May ०६, २०१७ ११:०५ Asia/Kolkata

धार्मिक प्रजातंत्र, इस्लामी क्रांति का मूल तत्व है और इसी लिए ईरान में होने वाले चुनावों में जनता की भागीदारी की बड़ी अहमियत है।

राजनैतिक मंच पर जनता की उपस्थिति इस बात का कारण बनती है कि लोग अपने जीवन के लिए अहम मामलों पर ठोस प्रभाव डाल सकें। इस्लामी गणतंत्र ईरान के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी, इस्लामी व्यवस्था का आधार जनता की राजनैतिक भागीदारी को बताते थे क्योंकि उन्होंने जनता की इच्छा पर ही ईरान की इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था का आधार रखा था और इसी लिए वे हमेशा चुनाव में जनता की भरपूर भागीदारी पर बल देते थे। वे कहते थे कि जो जनता के मतदान में रुकावट डाले वह मुसलमान ही नहीं है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने भी अपने एक भाषण में इस बात की ओर संकेत करते हुए कि आज धार्मिक प्रजातंत्र व्यवहारिक रूप से दुनिया के सामने पेश कर दिया गया है, कहा है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान की स्थापना के समय से लेकर अब तक अनेक चुनाव आयोजित हो चुके हैं और लोग इस्लामी व्यवस्था की स्थापना और उसकी सुरक्षा में सीधे रूप से उपस्थित रहे हैं, यही धार्मिक प्रजातंत्र का संपूर्ण उदाहरण है। उनका यह भी कहना है कि चुनाव, धार्मिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था का आधार है और अब इस्लाम, मुसलमानों और इस्लामी समुदाय की बारी है कि वह संसार के सामने इस्लामी सभ्यता का नमूना पेश करे।

इस समय ईरान में आम जनता ही राजनैतिक मंच की मुख्य खिलाड़ी है और वही देश का भविष्य निर्धारित करती है। इस्लामी गणतंत्र ईरान के सभी विभागों में जनता की भरपूर उपस्थिति को भली भांति देखा जा सकता है। राष्ट्रपति के निर्वाचन से लेकर सांसदों के चुनाव तक जनता ही निर्णायक भूमिका निभाती है। ईरान की धार्मिक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सत्ता का निर्धारण सिर्फ़ और सिर्फ़ मत पेटियों से होता है और मत पेटियां जनता की बुद्धिमत्ता का प्रतिबिंबन होती हैं।

इस्लामी गणतंत्र ईरान के संविधान में चुनाव के महत्व पर बारंबार बल दिया गया है और इसके विभिन्न आयामों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। संविधान की धारा छः में बल देकर कहा गया हैः इस्लामी गणतंत्र ईरान में देश के संचालन के मामले जनमत के आधार पर और जनता के मतों से ही संचालित होने चाहिए जैसे राष्ट्रपति, सांसदों और नगर परिषद के सदस्यों का चुनाव इत्यादि। हम देखते हैं कि क्षेत्र के बहुत से देशों में चुनाव का शब्द ही अनजाना है जबकि इस्लामी गणतंत्र ईरान में देश का संचालन लोगों की राय से ही किया जाता है। चुनावों विशेष कर राष्ट्रपति चुनाव में जनता की भागीदारी की दृष्टि से ईरान की स्थिति बहुत मज़बूत है और वह एशिया में दूसरे नंबर पर है। ईरान के संसद सभापति डाक्टर अली लारीजानी कहते हैं कि अगर लोगों की राजनैतिक क्षमता को व्यवहारिक होना है तो उन्हें अपने भविष्य निर्धारण में सक्रिय रूप से भाग लेना होगा। यह मत कहिए कि हमने प्रजातंत्र को किसी दूसरे स्थान से लिया है, प्रजातंत्र तो न्याय के सिद्धांत से ही सामने आता है।

राजनैतिक मामलों के विशेषज्ञ और टीकाकार मुहम्मद अशरफ़ी इस्फ़हानी कहते हैं।

जिस देश की आयु 37 साल हो और जनता ने 37 बार विभिन्न अवसरों पर चुनाव में भाग लेकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई हो उसकी प्रजातांत्रिक स्थिति की किससे तुलना की जा सकती है? ईरान के अलावा कौन सा देश है जिसमें जनता इतने सक्रिय ढंग से मंच पर उपस्थित रही हो? किस देश में हर साल चुनाव होते हैं? राष्ट्रपति का चुनाव हो, संसद का चुनाव हो, नगर व ग्राम परिषदों का चुनाव हो या विशेष परिषद का चुनाव हो, यह बेजोड़ स्थिति सिर्फ़ ईरान में दिखाई पड़ती है। अगर आप देखते हैं कि क्षेत्र के कुछ देशों में चुनाव के संबंध में कुछ गतिविधियां होती हैं तो वह केवल दिखावा है। सच्चे अर्थ में जनता अपने अधिकार और इच्छा से कहां पर चुनाव में भाग लेती है? कभी कभी तो चुनाव का दिखावा होता है, मीडिया के माध्यम से सिर्फ़ प्रचार किया जाता है और वही बातें दिखाई जाती हैं जो वे दिखाना चाहते हैं ताकि वे यह कह सकें कि हमारे यहां भी प्रजातंत्र है, हमारे यहां भी आज़ादी है, हमारे यहां भी लोग मंच पर हैं लेकिन वास्तविक रूप में जहां जनता अपने भविष्य का निर्धारण करती है वह ईरान के अलावा कहां दिखाई देता है?

वे कहते हैं कि सऊदी अरब में व्यवहारिक रूप से चुनाव होते ही नहीं हैं, वहां केवल एक वंशानुगत सरकार है जिसके लोग केवल अपने हित को ही देखते हैं, सत्ता वंशानुगत ढंग से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित होती रहती है, एक जाता है तो दूसरा उसके स्थान पर आ जाता है। सऊदी अरब में अब तक एक भी चुनाव नहीं हुआ है। अगर कभी दिखावा भी करना चाहते हैं तो आम जनमत को वह मंच पर आने ही नहीं देते। कुल मिला कर यह कि इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था और ईरानी राष्ट्र एक अभूतपूर्व व्यवस्था और शासन है जिसका क्षेत्र में कहीं भी उदाहरण नहीं मिल सकता।

ईरान में थोपे गए युद्ध जैसी कठिन परिस्थितियों में भी चुनावों का क्रम नहीं रुका। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि लोग अपने आपको सरकार से अलग समझे या चुनाव को थका देने वाला या पराया समझें। आज लोग जानते हैं कि सरकार भी उन्हीं की है और चुनाव भी उन्हीं के हैं। इस्लामी गणतंत्र ईरान में अब तक 11 राष्ट्रपति चुनाव हो चुके हैं और हर चुनाव में जनता की भागीदारी 66 प्रतिशत से अधिक रही है। यह ऐसा आंकड़ा है जिसे प्राप्त करना बहुत से पश्चिमी व अरब देशों के लिए सपना है।अमरीका के विचारक और राजनैतिक मामलों के वरिष्ठ टीकाकार नोआम चाम्स्की कहते हैं।

इस साल चुनाव में जनता की भागीदारी पिछले बीस साल में सबसे कम रही है। मताधिकार प्राप्त बहुत सारे लोगों ने मतदान में भाग नहीं लिया और निर्वाचित राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प, मताधिकार प्राप्त कुल लोगों में से एक चौथाई से कुछ अधिक मत से विजयी हुए।

इस संबंध में ईरान के राजनैतिक मामलों के विशेषज्ञ ख़ाजा पूर अपने विचार प्रकट करते हुए कहते हैं।

संसार के एक तिहाई से अधिक देशों में जनता की भागीदारी की कोई संभावना नहीं है। यह आंकड़े इस समय के हैं अर्थात जिस साल और शताब्दी में हम हैं उसमें आज संसार की ऐसी स्थिति है। आपका आश्चर्य यह जान कर बढ़ जाएगा कि बहुत से देशों में जो अपने आपको प्रजातंत्र का दावेदार समझते हैं, चुनाव में जनता का भाग लेना और मतदान करना अनिवार्य है। शायद आप कल्पना नहीं कर रहे होंगे कि बेल्जियम, आस्ट्रिया या आस्ट्रेलिया जैसे देशों में अगर कोई मतदान न करे तो वह अपने कुछ नागरिक अधिकारों से वंचित हो जाता है। बेल्जियम में तो मतदान न करने वाले को राजनैतिक व सामाजिक मूल्य चुकाने की सज़ा दी जाती है।