ईरान का आगामी राष्ट्रपति चुनाव-3
ईरान में राष्ट्रपति और नगर व ग्राम परिषद के चुनाव के लिए मतदान में कुछ ही समय बचा है।
इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में चुनाव, धार्मिक प्रजातंत्र के दृष्टिकोण पर आधारित है। चुनाव, विशेष कर राष्ट्रपति चुनाव, मतदान में जनता की उपस्थिति के अत्यंत सुदंर मंचों में से एक है। ईरान में आयोजित होने वाले हर चुनाव में शत्रु मीडिया, चुनाव के ख़िलाफ़ झूठ प्रचार आरंभ कर देते हैं। देखिए बीबीसी फ़ारसी ने किस प्रकार ईरान में चुनाव के विरुद्ध नकारात्मक प्रचार की कोशिश की है।
अगर कोई इस चुनाव में गड़बड़ करना चाहे तो बहुत अधिक स्पष्ट नहीं होगा। अगर कोई गड़बड़ करना चाहे तो स्वाभाविक रूप से यह तभी होगा जब उम्मीदवारों के वोट एक दूसरे के निकट हों, इस स्थिति में गड़बड़ी आसान होती है, मतलब यह है कि अगले चरण में इन मतों को बड़ी आसानी से इधर से उधर कर सकते हैं।
बीबीसी के एक अन्य टीकाकार ने कहा।
चुनाव में धांधली कोई चार साल पुरानी या आठ साल पुरानी नहीं है बल्कि मुझे लगता है कि यह काम निरंतर दोहराया जा रहा है। रेडियो इस्राईल का प्रोपेगंडा भी सुनते चलें।
ईरान के मामलों के अधिकतर जानकारों ने भविष्यवाणी की थी कि चुनाव में मतदाताओं की संख्या बहुत कम होगी और सरकार के पास मतदाताओं की संख्या में फेर बदल करने और झूठे आंकड़े पेश करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होगा।
शत्रु संचार माध्यम चुनाव से पहले भी और बाद में भी ईरान में सार्वजनिक विश्वास को समाप्त करने की कोशिश करते हैं। बीबीसी फ़ारसी के एक विशेषज्ञ से होने वाले सवाल और उनके जवाब सुनिए।
मैंने कई बार आपसे बात की है, सीधे प्रसारित होने वाले कार्यक्रम में बात की है। हर बार मुझे ऐसा लगा कि आपको काफ़ी शक है विशेष कर इस बात में कि मतों की गणना में बहुत देर हो रही है, आप कह रहे थे कि ऐसे चिन्ह दिखाई दे रहे हैं कि फिर कुछ इस प्रकार की घटनाएं हो रही हैं कि लोगों के वास्तविक मत सामने न आएं, अब आपका क्या विचार है?
देखिए संदेह तो अब भी है क्योंकि स्पष्ट है कि इन्हें मतों की ज़रूरत है, ये धीरे धीरे आंकड़े पेश कर रहे हैं तो इससे संदेह तो बाक़ी रहता ही है कि शायद पर्दे के पीछे कोई हाथ काम कर रहा है।
इतने अधिक विषैले प्रचारों के बाद भी ईरानी राष्ट्र हर बार अपनी राष्ट्रीय परीक्षा में उत्तीर्ण हो कर बाहर निकला है। कुवैत के अदार समाचारपत्र के राजनैतिक टीकाकार मीसम मुहम्मद जूशी इस संबंध में कहते हैं।
ईरान के ख़िलाफ़ अरब संचार माध्यमों के व्यापक हमले वर्ष 2006 से और इस्राईल पर हिज़्बुल्लाह की विजय के बाद से शुरू हो गए। अरब सरकारें अपने ऊपर होने वाली सही आलोचनाओं की अनदेखी करते हुए ईरान के आंतरिक माममलों में खुल्लम खुल्ला हस्तक्षेप कर रही हैं। उनके ये हमले ईरान में वर्ष 2008 के राष्ट्रपति चुनाव में चरम पर पहुंच गए। अरब देशों और इस्लामी गणतंत्र ईरान के प्रजातंत्र की कोई तुलना ही नहीं की जा सकती। ईरान के लोग पूरी स्वतंत्रता के साथ और बिना किसी रुकावट के अपने अधिकारियों पर आपत्ति और उनके कामों की आलोचना कर सकते हैं लेकिन खेद के साथ कहना पड़ता है कि अरब देशों में लोग सिर्फ़ दांतों के डॉक्टर के सामने अपना मुंह खोल सकते हैं और उन्हें किसी भी प्रकार के विरोध, आपत्ति या आलोचना का कोई अधिकार नहीं है।
अब एक सवाल यह उठता है कि ईरान में चुनाव किन बातों के लिए होते हैं और उनकी क्या विशेषता है? इस सवाल के जवाब में कहना चाहिए कि एक प्रजातांत्रिक समाज में ये मतदाता ही होते हैं जो कुछ लोगों को, जिन्हें वे किसी पद के लिए उचित योग्यता व क्षमता का स्वामी समझते हैं, उस पद के लिए निर्वाचित करते हैं। ईरान में भी सभी अहम पदों पर आसीन होने वाले लोग निर्वाचित होते हैं चाहे वे राष्ट्रपति हो, सांसद हों, विशेषज्ञ परिषद के सदस्य हों या फिर नगर व ग्राम परिषद के सदस्य हों।
राष्ट्रपति व्यवस्था में राष्ट्रपति, जो मंत्री परिषद का प्रमुख भी होता है जिसके पास देश के संचालन की ज़िम्मेदारी होती है। इसी तरह न्यायपालिका और विधिपालिका सरकार से अलग रह कर पूरी स्वाधीनता के साथ काम करती हैं। राजनैतिक मामलों के विशेषज्ञ सालेह इस्कंदरी कहते हैं।
राष्ट्रपति चुनाव की एक अहम विशेषता यह है कि यह राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होता है और हमारे देश में, जहां राष्ट्रपति जनता के सीधे मतों से निर्वाचित होता है, देश के संचालन की ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति के हाथ में होती है और उसे असाधारण शक्ति प्राप्त होती है, इस अर्थ में कि देश के सभी संसाधनों, स्रोतों और संभावनाओं के संचालन का अधिकार उसे होता है। उसके सभी अधिकारों और दायित्वों का संविधान में उल्लेख किया गया है। हर राष्ट्रपति को प्रायः चार साल में देश के संचालन के लिए उचित व आवश्यक समय व क्षमता प्राप्त होती है। इन चुनावों की एक और विशेषता, इसमें भाग लेने और मतदान करने वालों की भावना है। कुछ लोग राजनैतिक भावनाओं से तो कुछ आर्थिक भावनाओं से जबकि कुछ अन्य सामाजिक व सांस्कृतिक भावनाओं से चुनाव में भाग लेते हैं।
ईरान की इस्लामी व्यवस्था में चुनाव एक प्रकार से अधिकार भी समझा जाता है और एक तरह की ज़िम्मेदारी भी माना जाता है। क़ानूनी मामलों के विशेषज्ञ और राजनीति शास्त्री, प्रजातांत्रिक सरकार को सबसे अच्छा शासन मानते हैं। ईरान की इस्लामी क्रांति की सबसे बड़ी व अहम उपलब्धि, इस्लामी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना है जिसमें जनता की सत्ता या प्रजातंत्र के सिद्धांत को इस्लामी नियमों के साथ उत्तम ढंग से जोड़ा गया है और क़ानून के स्रोत को केवल मानवीय नहीं बल्कि ईश्वरीय मानने के विचार का सम्मान किया गया है।
ईरान में व्यवस्था के लगभग सभी बड़े व संवेदनशील विभागों के लिए जिनमें राष्ट्रपति, संसद और वरिष्ठ नेता का चयन करने वाली विशेषज्ञ परिषद इत्यादि शामिल हैं और इसी तरह नगर व ग्राम परिषदों के लिए चुनाव कराए जाते हैं। राजनैतिक मामलों के विशेषज्ञ सालेह इस्कंदरी कहते हैं।
नगर व ग्राम परिषदों के चुनाव की एक विशेषता यह है कि यह क्षेत्रीय स्तर पर आयोजित होता है। ये परिषदें नगरों व ग्रामीण क्षेत्रों के संचालन में हमारा प्रतिनिधित्व करती हैं। वस्तुतः इसके चुनाव इस तरह आयोजित होते हैं कि देश के फ़ेडरल प्रतीक का प्रदर्शन करें। इस चुनाव के माध्यम से शहरों व ग्रामीण क्षेत्रों के संचालन से संबंधित मामले सीधे जनता के हवाले किए जाते हैं। नगर व ग्राम परिषदों के चुनाव की एक अन्य विशेषता इसमें भाग लेने वालों व मतदाताओं की भावना से संबंधित है। मैंने आपको बताया कि राष्ट्रपति चुनाव में कर्तव्य व दायित्व पर आधारित राजनैतिक व आर्थिक भावनाएं मत पेटियों तक मतदाताओं के आने का कारण बनती हैं लेकिन नगर व ग्राम परिषदों के चुनाव में जनता की भावनाएं मुख्य रूप से सामाजिक होती हैं और लोग राजनैतिक भावनाओं से ऊपर उठ कर इस बात की कोशिश करते हैं कि उन लोगों को चुनें जो नगर व नागरिक मामलों के संचालन में दक्षता रखते हों ताकि उनके रोज़मर्रा के मामले स्थानीय संचालन के माध्यम से बेहतर हो सकें।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने मार्च 2013 में अपने एक भाषण में कहा था कि चुनाव, अपने भविष्य के निर्धारण में ईरानी जनता की उपस्थिति व स्वाधीनता का प्रतीक हैं। उन्होंने कहा था कि जब आप राष्ट्रपति का चयन करते हैं, तो इसका मतलब होता है कि आप देश के संचालन के सभी मामलों को उस व्यक्ति के हाथ में देते हैं जो आपका निर्वाचित है और आपकी इच्छा और मतों से सामने आया है। जब आप सांसदों का निर्वाचन करते हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि आप देश में क़ानून बनाने के मामले और इसी तरह संचालन के मामलों की निगरानी का काम उन लोगों के हाथों में देते हैं जिन्हें आपने पहचान कर चुना है। इस आधार पर ये आप हैं जो चुनते हैं, इसका मतलब देश के संचालन में जनता की शक्ति और देश के भविष्य में जनता की भागीदारी है। यह कोई छोटी और मामूली चीज़ नहीं है, यह हमारे लिए सब कुछ है।
दूसरे शब्दों में जो लोग चुनावों में चाहे वह राषट्रपति का चुनाव हो, संसदीय चुनाव हो या कोई दूसरा चुनाव हो, वे अपनी वैधता और क़ानूनी व राजनैतिक शक्ति जनता या दूसरे शब्दों में मतदाताओं से प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई चुनाव में जनता की विवेकपूर्ण उपस्थिति और सोच समझ कर मतदान पर बहुत अधिक बल देते हैं।