Apr १९, २०१७ १०:३० Asia/Kolkata

2017 में हम इंसानों की तस्करी और ग़ुलामों के व्यापार को एक दूसरे रूप में देख रहे हैं।

इस विषय ने 17वीं शताब्दी में अमरीका में अश्वेतों को ग़ुलाम बनाए जाने की यादें ज़िंदा कर दी हैं। लेकिन इस बार यह ग़ुलाम अफ़्रीक़ी नहीं हैं, बल्कि यह रोहिंग्या मुस्लिम पुरुष और महिलाएं हैं, जो म्यांमार की सरकार की नस्लभेदी एवं जातिवादी नीतियों का शिकार हैं।

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रोहिंग्या अल्पसंख्यकों को म्यांमार में बहुत ही कठिन परिस्थितियों का सामना है। चरमपंथी बौद्ध हर रोज़ उन पर योजनाबद्ध हमले करते हैं। अधिकांश रोहिंग्या मुसलमानों को अपना घर बार छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के मुताबिक़, पिछले तीन वर्षों के दौरान रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचारों में तेज़ी आई है और शरणार्थी कैम्पों में कठिन परिस्थितियों के कारण एक लाख बीस हज़ार से अधिक लोग देश छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं। इसका मतलब है कि हर दस में से एक रोहिंग्या मुस्लमान को म्यांमार से फ़रार होना पड़ा है। आम तौर पर हर एक व्यक्ति को 200 से 300 डॉलर के बदले में पहले थाईलैंड और फिर मलेशिया स्थानांतरित कर दिया जाता है। थाईलैंड पहुंचने पर तस्कर उन्हें जंगलों में स्थित कैम्पों में ले जाते हैं।

भारतीय अख़बार द हिंदू ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ चरमपंथी बौद्धों के अत्याचार के कारण यह लोग अपनी जान बचाने के लिए बड़ी संख्या में शाह परीर द्वीप शहर की ओर भागते हैं ताकि वहां से दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की ओर पलायन कर सकें, वहीं यह इंसानों की तस्करी करने वाले माफ़िया के हत्थे चढ़ जाते हैं।

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पछिले कई वर्षों के दौरान, अपना घर बार छोड़कर जान बचाने के लिए फ़रार करने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के कारण, यह शहर तस्करी के एक छोटे शहर से तस्करी के एक बड़े केन्द्र में परिवर्तित हो चुका है। इस शहर की ओर विश्व समुदाय का ध्यान उस घटना के बाद गया, जब रोहिंग्या शरणार्थियों से भरी एक नाव समुद्र में पलट गई और समुद्र में डूबने वाले शरणार्थियों के शव पानी पर तैरने लगे। बांग्लादेश के अधिकारियों के मुताबिक़, करीब 32 हज़ार रोहिंग्या शरणार्थी म्यांमार की सीमा पर दक्षिणी बांग्लादेश में स्थित कैम्पों में रह रहे हैं।

द हिंदू अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि शाह परीर द्वीप शहर में पहले तस्करों की नज़र उन लोगों पर रहती थी, जो बेहतर जीवन और बेहतर काम के लिए मलेशिया, थाईलैंड और सिंगापूर जाना चाहते थे, लेकिन अब यह तस्करी एक व्यापक रूप ले चुकी है। तस्कर ग़ैर स्टैंडर्ड नावों में शरणार्थियों को बुरी तरह से ठूंस लेते हैं। यह तस्कर उन शरणार्थियों को कि जिनके परिवार का कोई सदस्य मलेशिया या किसी अन्य देश जा चुका होता है, वहां पहुंचाने के लिए प्रेरित करते हैं।

रोहिंग्या मुसलमानों का सामूहिक पलायन अब दक्षिण एशिया में एक संकट का रूप ले चुका है। थाईलैंड में मलेशिया की सीमा पर म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों की सामूहिक क़ब्रों का पता चला है, इसके अलावा तस्कर उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं और उन्हें खाने पीने से वंचित रखते हैं, यह लोग उन्हें दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों तक पहुंचाने के लिए 3 हज़ार डॉलर लेते हैं और कभी कभी उन पर दबाव डालकर अधिक राशि मांगते हैं। कभी कभी भूखे और प्यासे शरणार्थियों को समुद्र में बीच मझदार में छोड़ देते हैं, जहां वे बेसहारा अपनी जान गंवा देते हैं।

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इंसानों के तस्कर शरणार्थी परिवारों से अंधाधुंध पैसे की मांग करते हैं, ताकि उन्हें मलेशिया, थाईलैंड या बांग्लादेश पहुंचा सकें। कभी यह तस्कर समुद्र में पहुंचकर अधिक पैसे की मांग करने लगते हैं। काफ़ी पैसे न देने के कारण रोहिंग्या परिवार अपनी लड़कियों की शादी दूसरें लोगों से करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। रोहिंग्या महिलाओं का शोषण किया जाता है और उन्हें थाईलैंड में महिलाओं की तस्करी करने वालों के हाथों बेचे जाने का ख़तरा रहता है। इसीलिए वे मजबूरी में शादी के लिए तैयार हो जाती हैं।

अंम्बिया ख़ातू एक रोहिंग्या लड़की हैं, वे कहती हैं कि इंसानों की तस्करी करने वाले पहले हमें थाईलैंड ले गए, मेरे पास काफ़ी पैसे न होने के कारण, उन्होंने मुझे बेचने का प्रयास किया, एक मलेशियाई व्यक्ति ने तस्करों को हमारा क़र्ज़ अदा कर दिया, वह व्यक्ति एक बूढ़ा व्यक्ति था, इसके बावजूद मेरी मां ने उससे शादी के लिए सहमति जता दी, इसलिए कि वहां कोई और हमारी मदद के लिए नहीं था।

अगर किसी व्यक्ति की माली हालत अच्छी है और उसके पास काफ़ी धन है तो वह तस्करों के पंजे से आज़ाद कराने के लिए कई लड़कियों का चयन कर सकता है और पैसा अदा करके उन्हें ख़रीद सकता है। यह समस्त अमानवीय कृत्य मानवाधाकरों का दावा करने वाले संगठनों की ख़ामोशी के साथ हो रहे हैं। थाईलैंड के मछुआरे हर रोहिंग्या महिला के बदले 900 डॉलर अदा करते हैं और उसे महली के शिकार के व्यापार में इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा कई मछुआरों ने अपना व्यवसाय छोड़कर इंसानों की तस्करी का काम शुरू कर दिया, इसलिए कि इस काम में उन्हें अधिक लाभ मिलता है।

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शोध से पता चलता है कि थाईलैंड के कुछ अधिकारी शरणार्थी कैम्पों की देखभाल करने वाले अधिकारियों के साथ मिलकर रोहिंग्या शरणार्थियों को तस्करों के हाथों बेच देते हैं। शरणार्थियों की तस्करी में शामिल एक व्यक्ति ने एक अंग्रेज़ी अख़बार से बात करते हुए कहा है कि पिछले साल उसने कम से कम 100 शरणार्थियों को बेचा है और हर शरणार्थी के बदले में 900 डॉलर लिए हैं।

रोहिंग्या शरणार्थी आसानी से तस्करों का शिकार हो जाते हैं, इसलिए कि जो लोग उनसे वादा करते हैं कि केवल 100 डॉलर लेकर उन्हें मलेशिया पहुंचा देंगे, वही लोग अकसर शरणार्थियों को मलेशिया के बजाए थाईलैंड में ख़ुफ़िया ठिकानों में छुपा देते हैं और समय आने पर उन्हें बाज़ार में बेच देते हैं। रोहिंग्या मुसलमान जब अपनी जान बचाकर भागते हैं और तस्करों के हाथों लग जाते हैं, तो उनकी यह यात्रा महीनों तक चलती रहती है। उन्हें बहुत ही कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उनमें से कई लोग रास्ते में ही अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं और जो लोग ज़िंदा बच जाते हैं उन्हें और अधिक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की तस्करी करके उन्हें थाईलैंड के तटों तक ले जाया जाता है और उन्हें वहां जंगलों में जेलों की भांति कैम्पों में रखा जाता है। इन कैम्पों में उन्हें यातनाएं दी जाती हैं और उनके साथ मारपीट की जाती है, उन्हें उस वक़्त तक मारा जाता है, जब तक उनके परिजन तस्करों को 2 हज़ार डॉलर नहीं दे देते हैं।

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यह मौत के कैम्प और वह कश्तियां जो उन्हें लेकर जाती हैं संभवतः दक्षिण पूर्वी एशिया के सबसे भयानक स्थानों में से हैं। एक 23 वर्षीय रोहिंग्या लड़का, जो कुछ महीनों पहले तक इन कैम्पों में जीवन व्यतीत करता था, वहां के हालात को बयान करते हुए कहता है कि मुझे हर दिन सुबह शाम मारा जाता था। वे मुझे मारते थे, ताकि मेरे परिवार को पैसे देने पर मजबूर कर सकें। वे हमें इतना मारते थे कि हम कमज़ोर हो जाएं और वहां से भाग न सकें।

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संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के मुताबिक़, इन शरणार्थियों को बड़ी संख्या में कश्तियों में ठूंसकर और रस्सियों में बांधकर ले जाया जाता है। सामान्य रूप से इन शरणार्थी तस्करों को भारी रक़म अदा करते हैं। रोहिंग्या नाम से पहचाने जाने वाले म्यांमार के इन मुसलमानों के दुखों का कोई अंत नहीं है। वे अपना घर बार छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं, लेकिन उन्हें पड़ोसी देशों में भी शरण नहीं दी जा रही है। या वे थाईलैंड के हत्यारों के हाथ लग जाते हैं और इस देश के जंगलों में उनकी हत्या कर दी जाती है और उनके शवों को नष्ट कर दिया जाता है, या उन्हें नदी में या समुद्र में डूबने के लिए छोड़ दिया जाता है, या वे मलेशिया के इंसानी तस्करों के फंदे में फंस जाते हैं। वास्तव में इंसानों के तस्करों को इंसानों का एक बड़ा ख़ज़ाना हाथ आ गया है। इन तस्करों का भोजन ही रोहिंग्या मुस्लिम पुरुष, महिलाएं और बच्चे हैं।   

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