इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था में लोगों का मताधिकार।
ईरान की इस्लामी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में लोगों के मत उनकी अमानत समझे जाते हैं जो वे चुनाव आयोजित कराने वाले और मतगणना करने वाले अधिकारियों को सौंपते हैं अतः इस मामले में बहुत ईमानदारी और ध्यान से काम करने की ज़रूरत है।
चुनावों में लोगों की भागीदारी और उनके मतों की रक्षा पर इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई ने सदैव बल दिया है। वरिष्ठ नेता के शब्दः लोगों के मत, लोगों की अमानत और उनका हक़ हैं, यह तो नहीं हो सकता कि किसी को भी लोगों के भविष्य पर थोप दिया जाए, या उसे अनुमति दी जाए कि वह प्राचीन इतिहास वाले इतने महान देश के संचालन के लिए क़ानून लिखे, लोगों को बाध्य करे कि वे ऐसा करें या ऐसा न कहें, इस (तरह के लोगों के निर्वाचन) के लिए कुछ शर्तें होती हैं।
इमाम ख़ुमैनी भी चुनाव को हर राष्ट्र के मूल अधिकारों में से एक मानते थे और कहते थे कि हर राष्ट्र को अपने भविष्य और सरकार की शैली के निर्धारण का अधिकार होना ही चाहिए। उनका कहना था कि अधिकार जनता के हाथ में होने चाहिए और हर बुद्धिमान व्यक्ति इस बात को मानता है कि हर किसी को अपने भविष्य के निर्धारण का अधिकार होना चाहिए, यही क़ानून है, यही बुद्धि है, यही मानवाधिकार है कि हर किसी का भविष्य उसी के हाथ में हो, हर राष्ट्र के भविष्य निर्धारण का हक़ उसी के पास हो। वे इस बारे में कहते थे कि इस्लामी सरकार सही अर्थ में एक प्रजातांत्रिक सरकार है और इसमें सभी अल्पसंख्यकों के लिए पूरी तरह से धार्मिक आज़ादी है, हर कोई अपनी आस्था अभिव्यक्त कर सकता। इस्लाम की ज़िम्मेदारी है कि वह सभी आस्थाओं का जवाब दे और इस्लामी सरकार सभी तर्कसंगत बातों का तर्कसंगत जवाब दे। उनका कहना थाः जिन लोगों ने संविधान के पक्ष में मतदान किया है उन्हें इस बात की अपेक्षा है कि संविधान को लागू किया जाए। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई किसी जगह सुबह उठे और कहे कि मैं निरीक्षक परिषद को नहीं मानता, मैं संविधान को स्वीकार नहीं करता, ऐसा नहीं हो सकता।
इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के शब्दों में चुनावों का आयोजन, देख-रेख, प्रत्याशियों के अधिकार, लोगों के मतों की रक्षा और चुनाव परिणामों को स्वीकार करना चुनावों के विभिन्न और एक दूसरे के पूरक आयाम हैं और लोगों को चुनाव के संबंध में अमरीका की दुष्ट नीतियों को देखते हुए उसकी ओर से पूरी तरह होशियार रहना चाहिए। वे कहते हैं। जिस व्यक्ति को वरिष्ठ नेता का चयन करना है उसमें कुछ क्षमताएं और योग्यताएं होनी चाहिए या जिस व्यक्ति को देश के लिए क़ानून लिखना है या देश का संचालन करना है उसमें भी कुछ विशेष क्षमताएं होनी चाहिए। तो इन क्षमताओं को कौन निर्धारित करेगा? कहीं पर इन क्षमताओं का निर्धारण ज़रूरी नहीं है? क्या यह जानना ज़रूरी नहीं है कि ये क्षमताएं इस व्यक्ति में या इन लोगों में हैं भी या नहीं? स्पष्ट है कि इसके लिए कोई तंत्र होना ज़रूरी है। हमारे यहां यह तंत्र संविधान की निरीक्षक परिषद के नाम से है।
जून 2009 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने नमाज़े जुमा के ख़ुत्बों में, जो चुनाव के बाद उनका पहला सार्वजनिक भाषण था, कुछ प्रत्याशियों की ओर से चुनावी परिणामों में छेड़छाड़ के नाम पर चुनाव परिणाम रद्द किए जाने की मांग पर ठोस ढंग से कहा था कि किसी भी ग़ैर क़ानूनी मांग के सामने नहीं झुका जाएगा। चुनावों की रक्षा के क़ानूनी आधार व तंत्र का बचाव वरिष्ठ नेता के भाषण के अहम बिंदुओं में से एक था।
उन्होंने कहा था कि अगर किसी को कोई संदेह है और वे प्रमाण पेश करते हैं तो निश्चित रूप से उनकी बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और उनके संदेह के निवारण के लिए क़दम उठाया जाना चाहिए लेकिन यह क़ानूनी मार्ग से होना चाहिए, संदेहों का निवारण सिर्फ़ क़ानूनी संस्थाओं व तंत्रों के माध्यम से होना चाहिए। मैं किसी भी तरह से ग़ैर क़ानूनी दबाव को स्वीकार नहीं करूंगा। अगर आज क़ानूनी तंत्र को तोड़ दिया जाए तो फिर भविष्य में कोई भी चुनाव सुरक्षित नहीं रहेगा। वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह कल्पना भी ग़लत है कि सड़कों पर हंगामा मचा कर, उसे व्यवस्था के ख़िलाफ़ दबाव का एक हथकंडा बनाया जाए और अधिकारियों को इस बात के लिए विवश किया जाए कि वे उनके दबाव के सामने झुक जाएं, नहीं यह भी ग़लत है। ग़ैर क़ानूनी मांगों और दबाव के सामने झुकना, तानाशाही की शुरुआत है।
जून 2013 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में मतों पर लोगों की अमानत के रूप में बल को भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की रक्षा और लोगों के मतों के ठोस बचाव के वरिष्ठ नेता के विश्वास के रूप में देखा जा सकता है। आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने जारी हिजरी शमसी वर्ष के आरंभ में जो अहम भाषण दिया था उसका एक अहम भाग चुनावों के महत्व और लोगों के मतों की रक्षा पर बल था। उन्होंने इस संबंध में कहा था कि जो कोई जनता और राष्ट्र के मतों के परिणाम से टकराना चाहेगा, मैं उसके सामने खड़ा हो जाऊंगा।
ईरान में संविधान की निरीक्षक परिषद के प्रवक्ता अब्बास अली कतख़ुदाई कहते हैं। एक समस्या, जिस पर हाल में काफ़ी चर्चा हुई है और पिछले एक दो साल में वरिष्ठ नेता ने भी जिसे पेश किया है वह चुनाव का लोगों की अमानत व लोगों का अधिकार होना है। इस संबंध में एक रोचक बिंदु यह था कि चुनाव को आम लोगों की अमानत बताने के मामले में लोगों के मतों की रका का विषय पेश किया जाता था और स्वाभाविक रूप से हर राजनैतिक व्यवस्था के लिए उसकी रक्षा करना ज़रूरी है। इस्लामी गणतंत्र ईरान में भी हमेशा इस विषय पर, स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की ओर से भी और वरिष्ठ नेता की ओर से भी बल दिया गया है कि लोगों के मताधिकार की रक्षा की जाए और उनके मत को अमानत समझ कर उसकी सही ढंग से सुरक्षा की जाए। स्वाभाविक सी बात है कि यह हमारे समाज में भी और किसी भी समाज में भी आम लोगों में विश्वास को बढ़ाता है।
पारदर्शी चुनाव वस्तुतः लोगों के मतों की रक्षा से ही सुनिश्चित होते हैं। इसी आधार पर ईरान के संविधान में चुनावों के सही आयोजन और लोगों के मतों की रक्षा के लिए इस काम की देख-रेख को आवश्यक बताया गया है। इस संबंध में संविधान की धारा 99 में कहा गया है कि निरीक्षक परिषद, विशेषज्ञ परिषद, राष्ट्रपति, संसद और सभी जनमत संग्रहों की निगरानी और देख-रेख की ज़िम्मेदार है। यह परिषद निगरानी करने वाली टीमों के माध्यम से चुनावों की देख-रेख करती है। इस संबंध में प्रत्याशियों की क्षमता की जांच और चुनाव के सभी चरणों के आयोजन की निगरानी उसके दो मुख्य दायित्व हैं। इन दायित्वों का लक्ष्य मतदाताओं को हर प्रकार का संतोष प्रदान करना और चुनाव के हर चरण को पारदर्शी बनाना है। यही कारण है कि प्रत्याशियों के नामांकन से लेकर उनकी क्षमताओं की जांच और चुनाव प्रचार से लेकर प्रत्याशियों के व्यवहार तक पर निरीक्षक परिषद नज़र रखती है।
ईरान में राष्ट्रपति चुनाव के क़ानून के अनुसार नामांकन समाप्त होने के साथ ही दो प्रकार की निगरानी या समीक्षा शुरू हो जाती है। आरंभ में एक परिषद आरंभिक निगरानी का काम करती है और प्रत्याशियों की मूल क्षमताओं की जांच करती है। इसके बाद संविधान की धारा 118 के आधार पर अधिक गहन निगरानी का चरण आरंभ होता है और यह काम सिर्फ़ संविधान की निरीक्षक परिषद के ज़िम्मे होता है। चुनावी क़ानून के दसवें अनुच्छेद के अनुसार देश में चुनाव सीधे और सार्वजनिक रूप से तथा गोपनीय मतदान के माध्यम से होंगे। 28वें अनुच्छेद में कहा गया है। अगर मतपत्र पर एक प्रत्याशी से अधिक का नाम लिखा जाए तो मतपत्र रद्द हो जाएगा लेकिन उसे वैध तरीक़े से डाले गए मतों में माना जाएगा। इसी तरह चुनावी क़ानून के 29वें अनुच्छेद के अनुसार मतदान शुरू होने से पहले निगरानी करने वाली टीम के एक या अधिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति में ख़ाली, बंद और मुहर लगी हुई मत पेटियां मतदान केंद्र में पहुंच जानी चाहिए। मतदान के बाद निगरानी टीम की देख-रेख में मत पेटियों की संख्या दर्ज की जाएगी और उसके बाद मत पेटियां मतगणना के लिए निर्धारित केंद्रों तक भेजी जाएंगी।
चुनाव में लोगों के मतों की रक्षा वास्तव में नागरिकों के सामाजिक व नागरिक अधिकारों की रक्षा का उच्च स्तरीय प्रतिबिंबन है जो मतदान के बाद सामने आता है और इससे समाज में प्रजातंत्र के आधार मज़बूती होते है। यही कारण है कि विदेशी संचार माध्यमों और विशेषज्ञों ने बारंबार चुनाव के अंजाम में जनता के मतों और चुनावों की भूमिका के प्रभावी होने की बात पर बल दिया है। ईरान में चुनाव के दिन मतदान के समय में कई बार की जाने वाली वृद्धि उन बातों में से है जिन पर ये संचार माध्यम मुख्य रूप से ध्यान देते हैं।