हुआ कि कुछ लोगों का यह मानना है कि अपनी उपासना व मामलों के सही होने के लिए ज़रूरी है कि मशहूर चार मतों में से किसी एक का अनुसरण होना चाहिए और इन चार मतों में शिया और ज़ैदिया मत नहीं है। क्या आप इस विचार से पूरी तरह सहमत हैं और शिया मत के अनुसरण को सही नहीं समझते? शैख़ शलतूत ने इसके जवाब में कहा, इस्लाम ने किसी एक विशेष मत का अनुसरण अनिवार्य क़रार नहीं दिया है, हर मुसलमान को यह अधिकार हासिल है कि आग़ाज़ में ख़ामोशी से किसी एक मत का सही ढंग से अनुसरण करे और जो व्यक्ति किसी विशेष मत का पालन कर रहा है, उसे छोड़ कर दूसरे मत का पालन कर सकता है, इस दृष्टि से कोई बुराई नहीं है।
शैख़ शलतूत का यह मानना है कि जाफ़री मत जो शिया इस्ना अशरी मत के नाम से मशहूर है, ऐसा मत है जिसका अनुसरण दूसरे सुन्नी मतों की तरह धार्मिक दृष्टि से सही है। शैख़ शलतूत ने 17 रबीउल अव्वल 1378 हिजरी क़मरी को पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस के अवसर पर शिया मत के अनुसरण के सही होने का फ़तवा दिया। उस समय शिया इमामी, ज़ैदी, हंबली, शाफ़ई, मालेकी और हनफ़ी मतों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इस फ़तवे की इबारत या अवतरण इस प्रकार था, “इस्लाम ने अपने किसी अनुयायी के लिए किसी विशेष मत का अनुसरण अनिवार्य क़रार नहीं दिया है, बल्कि हर मुसलमान हर उस मत का अनुसरण कर सकता है जिसके आदेश उसकी विशेष किताब में संकलित हैं और जो भी इन चार मतों हंबली, शाफ़ेई, मालेकी व हनफ़ी में से किसी एक का पालन करता है, वह दूसरे मत का पालन कर सकता है, जाफ़री मत जो बारह इमामों का मानने वाला मत कहलाता है, ऐसा मत है जिसका अनुसरण उसी तरह सही है जिस तरह में सुन्नी मत का अनुसरण सही है। इसलिए मुसलमानों के लिए इस हक़ीक़त को जानना बेहतर होगा और वे किसी विशेष मत के साथ पक्षपात से दूर रहें, क्योंकि ईश्वर का धर्म किसी विशेष मत के अधीन नहीं है और इस पर किसी एक मत का एकाधिकार नहीं है। बल्कि सभी मतों के अगुवा मुजतहिद थे, उनका इजतेहाद ईश्वर के निकट स्वीकार्य है। जो लोग मुजतहिद नहीं है और उनका कोई दृष्टिकोण नहीं है वह अपने मद्देनज़र जिस मत का चाहें पालन कर सकते हैं और इस दृष्टि से उपासना और लेन-देन से संबंधित मामलों में कोई अंतर नहीं है।”
शैख़ शलतूत धार्मिक पक्षपात के पीछे विदेशियों के षड्यंत्र पर बल देते हैं कि जिसका लक्ष्य मुसलमानों में फूट डालना है। वे कहते हैं कि साम्राज्य कभी नहीं चाहता कि मुसलमान एकजुट हों क्योंकि एक अखंड इस्लामी जगत साम्राज्य के हितों के ख़िलाफ़ डट जाएगा। साम्राज्य मुसलमानों को लूटने में अपना हित देखता है। इस बारे में शैख़ शलतूत की एक यादगार घटना का स्वर्गीय मीरज़ा ख़लील कुमरई हवाले देते हैं जिससे साम्राज्य के गहरे षड्यंत्र का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मीरज़ा ख़लील कुमरई ने कहा, “मैंने लंबे समय लगभग तीस साल पहले शियों के धर्मशास्त्र की किताब देखने की कोशिश की और इराक़ व ईरान से शियों की धर्मशास्त्र की किताबें मंगवाने की कोशिश की लेकिन अभी हाल तक कि जब मिस्र साम्राज्य के चंगुल से बाहर आया, किताबें नहीं आती थीं। लेकिन (स्वेज़) नहर ख़ुलने के बाद आपकी किताबें आयीं और मैने अध्ययन किया। मेरे लिए हक़ीक़त खुल गयी और वह फ़त्वा दिया बिना किसी बात या अधिकारी के प्रभाव में आए।” शैख़ शलतूत ने धार्मिक पक्षपात व विदेशियों के षड्यंत्र को नाकाम बनाने के लिए पवित्र क़ुद्स के सफ़र में जिसके दौरान उन्होंने फ़िलिस्तीन इस्लामी कॉन्फ़्रेंस में भाग लिया था, दूसरे धर्मगुरुओं के साथ आयतुल्लाह काशेफ़ुल ग़िता के पीछे नमाज़ पढ़ी थी।