ईरान का आगामी राष्ट्रपति चुनाव-2
इस समय ईरान में चुनावी गहमा गहमी निरंतर बढ़ती जा रही है और मतदान के लिए समय निकट आता जा रहा है और देश में बारहवें राष्ट्रपति चुनाव के लिए 19 मई को मतदान होगा।
विभिन्न विचारों के राजनैतिक गुट व धड़े चुनाव में भाग ले रहे हैं। मूल रूप से चुनाव में सम्मिलिति के दो अहम आधार होते हैं, पहला आधार लोगों की भागीदारी है जो हर चुनाव को वैधता प्रदान करती है और उसे देश के राजनैतिक भविष्य में एक प्रभावी प्रक्रिया में बदल देती है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई कहते हैं। मैंने कई बार कहा है कि चुनाव में जनता की भागीदारी, बेहतर उम्मीदवार के चयन से भी अधिक अहम है और यह सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है।
चुनाव का दूसरा आधार, उन प्रत्याशियों की उपस्थिति है जो देश की व्यवस्था में एक ज़िम्मेदारी स्वीकार करने के लिए तैयार होते हैं और अपने आपको मतदाताओं के समक्ष पेश करते हैं जो एक तरह से चुनाव में ज़िम्मेदारी भरी सम्मिलिति के समान है। वस्तुतः इन दोनों आधारों के बीच का रिश्ता प्रजातांत्रिक चुनाव का बुनियादी ढांचा तैयार करता है। ईरान की इस्लामी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के जीवन के 38 साल का अनुभव और चुनावों में जनता की भारी उपस्थिति इस बात की पुष्टि करती है कि जनता ने जितनी अधिक संख्या में चुनाव में भाग लिया उसका उतना ही प्रभाव इस्लामी व्यवस्था की साख पर पड़ा और ईरानी राष्ट्र अधिक मज़बूत होता गया।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं। जितने अधिक लोग चुनाव में भाग लेंगे, व्यवस्था की सुदृढ़ता और देश की साख उतनी ही मज़बूत होती जाएगी, क्योंकि यह व्यवस्था, जन व्यवस्था है और सच्चाई यही है कि यह लोगों की भावनाओं, लोगों की इच्छा, चुनाव और जनता के संकल्प पर निर्भर है।
प्रजातांत्रिक व्यवस्था में मूल रूप से चुनाव जनता की भागीदारी के सिद्धांत पर आधारित होता है लेकिन अलग अलग व्यवस्थाओं में लोगों की भागीदारी का स्तर एक समान नहीं होता बल्कि विभिन्न मार्गों से इसे व्यवहारिक बनाया जा सकता है। इस्लामी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में, लोगों की उपस्थिति, राजनैतिक विकास का एक पहलू होने के साथ ही सामाजिक आयाम भी रखती है और एक तरह से धार्मिक एकता व समरसता का प्रतीक है। इस विशेषता ने धार्मिक प्रजातंत्र को गहराई व गतिशीलता प्रदान करने में गहरे प्रभाव डाले हैं और इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के जारी रहने से इसे अधिक शक्ति प्राप्त हुई है।
वास्तव में एक स्वस्थ व प्रभावी चुनाव के आयोजन के अहम आधारों में से एक, लोगों की उपस्थिति और भागीदारी है और इसके बिना किसी चुनाव से प्रजातांत्रिक सिद्धांतों के आधार पर परिणाम की आशा नहीं रखी जा सकती। जब चुनाव में लोगों की भागीदारी कम और अनमने पन से हो तो उसका नतीजा भी समाज की इच्छा के अनुरूप नहीं होगा।
ईरान में राजनैतिक मामलों की विशेषज्ञ डाक्टर मतीन अंजुम कहती हैं। राजनैतिक भागीदारी, प्रजातांत्रिक सिद्धांतों का एक अहम मानक है। प्रजातंत्र के कई मानक हैं जैसे विभागों का बंटवारा, लोगों की भागीदारी, प्रतिस्पर्धा, अभिव्यक्ति की आज़ादी और चुनाव में भाग लेने की स्वतंत्रता इत्यादि लेकिन अगर हम प्रजातंत्र के मानकों का निचोड़ बयान करना चाहें तो वह लोगों की भागीदारी और प्रतिस्पर्धा के रूप में ही सामने आएंगे। यही कारण है कि राजनैतिक प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है और अगर हम इसकी परिभाषा करना चाहें तो इसे दो भागों में बांटा जा सकता है। पहला हिस्सा, भागीदारी की गुणवत्ता और स्तर है और दूसरा भाग, संख्या और प्रतिशत है। विभिन्न समाजों में राजनैतिक ढांचों के अनुसार, लोगों की भागीदारी की गुणवत्ता और संख्या में अंतर होता है।
ईरान में चुनावों के आयोजन का इतिहास लगभग 110 साल पुराना है। इतिहास इस संबंध में कहता है कि अगस्त 1906 में पहली बार ईरान में संसद का गठन हुआ लेकिन अतीत पर नज़र डालने से पता चलता है कि सही अर्थ में चुनाव और जनता की भागीदारी नहीं थी। जब ईरान में संवैधानिक क्रांति के बाद पहली बार संसदीय चुनाव आयोजित हुए तो समाज के सिर्फ़ कुछ ख़ास वर्गों को ही यह अधिकार प्राप्त था कि संसद में उनका प्रतिनिधि हो। उस समय ईरान के राजनैतिक हालात ऐसे नहीं थे कि लोगों के लिए चुनाव को एक नागरिक अधिकार और वास्तविक राजनैतिक भागीदारी समझा जाए। उस समय ईरान में चुनाव वास्तव में साम्राज्य का ही एक भाग था जो ईरानी समाज के लिए एक दिखावे में बदल चुका था।
मुज़फ़्फ़रुद्दीन शाह क़ाजार के शासनकाल के क़ानूनों के अनुसार महिलाओं को चुनाव में मत देने का अधिकार नहीं था। मतदाताओं के लिए कुछ ख़ास शर्तें थीं। क़ाजारी राजकुमार, शाही परिवार के लोग, मंत्री व प्रतिष्ठित लोग, व्यापारी, ज़मींदार और उद्यमी समाज के ऐसे वर्ग थे जो अपने लिए प्रतिनिधि चुन सकते थे। आम लोगों में उन्हीं को मताधिकार प्राप्त था जिनके पास कोई मूल्यवान जायदाद हो। कम आय वालों और दरिद्रों को वोट देने का हक़ नहीं था। इस आधार पर उस समय के चुनावों में जनता की भागीदारी का कोई स्थान नहीं था।
ईरान में राजनैतिक मामलों की विशेषज्ञ डाक्टर मतीन अंजुम इस संबंध में कहती हैं। देखिए इस बहस का अतीत शायद संवैधानिक क्रांति से जुड़ा हुआ हो जब पहली बार देश में संविधान और क़ानून की चर्चा शुरू हुई और लोगों ने धीरे धीरे अपने आपको सत्ता में भागीदार समझना शुरू किया। उससे पहले तक शासक की ताक़त असीम और तानाशाही होती थी। लोगों को यह विश्वास होने लगा कि वे भी संसदीय चुनाव के माध्यम से सत्ता में भागीदार हो कर, शासक की ताक़त को सीमित कर सकते हैं।
ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद लोगों के मतों का महत्व बहुत बढ़ गया। क्रांति की सफलता वास्तव में इस बात की भूमिका बनी कि पहली बार इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की स्थापना के लिए जनमत संग्रह आयोजित हो। इसी रिफ़्रेंडम के बाद ईरान की जनता ने देश के राजनैतिक समाज के निर्धारण में चुनाव में भागीदारी को एक नागरिक ज़िम्मेदारी और धार्मिक कर्तव्य समझा ताकि चुनाव परिणाम, देश के संचालन में उसकी इच्छा और संकल्प का परिचायक हो।
चुनावी भागीदारी की प्रक्रिया में दो अहम पहलू हैं। पहला स्वस्थ और पारदर्शी चुनावों का आयोजन है जिसकी ज़िम्मेदारी चुनाव आयोजित कराने वालों और उस पर नज़र रखने वालों पर है। दूसरा अहम पहलू, संविधान के परिप्रेक्ष्य में चुनावों के भविष्य में निर्णायक रूप में जनता की भूमिका है जो देश की राजनैतिक और संचालन व्यवस्था की सुदृढ़ता का कारण बनती है और लोग भी व्यापक रूप से चुनाव में भाग लेकर देश की व्यवस्था और निर्वाचित अधिकारियों के प्रति अपने विश्वास का प्रदर्शन करते हैं।
नागरिक अधिकारों की दृष्टि से चुनावों में भागीदारी का अर्थ प्रजातांत्रिक तरीक़े से देश के संचालन में लोगों की भागीदारी है जिसमें जनता कुछ लोगों को अहम पदों के लिए निर्वाचित करती है। अलबत्ता एक अन्य दृष्टि से, मान्यताओं और इस्लामी शिष्टाचार के मानकों की रक्षा के साथ चुनाव में जनता की विवेकपूर्ण और भरपूर उपस्थिति के सामाजिक दृष्टि से अत्यंत गहरे प्रभाव पड़ते हैं और इससे समाज में राजनैतिक शिष्टाचार का स्तर ऊपर उठता है और इसके परिणाम स्वरूप इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था मज़बूत होती है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस्लामी गणतंत्र ईरान, ईश्वरीय शक्ति पर ईमान और जनता की उपस्थिति पर भरोसे के साथ दुनिया की किसी भी शक्ति से नहीं डरता।